होली की शुभकामनाएं: हिलमिल गाओरी फाग, आई फागुनियां..!
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संयोग ऐसा हुआ कि अगले दिन गुरुजी ने इन्हें ही पूरी कक्षा के सामने बुलंद आवाज में निबन्ध पढ़ने के लिए कह दिया। बहुत ही आत्मविश्वास के साथ, इन्होंने निबन्ध पढ़ना आरम्भ किया, 'रंगों का त्योहार होली, हिन्दुओं के चार बड़े पर्वों में से एक है। यह पर्व फाल्गुनी पूर्णिमा को होलिका दहन के पश्चात् बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।'
अभी इन्होंने निबन्ध की पहली पंक्ति पूरी भी नहीं की थी कि गुरुजी ने इन्हें तुरन्त रुक जाने को कहा। फिर गुरुजी इनके जरा करीब आए और पुछा कि गाइड से नकल करके निबन्ध लिखा है क्या? इनका नकारात्मक उत्तर सुन कर गुरुजी आगबगूला हो गए और एक जोर का थप्पड़ रसीद करते हुए बोले, 'यदि तुमने स्वीकार कर लिया होता कि यह निबन्ध कहीं से नकल करके उतारा है, तो सम्भवतः मैं तुमको छोड़ देता। पर मैंने थप्पड़ इसलिए मारा क्योंकि तुमने झूठ बोला कि यह निबंध स्वयं तुमने लिखा है।'
अपने स्थान पर वापस जाते हुए गुरुजी ने बीच की पंक्ति में बैठे अब्दुल से पूछा, 'होली खेलते हो?' इस से पहले कि अब्दुल कुछ बोलता, उसके बगल में बैठा विवेक बोल पड़ा, 'गुरुजी! अब्दुल तो हम लोगों से भी अधिक होली खेलता है। अगर आपको विश्वास न हो तो अभी इसके बस्ते की तलाशी ले कर देख लें।
सुबह ही मैंने इसको रंगों वाले गुब्बारे की थैली छिपाते हुए देखा है।' यह सुनकर गुरुजी मुस्कुराते हुए श्याम-पट की ओर मुड़े और चॉक से प्रसिद्ध कविता 'तब देख बहारें होली की..' लिखना आरम्भ किया।
त्योहारों का कोई मजहब नहीं होता, वे भी हिन्दू या मुसलमान नहीं होते।'
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पूरी कविता लिखने के बाद गुरुजी ने कक्षा से मुखातिब होते हुए पूछा, 'तुम लोग यह बता सकते हो कि इस कविता के रचयिता कौन हैं?' कक्षा में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। फिर गुरुजी ने स्वयं ही बच्चों को बताया , 'यह कविता नजीर अकबराबादी ने लिखी थी। तुम लोग कवि नजीर को जानते हो?' कुछ देर पश्चात् एक बच्चा धीरे से बोला कि नाम से तो लगता है कि वह कोई मुसलमान हैं।'
इस पर गुरुजी ने उस बच्चे को अपनी उंगली से पास आने का इशारा किया और उसका कान खींचते हुए बोले कि नजीर अकबराबादी भारत के एक महान कवि थे। कवि हिन्दू अथवा मुसलमान नहीं होते, कवि का धर्म केवल कविता होता है और इसी प्रकार से त्योहारों का कोई मजहब नहीं होता, वे भी हिन्दू या मुसलमान नहीं होते।'
अंत में गुरुजी ने अपनी लाल कलम से इन सज्जन की कॉपी में यह इस्लाह की, 'होली भारतीयों द्वारा मनाया जाने वाला एक बड़ा त्योहार है।'
इस घटना को बताने के पश्चात् वह सज्जन कहते हैं कि उस दिन, उनके गुरुजी ने न सिर्फ उनकी कॉपी में करेक्शन किया बल्कि पूरी कक्षा को जिंदगी भर याद रखने वाला आपसी भाईचारे का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सबक भी दिया। उनके जीवन की इस घटना से मैं स्वयं बहुत अच्छी तरह से जुड़ पाता हूं, क्योंकि हमारी भी हिंदी की अध्यापिका इस घटना के गुरुजी के ही समान बहुत सख्त परन्तु हम सब बच्चों की प्रिय थीं और सच पूछिए तो मैं भी अपनी कक्षा में उस 'अब्दुल' से किसी मायनों में कम नहीं था।
इसलिए आज, आप सभी को हमारी उन्हीं राष्ट्र- पुरस्कृत प्राध्यापिका आदरणीय ज्ञान कुमारी अजीत जी की एक कविता के माध्यम से होली की ढेरों शुभकामनाएं व बधाइयां-हिलमिल गाओरी फाग, आई फागुनियां ।
रंगों का है त्योहार बाजे पैजनियां।
बाजे ढोल मृदंग, श्याम की बांसुरिया।।
अबीर गुलाल उड़े
टेसू पलास झूमे।
फूलों का है मकरंद, गंध सुहावनियां।
बोल रही अमराई में, कुहू कुहू कोयलिया।।
रंगों की टोलियां
घूमे गली गलियां।
छ र र र रंगों के संग, चली पिचकारियां।
मीज गयी अंग अंग, गोरी सांवरिया।।
फाल्गुनी बयार डोले
बागन में पंछी बोले।
होली की आई बहार, लहरे बागुनियां।
हिलमिल गाओरी फाग, आई फागुनियां..!
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