मणिपुर में हिंसा रही है बड़ी समस्या
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हिंसा भड़कने के क्या हैं कारण?
आदिवासी संगठनों ने मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में अखिल आदिवासी छात्र संघ मणिपुर के बैनर तले राज्य के सभी 10 पर्वतीय जिलों में आदिवासी एकता रैली का आयोजन किया था। इस हिंसा की शुरुआत बिष्णुपुर और चूड़ाचांदपुर जिले की सीमा पर उस समय हुई जब एक भीड़ ने एक समुदाय के घरों में आग लगा दी। उसके बाद यह हिंसा तेजी से राज्य के दूसरे जिलों में भी फैल गई। चूड़ाचांदपुर में कुकी आदिवासी तबके के लोगों की आबादी सबसे ज्यादा है जबकि बिष्णुपुर में मैतेई समुदाय के लोग रहते हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि फिलहाल दो मुद्दों ने ही राज्य में ताजा समस्या पैदा की है। इसमें पहला है राज्य सरकार की ओर से वन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू करना और दूसरा है मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति के दर्जे के मुद्दे पर हाईकोर्ट का फैसला। अदालत ने मैतेई संगठन की ओर से दायर एक याचिका पर बीते 19 अप्रैल को राज्य सरकार से इस मांग पर विचार करने और चार महीने के भीतर केंद्र को अपनी सिफारिश भेजने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद ही दोनों समुदायों के बीच हिंसा शुरू हो गई।
राज्य के मैतेई और आदिवासी समुदाय के बीच तनाव तो लंबे समय से चल रहा था, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले ने इस तनाव की आग में घी डालने का काम किया है। दरअसल, गैर-आदिवासी मैतेई समुदाय, जिसकी आबादी राज्य में करीब 53 फीसदी है, लंबे अरसे से अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग कर रहा है।
मैतेई समुदाय की दलील है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद वह लोग राज्य के पर्वतीय इलाकों में जमीन खरीद सकेंगे। फिलहाल वह लोग मैदानी इलाकों में तो जमीन खरीद सकते हैं, लेकिन पर्वतीय इलाकों में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है। इस समुदाय के लोग मणिपुर घाटी में रहते हैं। मौजूदा कानून के अनुसार, मैतेई समुदाय को राज्य के पहाड़ी इलाकों में बसने की इजाजत नहीं है।
इस समुदाय का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं होने के कारण पड़ोसी म्यांमार और बांग्लादेश से आने वाले लोगों की लगातार बढ़ती तादाद उनके वजूद के लिए खतरा बनती जा रही है, लेकिन आदिवासी समुदाय उसकी इस मांग का विरोध कर रहा है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि ऐसा होने की स्थिति में मैतेई समुदाय उनकी जमीन और संसाधनों पर कब्जा कर लेगा।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि अगर मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आदिवासियों को वंचित होना पड़ेगा।
क्या अमित शाह के दौरे से हालात बदलेंगे? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में ही मिलेगा। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मैतेई और कुकी संगठनों के बीच यह विवाद दशकों पुराना है। ऐसे में निकट भविष्य में इन दोनों समुदायों के बीच पनपी कड़वाहट कम होने के आसार कम ही हैं।
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