करीब 150 मील प्रति घंटा की रफ्तार से आती गेंद को लगातार देख पाना मुश्किल होता है। फिर भी, पेशेवर खिलाड़ी ऐसी गेंदों को सटीकता से लौटा देते हैं। इसकी वजह केवल तेज रिफ्लेक्स नहीं, बल्कि दिमाग की भविष्य का अनुमान लगाने की क्षमता है। दरअसल, गेंद से आने वाली रोशनी पहले रेटिना पर पड़ती है, जहां वह इलेक्ट्रिकल संकेतों में बदलती है। ये सिग्नल ऑप्टिक नर्व के जरिये दिमाग तक पहुंचते हैं। फिर, विजुअल कॉर्टेक्स गेंद के रंग, आकार, दिशा और गति का विश्लेषण करता है। इस पूरी प्रक्रिया में एक सेकंड का दसवां हिस्सा लग जाता है। इतनी देर में तेज रफ्तार गेंद काफी आगे निकल चुकी होती है। फिर भी, दिमाग उसकी अगली स्थिति का अनुमान लगा लेता है। वास्तव में, गेंद कितनी ऊंचाई तक उछाली गई, शरीर किस दिशा में घूम रहा है, कंधे और बांह की गति कैसी है, रैकेट का कोण क्या है और स्विंग कितनी तेज है-इन सभी संकेतों से दिमाग गेंद की संभावित रफ्तार, दिशा और स्पिन का अनुमान लगा लेता है। इस पूरी प्रक्रिया में सेरिबेलम अहम भूमिका निभाता है। वहीं, विजुअल कॉर्टेक्स का एरिया एमटी (वी5) गेंद की गति व दिशा का आकलन करता है। यह जानकारी दिमाग के दूसरे हिस्सों तक पहुंचती है। फिर, फ्रंटल आई फील्ड्स और सुपीरियर कोलिकुलस आंखों को उस जगह देखने के लिए तैयार करते हैं, जहां गेंद अगले पल पहुंचने वाली होती है।
दिमाग की यह अनुमान लगाने वाली प्रणाली केवल टेनिस तक सीमित नहीं है। यही हमें गिरती हुई चीज पकड़ने, व्यस्त सड़क पार करने या ट्रैफिक में सुरक्षित ढंग से गाड़ी चलाने में भी मदद करती है। इस पर हो रहा शोध भविष्य में मस्तिष्क संबंधी बीमारियों के बेहतर इलाज, उन्नत रोबोट विकसित करने और खिलाड़ियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
-द कन्वर्सेशन