कई बार आप दुनिया में लेखक के रूप में सम्मानित होते हैं, पर अपने देश में प्रतिबंधित। सलमान रुश्दी, नादीन गोर्डीमर, ज्यां पॉल सार्त्र, मोराबिया, टोनी मॉरीसन आदि तमाम लेखक इस श्रेणी में आते हैं। रूस के बोरिस पास्तरनाक ऐसे ही लेखक हैं। उनके उपन्यास ‘डॉक्टर जिवागो’ ने रूस में तूफान ला दिया। काफी समय तक इस किताब को रूस में प्रतिबंधित रखा गया।
1988 तक इस उपन्यास पर रूस में पाबंदी थी। लेखन में दम था और इसी के फलस्वरूप बोरिस पास्तरनाक को 1958 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया। कई सत्ता बहुत क्रूर होती है। उन्हें पुरस्कार ग्रहण करने जाने की अनुमति नहीं मिली। हालांकि लोग चोरी-छिपे उपन्यास पढ़ रहे थे। दबाव के कारण उन्हें पुरस्कार को नकारना पड़ा।
उपन्यास ‘डॉक्टर जिवागो’ इसके बाद भी 30 साल तक रूस में प्रतिबंधित रहा। केवल 1989 में उनके बेटे येवगेनी बोरिसोविच को स्टॉकहोम जाकर पिता का पुरस्कार लाने की अनुमति मिली।
रूसी भाषी बोरिस पास्तरनाक का जन्म 10 फरवरी 1890 को मॉस्को में हुआ था। नोबेल समिति ने कहा, ‘महान रूसी महाकाव्यात्मक परम्परा एवं समकालीन लयात्मक काव्य दोनों में महत्वपूर्ण उपलब्धि हेतु’। दो साल के भीतर 70 साल की उम्र में 30 मई 1960 को कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। अब उनका घर म्युजियम है। उनका पूरा नाम बोरिस लिओनिडोविच पास्तरनाक था।
आखिर क्या है ‘डॉक्टर जिवागो’ में कि रूस की सत्ता ने इसे रोका?
यह उपन्यास एक संवेदनशील मनुष्य एवं चल रहे युद्ध की विशद झांकी है। नायक युवा यूरी जिवागो एक डॉक्टर एवं कवि है। इस व्यक्ति की संवेदनशीलता इसके लिए वरदान है, शाप भी। चूकि लेखक स्वयं कवि है, उपन्यास काव्यात्मक गुण से भरपूर है।
पास्तरनाक की रचनाएं प्रकृति, जीवन, मनुष्यता और प्रेम का चित्रण हैं। ‘डॉक्टर जिवागो’ में भी ये सारी विशेषताएं मिलती हैं। यह 1905 के सोशलिस्ट आन्दोलन से प्रारंभ होकर द्वितीय विश्वयुद्ध तक चलता है। रचना बहुत सूक्ष्म तरीके से स्टालिनवाद, गुलाग, सामूहीकरण की आलोचना करती है।
रूस में इसे प्रकाशित करने को कोई राजी न था, पास्तरनाक ने किसी तरह पाण्डुलिपि इटली पहुंचवाई, यह पहले इटैलियन भाषा में प्रकाशित हुआ, फिर इंग्लिश में। जैसे युद्ध और क्रांति ने रूस को नष्ट कर दिया था, वैसे ही नायक डॉक्टर जिवागो का निजी जीवन भी नष्ट होता है। उपन्यास की शुरुआत युरी के अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होने से होती है। इस समय रूसी गांव सर्दी से जमे हुए थे। और यहीं से उपन्यास का मूड -हानि एवं तड़प स्थापित हो जाता है।
1965 की फिल्म ‘डॉक्टर जिवागो’
यह महागाथा है, रूस के उथल-पुथल और उसके बाद हुए खंड-खंड हुए रूस में आध्यात्मिक एकाकीपन, प्रेम की। तमाम भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ है और इस पर प्रसिद्ध सिने-निर्देशक डेविड लीन ने 1965 में इसी नाम से फिल्म बनाई, जिसमें ओमर शरीफ ने शानदार-जानदार अभिनय किया है। फिल्म में कहानी को प्रमुखता दी गई है, आध्यात्मिक पक्ष को उतना नहीं उभारा गया है। जूली क्रिस्टी ने लारा की भूमिका की है।
फिल्म को एक नहीं, दो नहीं, पांच-पांच (सर्वोत्तम स्क्रीनप्ले, सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफर, सर्वोतम सेट डेकोरेशन, सर्वोत्तम कॉस्ट्यूम डिजाइन, सर्वोत्तम म्युजिक) अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुए। फ्रेडी यंग को ब्रिटिश सोसायटी ऑफ सिनेमाटोग्राफर्स का सर्वोत्तम पुरस्कार भी मिला।