अस्सी और नब्बे के दशक नए राज्यों के लिए सूखे रहे
सन् साठ और सत्तर के दशकों में कई नए राज्यों के गठन के बाद भारत सरकार ने नए राज्यों के गठन के सिलसिले को ‘‘पैण्डोराज बाॅक्स’’ मान कर एक तरह से बंद ही कर दिया था। जहां-तहां से उठ रही अलग राज्य की मांगों के आलोक में केन्द्र सरकार को लगता था कि अगर एक राज्य के गठन की मांग मान ली गई तो पैण्डोराज बाॅक्स का मुंह ऐसा खुलेगा कि जिसे बन्द करना मुश्किल हो जाएगा।
नए राज्यों के गठन को उस दौर में पृथकतावादी भी माना गया। खासकर नए राज्यों की मांग को हिंसक गोरखालैण्ड आन्दोलन के आलोक में देखा जाने लगा, इसलिए अस्सी के दशक में मीजो नेता लालडेंगा से एक समझौते के तहत 1987 में केवल मीजोरम राज्य का गठन हुआ जबकि गोवा जो तब तक केन्द्र शासित प्रदेश था एसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया।
वर्ष 2000 में फिर खुला नये राज्यों का पिटारा
नब्बे के दशक में उत्तर प्रदेश के उत्तराखण्ड में पृथक राज्य के लिए ऐसा जबरदस्त आन्दोलन भड़का जिसे स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रित आन्दोलनों के इतिहास में अहिंसक जनक्रांति भी कहा गया। इस आन्दोलन में लगभग 3 दर्जन लोगों ने अपनी शहादत दी।
गांधी जयंती के दिन मुजफ्फरनगर में पुलिसकर्मियों द्वारा 7 आन्दोलनकारी महिलाओं से बलात्कार और 17 अन्य की लज्जा भंग की गई। उत्तर प्रदेश सरकार के एडवोकेट द्वारा हाइकोर्ट में जमा रिपोर्टों के अनुसार 18 अगस्त 1994 से लेकर 9 दिसम्बर 1994 तक चमोली, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, देहरादून, नैनीताल, पिथौरागढ़ एवं पौड़ी गढ़वाल जिलों में कुल 20,522 गिरफ्तारियां की गई जिनमें से 19,143 लोगों को उसी दिन रिहा कर दिया गया जबकि 1,379 को जेलों में भेजा गया।
इनमें से भी 398 लोगों को पहाड़ों से बहुत दूर बरेली, गोरखपुर, आजमगढ़, फतेहगढ़, मैनपुरी, जालौन, बांदा, गाजीपुर बलिया और उन्नाव की जेलों में भेजा गया। इस आन्दोलन को मुजफ्फरनगर काण्ड ने ऐसा मोड़ दिया कि तत्कालीन नरसिम्हाराव सरकार उत्तराखण्ड राज्य देने से तो कतरा गई मगर हिल काउंसिल जैसी प्रशासनिक इकाई के लिए लोगों को मनाने लगी।
इसी दौरान केन्द्र में सरकार बदली और नए प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने 15 अगस्त 1996 को लाल किले की प्राचीर से उत्तराखण्ड राज्य के गठन की घोषणा कर डाली। हालांकि संयुक्त मोर्चा के अपने अन्तर्विरोधों के कारण यह घोषणा फलीभूत नहीं हो पाई, मगर केन्द्र में संयुक्त मोर्चा की जगह अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार आई तो उसने न केवल उत्तराखण्ड अपितु झारखण्ड और छत्तीसगढ़ राज्यों का गठन कर डाला।
इस प्रकार 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ 26वां राज्य, 9 नवंबर 2000 में उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) 27वां राज्य, 15 नवंबर 2000 को झारखंड 28वां राज्य और 02 जून 2014 को तेलंगाना को भारत का 29वां राज्य बनाया गया।
छोटे राज्यों में आयाराम गयाराम संस्कृति पनपी
इन छोटे राज्यों के गठन से शासन और प्रशासन भले ही जनता के करीब आ गया हो लेकिन इनमें से ज्यादातर में अवसरवाद, राजनीकि विचारों के प्रति प्रतिबद्धता की कमी और पदलोलुपता के कारण व्याप्त राजनीतिक अस्थिरता से इनका विकास भी अवरुद्ध होता रहा है।
इस समस्या पर दलबदल कानून भी कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2000 में गठित झारखण्ड में 15 नवम्बर से 2014 तक 13 बार मुख्यमंत्रियों ने शपथ ली। इनमें बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोडा, हेमन्त सोरेन एवं रघुवर दास शामिल हैं। इसी तरह उत्तराखण्ड में गत 19 सालों में 8 मुख्यमंत्रियों ने 9 बार पद एवं गोपनीयता की शपथ ली।
इन दो नए राज्यों में ही नहीं बल्कि गोवा अरुणाचल प्रदेश एवं नागालैण्ड जैसे छोटे राज्य आयाराम गयाराम राजनीतिक संस्कृति के पर्याय बन गए हैं। सन् 1987 में संघीय शासित प्रदेश बनने के बाद गोवा ने अब तक 20 बार मुख्यमंत्री बदलते देखा है। अरुणाचल प्रदेश में पिछले एक दशक में 6 मुख्यमंत्री बने। नगालैंड में पिछले एक दशक में यहां चार मुख्यमंत्री सत्तारूढ़ हुए।
एक बार फिर राजनीतिक भूगोल बदला
दो दशकों की चुप्पी को तोड़कर नये राज्यों के गठन का सिलसिला पुनः शुरू करने का श्रेय जहां अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार को जाता है वहीं कश्मीर के लिए बनी बहुचर्चित धारा 370 एवं 35 ए को समाप्त कर देश की एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था की दिशा में साहसिक कदम उठाने का श्रेय भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की ही ले गई।
इस परिवर्तन के साथ ही 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत जम्मू-कश्मीर का पृथक राज्य का दर्जा समाप्त हो कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो अलग-अलग केंद्र शासित राज्य अस्तित्व में आ गए जिससे राज्यों की संख्या पुनः 28 हो गयी जबकि केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 29 हो गई।
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