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विश्व साहित्य का आकाश: रोहिंग्टन मिस्त्री की एक लम्बी यात्रा

सार

लेखक रोहिंग्टन मिस्त्री पैदा भले बंबई (आज के मुंबई) में हुए लेकिन 1975 में अपनी पत्नी फ्रेनी के साथ कनाडा जा बसे हैं। उन्होंने बंबई एवं टोरोंटो में पढ़ाई की और बैंक में नौकरी की। पहले गणित तथा इकॉनोमिक्स पढ़ा, बाद में इंग्लिश साहित्य एवं फिलॉसफी।
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साहित्य की दुनिया - फोटो : adobestock
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विस्तार
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गम्मत का जैसा चित्रण ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’ में मिलता है, वैसा जीवंत वर्णन कम ही देखने में आता है। यह चित्रण एक बार पढ़ कर पाठक कभी भूल नहीं सकता है। यह होती है, एक लेखक की सफलता, साहित्य के प्रति उसकी गंभीरता।

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3 जुलाई 1952 को भारत में जन्मे इस लेखक ने अपने लेखन में ऐतिहासिक घटनाओं को उठा कर, अपनी कल्पना से सजा कर उपन्यास रचे हैं, कहानियां लिखी हैं और इस तरह साहित्य के खजाने को कुछ और संपन्न किया है। 1991 में पारसी परिवार के रचनाकार की यह किताब प्रकाशित हुई और पाठकों के द्वारा हाथों-हाथ ली गई। उनका नायक हीरो नहीं होता है, न ही वह कोई बहुत वीरता का काम करता है।

वह एक सामान्य नागरिक हैं। राजनीति से जुड़ा होने के बावजूद यह एक निजी दु:ख-सुख का उपन्यास है। आम आदमी की तरह नायक न चाहते हुए भी चक्रव्यूह में फंसता चला जाता है।
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लेखक रोहिंग्टन मिस्त्री पैदा भले बंबई (आज के मुंबई) में हुए लेकिन 1975 में अपनी पत्नी फ्रेनी के साथ कनाडा जा बसे हैं। उन्होंने बंबई एवं टोरोंटो में पढ़ाई की और बैंक में नौकरी की। पहले गणित तथा इकॉनोमिक्स पढ़ा, बाद में इंग्लिश साहित्य एवं फिलॉसफी।

दिलचस्प है, इसके पहले ही ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’ का नायक गुस्ताद नोबेल बैंक क्लार्क है। गुस्ताद नोबेल क्या करे, उसने अपने बेटे शोहराब नोबेल के लिए जो योजना बनाई, उसका बेटा उसे नकार देता है। यह समय है, 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध का, इंदिरा गांधी के शीर्ष शासन काल तथा बांग्लादेश के निर्माण का। उसका एक बहुत करीबी दोस्त मेजर जिम्मी बिलिमोरिया न चाहते हुए भी उसे एक सरकारी षडयंत्र में घसीट लेता है। नैतिकता का मारा  गुस्ताद चक्रव्यूह में फंस गया है।

ऐसे ही तो मिस्त्री के तीन उपन्यासों को बुकर पुरस्कार की शॉर्ट लिस्ट में स्थान नहीं मिला है। वे दिखाते हैं, कैसे जब दीन-दुनिया बड़े-बड़े मसलों में उलझी होती है, एक आम आदमी चाहे-न-चाहे उनसे प्रभावित होता रहता है। वह अपने परिवार के लिए कुछ ढंग का करना चाहता है।

एक ओर उसके अपने सिद्धांत हैं, दूसरी ओर समाज के चालाक एवं भ्रष्ट तमाम लोग। ऐसे में वह अपनी मनुष्यता को कैसे बचाए रखे? वह विकास में विश्वास करता है, मगर विकास के नाम पर उसकी बिल्डिंग की दीवार गिराई जा रही है। अब वहां विज्ञापनों एवं कचड़े की भरमार होगी। यहां लेखक गंभीरता के साथ अपने नायक के पक्ष में खड़ा रहता है।

रोहिंग्टन मिस्त्री आसपास से घटनाओं को उठा कर अपनी कथा बुनते हैं। इस उपन्यास में बंबई स्वयं एक पात्र बन कर उभरता है। पाठक की इंद्रियों को जगाती कहानी कभी रसोई की गंध से पूरित है, तो कभी नाली की दुर्गंध से। कानों में कभी ट्रैफिक की आवाज आती है, तो कभी प्रार्थना की। आंखें गरीबी के साथ-साथ बाजार का मायाजाल भी देखती चलती हैं।

दीवारें प्रतियोगिता का अड्डा बनी हुई हैं, जो जितना शक्तिशाली उसका उतना वर्चस्व। हर धर्म दूसरे धर्म से बाजी मार ले जाना चाहता है। तय करना कठिन है, राज सत्ता और धार्मिक सत्ता में कौन ज्यादा पावरफुल है।

लेखक अपने समुदाय के लोगों के जीवन को दूसरे समुदाय तक पहुचाने का कार्य बखूबी करता है। मिस्त्री सदैव भारतीय पारसी परिवार की जटिलता का चित्रण करते हैं। यही उन्होंने ‘सच ए लॉन्ग जर्नी’, ‘ए फाइन बैलेंस’ और ‘फैमिली मैटर्स’ में किया है। ‘स्विमिंग लेसन्स एंड अदर स्टोरीज’ उनका कहानी संग्रह है। ‘द स्क्रीम’ उनका लघु उपन्यास है। अपने समय एवं समाज को समेटता उनका काम अपने आप में बहुत कुछ कहता है।

साहित्य में नैतिकता गए जमाने की बात हो गई है, इसी नैतिकता को उपन्यासकार गंभीरता तथा सूक्षता से रचता है। वे विश्वास करते हैं, साहित्यकार लोगों के जीवन, उनके सुख-दुख का ध्यान से अध्ययन कर बताए तो दुनिया में सच में कुछ जरूरी परिवर्तन हो सकता है। आज जब ऐसे दावे सनक की श्रेणी में आते हैं, तब भी वे गंभीरता एवं ईमानदारी से आम आदमी के अनुभवों को शब्द दे रहे हैं। उन्हें शब्दों पर अगाध विश्वास है।

रोहिंग्टन मिस्त्री अपने साहित्य में लोगों के रहन-सहन, उनके सहन करने के माद्दा को पाठक तक पहुंचाते है और दिखाते हैं, आम जन के पास कितनी मजबूत जिजीविषा है। परिस्थितियां उसके अस्तित्व को कुचलने का पूरा इंतजाम करती हैं, मगर वह लड़ता है, उसमें परिस्थितियों से लड़ने का हौसला है। यह प्रतिरोध अपने आपमें बहुत बड़ी शक्ति है। यह उसे जिलाए रखती है। शोहराब नोबेल पिता के बताए रास्ते पर नहीं चलता है, यह दु:खद है, पर क्या एक युवा को अपने जीवन निर्णय लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

आपातकाल का दौर

देश में आपातकाल घोषित हुआ है। आम आदमी को इससे कोई राहत नहीं मिली है, बल्कि उसकी मुसीबतें और अधिक बढ़ गई हैं। इस समय शक्तिशाली और अधिक शक्तिशाली हो गए हैं, दमनचक्र अपनी पूरी ताकत से शक्तिहीन को कुचलने में लगा हुआ है। लेकिन सब समाप्त नहीं हुआ है। हम सब इस कथन से परिचित हैं, ‘जब तक एक भी आंख में आंसू है, मनुष्यता बची रहेगी।’

आपातकाल के इसी कुकाल में कुछ लोग छोटे-छोटे ऐसे काम करते हैं, जो दया-सहानुभूति से भरे हुए हैं। क्रूरता से उनकी संवेदना नष्ट नहीं हुई है। ये लोग सिस्टम नहीं बदल पाते हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण, कुछ ऐसा जो मनुष्यता केलिए आवश्यक है, उसे बचा लेते हैं।

मिस्त्री का गद्य स्पष्ट, वाक्य सरल मगर कलात्मक होते हैं। वे दिखावा नहीं करते हैं, शब्दों की बाजीगर में पाठक को उलझाते नहीं हैं। कम शब्दों में प्रभावशाली लेखन उनकी एक विशेषता है। वे आराम से विषय में प्रवेश करते हैं और धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। जीवन न तो सरल होता है, न ही यहा सब समस्याओं का हल होता है।

रोहिंग्टन मिस्त्री दिखाते हैं कि हादसों एवं असफलताओं, निराशाओं के बावजूद लोग चलते रहते हैं, जीवित रहते हैं। कभी भी चलना पूरी तरह रोकते नहीं हैं। यह चलते रहना अस्तित्व का बना रहना है, हार न मानना जिजीविषा है। जीत न हो पर पूर्ण हताशा नहीं है। यही उनके लेखन की सफलता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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