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प्राग डायरी-6: प्राग का अजीबोगरीब महल और हिटलर के रोने की कहानी

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एडोल्फ हिटलर ने प्राग कैसल में एक रात बिताई थी - फोटो : Social Media
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और पन्द्रह मिनट में मैं 'प्राग कैसल' के सामने हूं। मेरे सामने महल का एक विशाल प्रांगण है। 'प्राग कैसल' में कई महल बन गए। मोटे तौर पर महल प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक युग में बांटा जाता है।

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पहला महल 9वीं सदी में बना था। बाद के सम्राटों ने और महल व रायल पैलेस बनवाए। खासतौर से चौथे चार्ल्स ने जिसने चार्ल्स ब्रिज की नींव रखी थी। 1541 में एक बड़ी आग ने महल के बड़े हिस्से को बर्बाद कर दिया। इसके बाद पुनर्जागरण शैली में कुछ नई इमारतों को जोड़ा गया था।

आपको इस शानदार और भव्य महल की बारीकियां मैं नहीं बताऊंगा। विलासता कहां से शुरू होती है और कहां खत्म, यह इस महल को देखकर आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं। अद्वितीय मूर्तियां, छतों पर लटके मोतियों के झाड़फानूस, महंगी पेटिंग्स, फव्वारे, सिंहासन, बेशकीमती फर्नीचर, नायाब कला कृतियां, रेशमी परदे, मखमली कालीनें, सब यूरोपीय रजवाड़ों की दिव्यता और भव्यता उजागर करते हैं।
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1919 के प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ये महल चेकोस्लोवाकिया की सरकार का हेडक्वाटर बन गया। यहां आज भी चेक राष्ट्रपति का निवास है। यह महल आठवीं सदी से लेकर 21वीं सदी तक न जाने कितने सम्राटों, शासकों और हुक्मरानों के शासन का गवाह रहा।

 

हिटलर की नाज़ी जर्मनी ने चेक के राष्ट्रपति एमिल हचा को जर्मनों को सौंपने के लिए मजबूर कर दिया। - फोटो : Social Media
कहानी 'प्राग कैसल' की
'प्राग कैसल' के बारे में एक दिलचस्प किंवदंती यह है कि कोई अपात्र या अयोग्य इंसान, जो इस ताज का कानूनी या परम्परागत उत्तराधिकारी नहीं, अगर अपने सिर पर ताज रखता है तो न केवल एक साल के भीतर उसकी मृत्यु हो जाती है बल्कि उसका परिवार तबाह हो जाता है। प्राग की जनता ने इस किंवद्वंती को कई बार सच होते देखा।

इस शानदार महल का सबसे काला अध्याय दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान शुरू होता है। 1939 में जब हिटलर की नाज़ी जर्मनी ने चेक के राष्ट्रपति एमिल हचा को जर्मनों को सौंपने के लिए मजबूर कर दिया। महल पर नाजी कब्जा हो गया। रातों-रात महल की दीवारों पर छत से नीचे तक लंबे-लंबे लाल झंडे लटक गए जिस पर स्वास्तिक के निशान बने थे।

कहते हैं तब एडोल्फ हिटलर ने प्राग कैसल में एक रात बिताई थी, और अगली सुबह उसने प्राग और इस कैसल को अपने प्रिय निर्दयी फौजी अफसर रेइनहार्ड हैड्रिक के हवाले कर दिया। रेइनहार्ड की कहानी बेहद दिलचस्प और ड्रामे से भरपूर है, और ये सारी दुनिया में मशहूर है। कहते हैं रेइनहार्ड, नाजी युग में यूरोप के यहूदियों के लिए वह जल्लाद था।

हिटलर से पहले वह जर्मन नेवी में था, जहां एक फौजी अफसर की बेटी से दुराचार के इल्जाम में सेना से निकाला गया, तब उसने हिटलर पार्टी ज्वाइन की। जल्द वह एसएस विंग से हिटलर की इंटेलीजेंस विंग में शामिल हो गया और उसने हिटलर विरोधी कम्युनिस्टों को बेरहमी से कुचल दिया।

हिटलर के सत्तानशीं होने के बाद उसने एक-एक करके पार्टी के संस्थापक सदस्यों को भी मौत के घाट उतार दिया, जो हिटलर को कभी भी चुनौती दे सकते थे। तानाशाह बनाने में उसने हिटलर की बहुत मदद की। बहुत जल्द वह हिटलर के इनर सर्किल में शामिल होकर उस बेदर्द तानाशाह की आंख का तारा बन गया।

खुद हिटलर रेइनहार्ड के बारे में कहा करता था- 'ही इज ए मैन ऑफ आयरन हार्ट' यानी वो 'लोहे के दिल वाला इंसान' है।
 
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रेइनहार्ड ने प्राग की सड़कों को यहूदियों के कत्लोगारत का एक न भूलने वाला सिलसिला शुरू कर दिया। - फोटो : Amar Ujala
रेइनहार्ड मूलत: एक संगीतकार और ओपरा गायक का बेटा था, कभी कभी खुद भी वायलन बजाता था, लेकिन इसका दिमाग किसी बनैले जानवर की तरह हिंसक और क्रूर था। यूरोप में यहूदियों की सामुहिक हत्याओं के पीछे उसी का दिमाग का। उसने यूरोप के हर देश में रहने वाले यहूदियों की आबादी की गिनती कराई थी और हिसाब लगाया कि इनका समूल नाश तभी संभव है जब इन्हें सामूहिक रूप से मौत के घाट उतारा जाए। इसमें वक्त और संसाधन कम लेगा। गैस चैम्बर के जरिए यहूदियों के सामूहिक कत्लेआम का आइडिया भी इसी का था।

हिटलर ने उसे चेकोस्लाविया भेजा, जहां उसने प्राग की सड़कों को यहूदियों के कत्लोगारत का एक न भूलने वाला सिलसिला शुरू कर दिया। इतिहास में उसे 'ब्रूचर ऑफ प्राग' यानी 'प्राग का कसाई' कहा जाता है, तब रेइनहार्ड की हत्या की साजिश चेकोस्लाविया के दो नौजवान सैनिकों जोज़ेफ़ गैबिक और जन कुबिज़ ने रची, जिन्हें ब्रिटिश आर्मी ने ट्रेनिंग दी थी।

क्रान्तिकारियों का एक पूरी टीम इस योजना पर काम कर रही थी।  इसे 'ऑपरेशन एन्थ्रोप्राइड' का नाम दिया गया। ये विश्वप्रसिद्ध ऑपरेशन है जिस पर हॉलीवुड में कई बेहतरीन फिल्में भी बन चुकी हैं।

जब हिटलर से मिलना था रेइनहार्ड को 
27 मई 1942 को, रेइनहार्ड ने बर्लिन में हिटलर से मिलना था। निरंकुश रेइनहार्ड प्राग की सड़कों पर खुली कार से घूमता था। उस दिन रेइनहार्ड अपने घर से 'प्राग कैसल' की तरफ आ रहा था।

प्राग में एक जगह है लीबिया जंक्शन। ये हमले के लिए बेहतर जगह थी क्योंकि किसी भी गाड़ी चलाने वाले को यहां हेयरपिन मोड़ के कारण अपनी कार धीमी करनी पड़ती है। सुबह के कोई 10:30 बजे थे। गैबिक और कुबिज़, वहां एक ट्राम स्टॉप पर इंतजार कर रहे थे। जैसे ही रेइनहार्ड की ओपन-टॉप मर्सिडीज-बेंज ने इन दोनों को पास किया, गैबिक एकदम से कार के सामने आ गया। और खुली मर्सिडीज में बैठे रेइनहार्ड पर अपनी स्टेनगन तान दी। लेकिन ट्रिगर पर ऊंगली दबाते ही उसकी स्टेनगन जाम हो गई।

रेइनहार्ड ने अपने ड्राइवर को कार रोकने को कहा। और आपनी रिवॉल्वर से उसने गैबिक पर फायरिंग शुरू कर दी। अपने साथी को फंसा देख,  साइकिल पर वहां पहुंचे कुबिज़ ने रेइनहार्ड की कार पर एंटी-टैंक ग्रेनेड उछाल दिया। ये साइकिल उसने अभी-अभी किसी से छीनी थी। बम के कई छर्रे रेइनहार्ड के जिस्म में घुस गए। खुद कुबिज भी इन छर्रे से घायल हो गया। रेइनहार्ड डगमगाते हुए कार से बाहर आया।

अपनी छर्रों की चोटों से अनजान उसने फिर दोनों पर गोली चलाई। पर दोनों बच गए। तब गैबिक और कुबीज़ ने अपनी पिस्तौल के साथ रेइनहार्ड पर गोली चलाई, लेकिन अचानक हुए इस विस्फोट से हैरान परेशान रेइनहार्ड, खुद को बचाने में नाकाम रहा। फिर भी उसने उनका थोड़ी दूर पीछा किया। कुबीस अपनी साइकिल पर कूदकर पैदल भाग गया। रेइनहार्ड उसके पीछे दौड़ा, लेकिन अचानक वहीं ढह गया। तब तक उसके सुरक्षाकर्मी आ चुके थे। लेकिन दोनों मौकाए वारदात से भाग निकले।

इधर, रेइनहार्ड बुरी तरह जख्मी हो गया, उसे इलाज के जर्मनी ले जाया गया। खुद हिटलर के प्राइवेट डॉक्टर ने उसका इलाज किया। लेकिन कुछ दिन बाद उसकी मौत हो गई। कहते हैं उसकी मौत पर लोगों ने पहली बार हिटलर की आंखों में नमी देखी। उसकी कब्र पर हिटलर ने भाषण दिया। उसे वीरता के कई अवॉर्ड और मेडेल दिए। उसके नाम से एक डाक टिकट भी जारी किया। हालांकि इस मौत के लिए हिटलर ने खुद रेइनहार्ड को ही जिम्मेदार ठहराया था। वह उस पर नाराज भी हुआ था।

खुली कार में ड्राइविंग करना, वह भी बिना सुरक्षाकर्मियों के उसकी नजर में वीरता नहीं बल्कि निरी बेवकूफी थी। लेकिन जो होना था वो हो चुका था। इसके बाद प्राग में हिटलर का दमन चक्र चला। चेक में यहूदियों के गांव के गांव जला दिए गए। इस हत्याकांड में दस हजार से ज्यादा कम्यूनिस्ट व यहूदी मारे गए। प्राग की जिस यहूदी बस्ती में मशहूर चेक लेखक फ्रेंज काफ्का के पिता की दुकान थी, उसको नाजी सेना ने पूरी तरह तबाह कर दिया था।

कहते हैं महल में प्राग के नाजी संरक्षक रेइनहार्ड ने जिद करके एक दिन के लिए बोहेमियन का मुकुट अपने सिर पर रख लिया था। मुझे प्राग कैसल के बारे में वह पुरानी किंवदंती याद आ गई कि कोई अयोग्य व्यक्ति जो इस ताज का कानूनी या परम्परागत हकदार नहीं, अगर अपने सिर पर मुकुट रखता है तो वह न केवल एक साल के भीतर मर जाता है बल्कि उसका परिवार बर्बाद हो जाता है।

सत्ता संभालने के एक साल से भी कम समय में, दो जून 1942 को,रेइनहार्ड मारा गया। और एक साल बाद उसके बड़े बेटे क्लौस की एक सड़क हादसे में मौत हो गई। प्रागवासी ये किस्सा आज भी रस लेकर सुनाते हैं।

प्राग के नायकों की कहानी 
लेकिन उन दो चेक नौजवान सैनिकों का किस्सा अभी खत्म नहीं हुआ। एक 'जल्लाद' को बहादुरी से मौत के घाट उतारने वाले ये सैनिक प्राग के नायक थे। हिटलर के नाजी सैनिक उन्हें कुत्तों की तरह खोज रहे थे।

प्राग में चारों तरफ छापे पड़ रहे थे। गैबिक और कुबीज अपने चार अन्य साथियों के संग प्राग के सेंट सिरील मेथोडियस कैथेड्रल में छिपे थे। ये कैथड्रिल न्यू टाउन में आज भी है। मुखबिर की खबर पर जर्मन सैनिकों ने उस चर्च को घेर लिया। इन जाबांजों ने चर्च में भी मोर्चा खोल दिया। कोई छह घंटे तक दोनों तरफ से फायरिंग चली। इन सेनानियों ने हिटलर के 14 सैनिक मार गिराए। 21 अन्य जख्मी हुए।

ग्रेनेड से गंभीर रूप से घायल गैबिक और उसके एक साथी ने अपनी कनपटी पर पिस्टल रखकर खुद को गोली मार ली। कुबीज़ बुरी तरह जख्मी हो गया था और अस्पताल पहुंचने के कुछ समय बाद ही उसकी मृत्यु हो गई। मेथोडियस कैथेड्रल की खिड़कियों में मुठभेड़ में चली गोलियों के निशान आज भी सुरक्षित हैं।

ये प्राग के हीरो थे। चेक और स्लाविया में गैबिक और कुबीज़ के नाम पर संग्रहालय, कई सरकारी भवन और सड़कें हैं। बाद में प्राग ने इनके सम्मान में एक स्मारक, बनाया जो आज भी इनकी बहादुरी का प्रतीक चिन्ह है।

इसका नाम 'ऑपरेशन एंथ्रोप्राइड मेमोरियल' है। ये प्राग-8 में है। यानी मुख्य स्टेशन से ट्राम से कुल आधे घंटे का सफर। इस स्मारक का डिजाइन लियोनार्डो दा विंची की 490 ड्राइंग "विट्रुवियन मैन" से प्रेरित है। मैंने देखा कि सड़क के किनारे एक पार्क में वह एक विशालकाय ऊंचा तिकोना स्तंभ है, जिस पर तीन चेक सैनिक बाहर की तरफ देखते हुए अपने दोनों हाथ फैलाए खड़े हैं। स्मारक में एक चेक ध्वज का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक पत्थर के ब्लॉक का इस्तेमाल किया गया है।  

'प्राग कॉसिल' से मैं सीधे यहीं आया। इन शहीदों का स्मारक देखने। प्राग आने वाले ज्यादातर सैलानियों को यह कहानी नहीं मालूम। वह चार्ल्स ब्रिज और 'प्राग कैसल' देखकर लौट जाते हैं। स्मारक देखकर मैं रोमांचित था। एक देश अपने वीरों को ऐसे याद रखता है। मैं उन शहीद सैनिकों के शांत चेहरों को देख रहा था।

मैंने पढ़ा है रेइनहार्ड जब मरा तो उसका चेहरा विकृत हो गया था। हालांकि वह खुद एक फौजी था। मुझे लगा लोग गलत कहते हैं कि 'प्राग कैसल' देखे बिना प्राग की यात्रा अधूरी है। मुझे लगता है कि अगर आपने 'ऑपरेशन एंथ्रोप्राइड मेमोरियल' नहीं देखा तो प्राग नहीं देखा।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण ): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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