1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कृत ‘संस्कृति के चार अध्याय’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (23 सितम्बर 1908-24 एप्रिल 1974) द्वारा रची गई गद्य रचना है। अब तक इसके कई संस्करण हो चुके हैं। 2016 में यह नए कलेवर में प्रकाशित (लोकभारती, इलाहाबाद) हुई है। विपुल रचनाकार दिनकर कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं, मगर उन्होंने सिद्ध किया है कि गद्य कवि का निकष होता है। मुझे लगता है इस असाधारण रचना हेतु उन्हें ज्ञानपीठ भी मिलना चाहिए था। हालांकि उन्हें बाद में 1972 में अपने मार्मिक प्रेम काव्य ‘उर्वशी’ के लिए ज्ञानपीठ प्राप्त हुआ।
ओज और आक्रोश के कवि ‘दिनकर’ के अनुसार आर्य एवं आर्येतर संस्कृतियों खासकर द्रविश तथा मोहन जोदड़ो के सम्मिश्रण से जो संस्कृति पैदा हुई, वही भारत की आधारभूत संस्कृति बनी। वे संस्कृति के विकास में दक्षिण भारत के योगदान को अधिक मानते हैं। साथ ही भारत के भौगोलिक स्थिति को चित्रित करते हैं, उनके अनुसार समुद्र एवं हिमालय के कारण भारत में बाहरी लोगों का आना सरल न था।
फिर भी वे मानते हैं कि आर्यों के पहले भी कुछ विदेशी समूह यहां आए होंगे। आर्यों के आने के बाद विदेशियों का आना कठिन हो गया। अत: वे आते और फिर चले जाते रहे।
उनका मानना है, समुद्री मार्ग से पश्चिमी लोगों के आने का प्रभाव हमारी संस्कृति पर बराबर पड़ा है। पश्चिमी देशों से आये लोगों खासकर अंग्रेजों के आगमन से भारत में औद्योगिक सभ्यता का प्रारंभ हुआ। पश्चिमी इतिहासकारों ने एक साजिश की और हमारे इतिहास को अपनी नजर से लिखा। परंतु हमारे बुद्धिजीवियों ने भी अपनी बुद्धि ताक पर धर कर पश्चिमी बुद्धिजीवियों की नकल करनी शुरु कर दी। वे भारतीय संस्कृति की कमजोरियों को भी बताते हैं।
उनका कहना है, हमने कुछ ऐसी परम्पराएं निर्मित कर लीं, जो अन्य किसी देश में कदाचित मिलती है, जैसे जाति प्रथा और उससे जुड़ी छूआछूत की भावना। यह सब हमें संकुचित बनाता है।
साथ ही वे कहते हैं, हमारे यहां दो शक्तियां निरंतर हमें प्रभावित करती रही हैं। एक ऐसी शक्ति है, जो बाहरी प्रभावों को पचा कर सामंजस्य उत्पन्न करने की कोशिश करती है। जबकि दूसरी शक्ति हमें विछिन्न करती है, अलगाव को बढ़ावा देती है। वे हमारी एक और कमजोरी को दिखाते हैं, वह है हमारी कथनी और करनी में फांक। एक ओर तो हम शांति, अहिंसा एवं सहिष्णुता की बात करते हैं।
वहीं दूसरी ओर हमारे यहां अशांति, हिंसा खूब देखने को मिलतील्ती है। इसी तरह जो भी तनिक हमसे भिन्न तरीके से सोचता है, उसके प्रति हम तत्काल असहिष्णु हो जाते हैं।
अपनी ‘संस्कृति के चार अध्याय’ किताब के द्वारा रामधारी सिंह ‘दिनकर’ भारतीय सांस्कृतिक इतिहास को व्याख्याइत करते हैं। बौद्धिक विमर्श भारत की चार महान सांस्कृतिक क्रांतियों के माध्यम से हमारे भारतीय समाज निर्माण के इतिहास को प्रस्तुत करता है। यह हमारे आपसी सामंजस्य, मित्रतापूर्ण रिश्तों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान द्वारा बनी राष्ट्रीय पहचान की शिनाख्त करती है। यह एक अनोखी किताब है, इसे सहमति-असहमति के बावजूद अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।
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