फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अमित शाह का मणिपुर दौरा: क्या राज्य में बदलेंगे हालात, आखिर कब बुझेगी हिंसा की आग?

सार

क्या अमित शाह के दौरे से हालात बदलेंगे? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में ही मिलेगा। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मैतेई और कुकी संगठनों के बीच यह विवाद दशकों पुराना है। ऐसे में निकट भविष्य में इन दोनों समुदायों के बीच पनपी कड़वाहट कम होने के आसार कम ही हैं।
विज्ञापन
गृहमंत्री अमित शाह मणिपुर के दौरे पर हैं। - फोटो : Twitter
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कभी उग्रवाद के लिए लगातार सुर्खियां बटोरने वाला पूर्वोत्तर का छोटा-सा पर्वतीय राज्य इस महीने की शुरुआत से ही जातीय हिंसा की आग में धधक रहा है। पूरे राज्य को सेना और सुरक्षाबलों की छावनी बना देने और मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की लगातार अपील के बावजूद राज्य में शांति बहाल होने का नाम नहीं ले रही है।

विज्ञापन


जातीय हिंसा और आगजनी के बाद ज्यादातर जिलों में लागू कर्फ्यू और इंटरनेट पर पाबंदी ने आम लोगों का जीवन दूभर कर दिया है।

राज्य में जरूरी वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। अब तक हिंसा में 70 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और करोड़ों की संपत्ति जल कर राख हो गई है। इसके अलावा हजारों लोग बेघर हैं। इनमें से 40 हजार लोग तो मणिपुर के अलावा पड़ोसी मिजोरम और असम में बने शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह 29 मई से तीन दिनों के दौरे पर जाने वाले हैं। लेकिन पर्वतीय इलाकों में रहने वाले कुकी और मैदानी इलाकों में रहने वाले मैतेई समुदाय के बीच विभाजन की रेखा इतनी गहरी हो गई है कि इसे निकट भविष्य में पाटना असंभव नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर लग रहा है। जनजातीय संगठनों ने साफ कर दिया है कि अब मैतेई समुदाय के साथ उनका रहना संभव नहीं है। यही वजह है कि इन संगठनों के साथ पर्वतीय इलाके के 10 विधायकों, जिनमें से सात भाजपा के हैं, ने अलग राज्य की मांग उठाई है।

विज्ञापन

सुनियोजित तरीके से हो रही है हिंसा?

इस बीच, सेना और सुरक्षाबलों की छापेमारी के दौरान भारी तादाद में हथियार और गोला-बारूद बरामद हो रहे हैं। इससे साफ है कि यह हिंसा अचानक नहीं भड़की। इसकी तैयारियां लंबे समय से चल रही थी। कुछ दिनों की शांति के बाद इस सप्ताह की शुरुआत से नए सिरे से हिंसा और आगजनी भड़क उठी है। नाराज लोगों ने कई मंत्रियों और सांसदों के घरों पर भी हमले किए हैं।

गुरुवार रात गुस्साई भीड़ ने केंद्रीय विदेश और शिक्षा राज्यमंत्री आरके रंजन सिंह के आवास पर हमला कर दिया। पुलिस के मौके पर पहुंचने के कारण एक बड़ा हादसा टल गया। हमले के वक्त मंत्री अपने घर में मौजूद नहीं थे। जानकारों के मुताबिक, मंत्री के घर हमला मैतेई समुदाय ने किया था। विदेश राज्यमंत्री सिंह भी मैतेई समुदाय से आते हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मणिपुर में दखल की मांग की थी।

सैकड़ों की तादाद में महिलाएं और पुरुष राज्य में शांति बहाली की मांग में कर्फ्यू का उल्लंघन कर सड़कों पर उतर रहे हैं। हिंसा से प्रभावित लोगों में सरकार और सुरक्षा बलों के खिलाफ भारी नाराजगी है। बिष्णुपुर जिले में तो महिलाओं ने नेशनल हाइवे पर रास्ता रोक कर सेना के जवानों को बैरंग लौटने पर मजबूर कर दिया।

मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को कहा कि राज्य में शांति बहाली के लिए संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है। राज्य के एक प्रतिनिधिमंडल ने गुवाहाटी में अमित शाह से मुलाकात कर उनको जमीनी स्थिति से अवगत कराया है।

 

विज्ञापन

मणिपुर में हिंसा रही है बड़ी समस्या - फोटो : Twitter

हिंसा भड़कने के क्या हैं कारण?

आदिवासी संगठनों ने मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में अखिल आदिवासी छात्र संघ मणिपुर के बैनर तले राज्य के सभी 10 पर्वतीय जिलों में आदिवासी एकता रैली का आयोजन किया था। इस हिंसा की शुरुआत बिष्णुपुर और चूड़ाचांदपुर जिले की सीमा पर उस समय हुई जब एक भीड़ ने एक समुदाय के घरों में आग लगा दी। उसके बाद यह हिंसा तेजी से राज्य के दूसरे जिलों में भी फैल गई। चूड़ाचांदपुर में कुकी आदिवासी तबके के लोगों की आबादी सबसे ज्यादा है जबकि बिष्णुपुर में मैतेई समुदाय के लोग रहते हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि फिलहाल दो मुद्दों ने ही राज्य में ताजा समस्या पैदा की है। इसमें पहला है राज्य सरकार की ओर से वन क्षेत्र में अतिक्रमण हटाओ अभियान शुरू करना और दूसरा है मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति के दर्जे के मुद्दे पर हाईकोर्ट का फैसला। अदालत ने मैतेई संगठन की ओर से दायर एक याचिका पर बीते 19 अप्रैल को राज्य सरकार से इस मांग पर विचार करने और चार महीने के भीतर केंद्र को अपनी सिफारिश भेजने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद ही दोनों समुदायों के बीच हिंसा शुरू हो गई।

राज्य के मैतेई और आदिवासी समुदाय के बीच तनाव तो लंबे समय से चल रहा था, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले ने इस तनाव की आग में घी डालने का काम किया है। दरअसल, गैर-आदिवासी मैतेई समुदाय, जिसकी आबादी राज्य में करीब 53 फीसदी है, लंबे अरसे से अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग कर रहा है।

मैतेई समुदाय की दलील है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद वह लोग राज्य के पर्वतीय इलाकों में जमीन खरीद सकेंगे। फिलहाल वह लोग मैदानी इलाकों में तो जमीन खरीद सकते हैं, लेकिन पर्वतीय इलाकों में जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है। इस समुदाय के लोग मणिपुर घाटी में रहते हैं। मौजूदा कानून के अनुसार, मैतेई समुदाय को राज्य के पहाड़ी इलाकों में बसने की इजाजत नहीं है।

इस समुदाय का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं होने के कारण पड़ोसी म्यांमार और बांग्लादेश से आने वाले लोगों की लगातार बढ़ती तादाद उनके वजूद के लिए खतरा बनती जा रही है, लेकिन आदिवासी समुदाय उसकी इस मांग का विरोध कर रहा है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि ऐसा होने की स्थिति में मैतेई समुदाय उनकी जमीन और संसाधनों पर कब्जा कर लेगा।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि अगर मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल गया को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आदिवासियों को वंचित होना पड़ेगा।

क्या अमित शाह के दौरे से हालात बदलेंगे? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में ही मिलेगा। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मैतेई और कुकी संगठनों के बीच यह विवाद दशकों पुराना है। ऐसे में निकट भविष्य में इन दोनों समुदायों के बीच पनपी कड़वाहट कम होने के आसार कम ही हैं।


----------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें