अनुभवजन्य लेखन में एक अधिकारिकता होती है। कुछ ऐसे रचनाकार हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन की त्रासदियों को शब्दों में पिरो कर कालजयी लेखन किया है। इतना ही नहीं वे नोबेल के मंच तक पहुंचे हैं। अर्नेस्ट हेमिंग्वे उनमें से एक हैं। वे एक बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे।
वे प्रथम विश्वयुद्ध में एम्बुलेंस ड्राइवर थे, बहुत अच्छे शिकारी थे (आज यह गुण नहीं माना जाता है।)। कुशल निशानेबाज, हथियारों के विशेषज्ञ थे। 21 जुलाई 1899 को प्रोटेस्टेंट परिवार में जन्में हेमिंग्वे को 10 वर्ष की उम्र में उनके पिता ने उन्हें उनकी पहली शॉट्गन दी थी।
हेमिंग्वे ने पत्रकार के रूप में 1923 में मुसोलिनी का साक्षात्कार लिया था, जिसमें उन्होंने मुसोलिनी को ‘यूरोप का सबसे बड़ा धोखेबाज कहा था। फलस्वरूप वे मुसोलिनी की आंख की किरकिरी बन गए। वे कहानीकार, उपन्यासकार, फोटोग्राफर के साथ-साथ मछली मार, शौक से जंगल में रहने वाले, आउटडोर एडवेंचरर, बुल फाइटर भी थे। वे पीने के लती थे, जिससे उनके शरीर को बहुत नुकसान पहुंचा। उन पर स्त्री विरोधी होने का आरोप भी लगता है, हालांकि उनका साहित्य इसकी पुष्टि नहीं करता है।
साहित्य के नोबेल से सम्मानित
1954 में अर्नेस्ट हेमिंग्वे को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उन्हें उनके समस्त कार्य पर पुरस्कार मिला पर समिति ने खासतौर पर ‘दि ओल्ड मैन एंड द सी’ का उल्लेख किया। उनके सात उपन्यास, छ: कहानी संग्रह, दो कथेतर गद्य की क्लासिकल कृतियां प्राप्त हेती हैं।
‘मेन विदआउट वीमेन’, ‘विनर टेक नथिंग’, ‘द फिफ्थ कॉलम एंड फर्स्ट फोर्टी-नाइन स्टोरीज’ कहानी संग्रह, ‘द सन आलसो राइजेज’, ‘टू हैव एंड हैव नॉट’ उपन्यास तथा ‘ड्थ इन दि आफ्टरनून’, ‘गॉड रेस्ट यू मेरी, जेंटलमेन’, ‘ग्रीन हिल्स ऑफ अफ्रीका’ तथा ‘द स्पैनिश अर्थ’ जैसे कार्य ‘द स्नोज ऑफ किलिमंजारो’ तथा ‘स शॉर्ट हैप्पी लाइफ ऑफ फ्रांसिस मैकोम्बेर’ ‘द फिफ्थ कॉलम’ नाटक उनके हैं।
कहा जाता है, उन्होंने अपने उपन्यास, ‘ए फेरवल टू आर्म्स’ का अंत 47 बार लिखा गया। ‘ए फेरवल टू आर्म्स’ हेमिंग्वे का तीसरा उपन्यास है। दर्जनों लेखन और पुनर्लेखन तथा स्क्रिबनर मैगजीन में प्रकाशित हुआ आत्मकथात्मक उपन्यास ‘ए फेरवल टू आर्म्स’ न तो युद्ध को ग्लोरीफाई करता है और न ही उसकी भर्त्सना करता है।
वह युद्ध को एक अंतहीन उबाऊ घटना कहता है, जहां सीमा पर तैनात लोगों को कुछ पता नहीं है कि यह कितने दिन चलेगा, इसका अंत क्या होगा। यह मात्र प्रथम विश्वयुद्ध की बात नहीं करता है, सारे युद्धों की बात करता है।
‘ए फेरवल टू आर्म्स’ के अंत की पंक्तियां देखिए, हेनरी (नायक) की मन:स्थिति समझने का प्रयास कीजिए: ‘लेकिन इसके बाद मैंने (नर्सों को) बाहर कर दिया और दरवाजा बंद किया तथा बत्तियां बुझा दीं, जो किसी तरह अच्छा न था। यह एक मूर्ति को अलविदा कहने के समान था। थोड़ी देर के बाद मैं बाहर गया और अस्पताल छोड़ दिया और बारिश में वापस होटल चलता चला गया।’
युद्ध तथा प्रेम कथानक वाला उपन्यास
युद्ध तथा प्रेम के कथानक वाला उपन्यास त्रासद न होकर लयात्मक तथा दयनीय है। ‘लॉस्ट जनरेशन’ की दयनीयता को प्रकट करती इस कहानी में नायिका कैथरीन और उसका बच्चा मर जाता है, युद्ध के भ्रम और निराशा-हताशा का शिकार अकेला हेनरी बच जाता है। एक ओर युद्ध है, दूसरी ओर हेनरी तथा कैथरीन की प्रेम कथा समानान्तर चलती है।
प्रकाशित होने पर खूब हलचल हुई, क्योंकि यह अलग था, चले आ रहे विक्टोरियन फ्लावरी साहित्य से बहुत भिन्न था, यह आधुनिक उपन्यास का प्रारंभ था। इसमें निर्दयता के साथ आदमी के कटने की भयंकरता, अंतहीन लालफीताशाही, अंतिम अध्याय में कैथरीन के कठिन प्रसव, उसकी यातना और मृत्यु को बिना किसी लागलपेट के चित्रित किया गया है।
यहां युद्ध की कुरुपता है, आंख मूंद कर आदेश का का पालन करना है, ‘तुम मरते हो।’...‘तुम्हें पता नहीं है यह सब क्यों हो रहा है। तुम्हारे पास सीखने-समझने का समय नहीं है... अंत में वे तुम्हें (वे सर्वव्यापी शक्तियां जो सब संचालित करती हैं) मार देंगी।...’