दिल्ली में जंतर मंतर पर सपा की रैली की तस्वीर
जननायक कर्पूरी ठाकुर, रामसुंदर दास, चौधरी चरण सिंह, लालू , मुलायम, नीतीश, पासवान, चौटाला, देवेगौड़ा जैसे नेताओं ने कभी लोहियावाद का झंडा बुलंद किया और संसदीय राजनीति में 1967 में सफलतापूर्वक स्थापित भी हुए। लेकिन जिस पिछड़ी अस्मिता के नाम पर इन नेताओं की पहचान स्थापित हुई उसकी बुनियाद किसी एक जाति या जाति समीकरण पर नही टिकी थी बल्कि लोहिया की समावेशी पिछड़ी अवधारणा का साकार स्वरूप था गैर कांग्रेसवाद और पिछडो का यूं मुख्यधारा में आना।
जननायक कर्पूरी ठाकुर नाई जाति के थे लेकिन उनके नेतृत्व में बिहार के यादव, कुर्मी, कोइरी, मल्लाह, मुसहर, निषाद, पासवान, मौर्या जैसी सभी जातियां शामिल थी। चौधरी चरण सिंह केवल जाटों के नेता नही थे किसान,गरीब,मजदूर चरण सिंह में अपना अक्स देखता था। 1990 में वीपी सिंह के मंडलवाद ने लोहिया के पिछड़ावाद की कब्र खोदने का काम किया। सही मायनों में ये वो दौर था जब लोहिया ओझल होते गए और उनके नाम से जाती और घरानों की दुकाने सजती गई।
बिहार में लालू यादव ने यादव- मुस्लिम के माय समीकरण को ईजाद कर लोहियावाद को माईवाद में तब्दील कर जननायक कर्पूरी ठाकुर को खूंटी पर टांग दिया। उनके सियासी छाते में अब यादव जाती और उनका भरापूरा परिवार ही था। मजबूरी में आडवाणी की रथयात्रा से डराए गए मुस्लिम इस छतरी में बंधुआ की तरह जोड़े गए। कमोबेश यही समीकरण मुलायम सिंह ने यूपी में बनाया 6 दिसम्बर 1990 को कारसेवकों पर गोली चलवाकर उन्होंने खुद ही मौलाना मुलायम का तमगा हासिल कर लिया।
इस तमगे के सहारे उन्होंने ऒर माई के जरिये लालू ने यादवों को राजनीतिक रूप से इतना ताकतवर बना दिया कि लोहिया की पिछड़ी अवधारणा यादवों की बंधक बनकर रह गई। ये यादव मुस्लिम का जोड़ बंटे हुए वोटर्स के बीच ढाई दशक तक कामयाब भी रहा। लेकिन इस यादवी वर्चस्व के बीच कुर्मी, पासवान, निषाद, कोइरी, मौर्या, गुर्जर, जाट जैसी जातियों के बीच भी अस्मिता दबी जुबान से मुखरित होती रही। बीजेपी के दिग्विजयी पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने इस दबी और बिखरी पिछड़ी अस्मिता को करीने से मथा।
नतीजा 2014 में ही आ गया था यूपी बिहार में, लेकिन बाबजूद परिवार औऱ चाटुकारो की चमक में घिरे खानदानों को यह समझ नही आया जो 2019 में लोगो ने करके दिखा दिया। पिछड़ी अस्मिता को यादव और खासकर परिवार के परकोटे तक सीमित करना अंततः इन नव सामन्तों को ही भारी पड़ा। पाटलिपुत्र से मीसा भारती ,मधेपुरा से शरद यादव, बदायूं से धर्मेंद्र यादव, कन्नौज से डिंम्पल यादव, फिरोजाबाद से अक्षय यादव, जैसे परिणाम सामान्य हार जीत वाले नतीजे न होकर सामाजिक न्याय के नए व्याकरण की रचना जैसी परिघटना है!
धर्मेंद्र यादव को बीजेपी की संघमित्रा मौर्या ने हराया है जो खुद भी पिछड़ी मौर्या जाति से आती है ,पाटलिपुत्र में मीसा को रामकृपाल यादव ने हराया है जो पिछड़े हैं। कन्नौज में डिंम्पल एक नौजवान से इसलिये हार गई क्योंकि उन्हें वहां के यादव मुस्लिम के अलावा किसी ने वोट नहीं दिया। सैफई और पाटलिपुत्र लिमिटेड के सफाए के बुनियादी कारण सही मायनों में लोहियावाद का परिवारों और जातियों से उन्मुक्त होना ही है।
यूपी- बिहार के नतीजे बताते है कि नकली अस्मिताओं के महल पर ठसक से खड़े परिवारों को न केवल दूसरी पिछड़ी जातियों ने खुली चुनोतियां दी बल्कि खुद की उनकी बिरादरियों ने भी उन्हें जमीन सुंघाने में संकोच नही किया। सैफई (मुलायम) खानदान और उनके इर्दगिर्द रहने वाले यादवों की जो रईसी पिछले 25 बर्षो में उपजी उसकी जद में यूपी के सभी यादव आते हो ऐसा नहीं है। मेरे बुंदेलखंड इलाके में चिन्हित यादव परिवारों के पास हर मॉडल की लग्जरी गाड़ियां हैं, उनके बच्चे महंगे स्कूलों में पढ़ते है , उनकी शादियां भी सैफई महोत्सव जैसी होती हैं, लेकिन यही सम्पन्नता का विभेद लोहियावाद को यूपी में जिंदा कर गया, 2014, 2017 औऱ 2019 के चुनावों में।
यूपी के आंकड़े बताते है कि 80 फीसदी कुर्मी कोइरी, मोर्या वोटर ने यूपी में बीजेपी को वोट किया सिर्फ 4 फीसदी ने महागठबंधन को। 23 फीसदी यादव भी इस बार बीजेपी को वोट करके आये हैं। ये वही यादव है जो अस्मिता के नाम पर सैफई सिंडीकेट द्वारा ठगे जाते रहे हैं और मायावती ने जो आरोप गठबंधन तोड़ने पर लगाया था कि अखिलेश अपने यादवों के वोट ट्रांसफर नही करा पाए है।
इन 23 फीसदी को न तो सैफई परिवार से कुछ मिला न मायावती के राज में जाटवों ने इन्हें छोड़ा। मजबूरी में वे मोदी की छतरी के नीचे आ गए।आंकड़े बताते है कि यूपी में केवल 60 फीसदी यादव वोट महागठबंधन को गया है। यूपी में सैफई (मुलायम) की तरह ही चौधरी परिवार को भी जाटों ने 2014 की तरह फिर से नकार दिया। पिता- पुत्र की पार्टी लोकदल को जाटों की पार्टी कहा जाता था लेकिन इस बार भी जाटों ने चुना तो जाटों को ही लेकिन चौधरी खानदान के नही ।
प्रो संजीव बालियान, और सत्यपाल सिंह जैसे जाट सांसद का जीतना छोटे चौधरी युग का समाहार है।आंकड़े बताते है 91 फीसदी जाटों ने यूपी में बीजेपी को वोट किया है। कमोबेश बिहार में भी नव लोहियावाद की यही थ्योरी कामयाब रही। बिहार में मात्र 55 फीसदी यादव ही लालू एन्ड कम्पनी के पास टिक पाए और पूरा कुनबा मय समधी के बिहार में हार गया। बिहार के पोस्ट पोल आंकड़े बताते है कि 21 फीसदी यादवों ने एनडीए को वोट किया है। ये भी वही यादव है जो लालू परिवार के लिये 25 साल लड़ते रहे लेकिन उनके परिवार वैसे ही तंगहाली औऱ झूठे मुकदमें बाजी झेलते रहे।
70 फीसदी कुर्मी, 76 फीसदी अन्य ओबीसी जातियों का मोदी के लिये ध्रवीकरण बिहार में बता रहा है कि कैसे पिछड़ी जातियां अब परिवारों के परकोटे से बाहर निकल कर नव लोहियावाद के लिये फिलहाल तो मोदी के साथ खड़े होकर लालू, मुलायम,देवगौड़ा, चौटाला,जैसे लोगो को यही सन्देश दे रही है कि वे परिवारों की बंधक नही है। मायावती भले 10 सीट जीत गईं हो पर उन्हें भी अहसास हो चुका है कि शाही शानोशौकत की जिंदगी और दलितों की बात साथ साथ नही चल सकेगी।
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