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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: स्कॉटलैंड का सिनेमा- डॉक्यूमेंट्री की बहार

सार

जॉन ग्रियर्सन को स्कॉटलैंड की ‘डॉक्यूमेंट्री फिल्म का जनक’ कहा जाता है। वे पहली समिति के पहले चेयरमैन थे। इन्होंने दो फिल्म- ‘ड्रिफ्टर्स’ तथा ‘नाइट मेल’ का निर्देशन भी किया और साथ ही ढेर सारी डॉक्युमेंट्री को प्रड्यूस किया।
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स्कॉटलैंड का सिनेमा - फोटो : iStock
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विस्तार
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जब स्कॉटलैंड में 1896 में एम्पायर पैलेस थियेटर (अब इसका नाम द फेस्टिवल थियेटर है) में सिनेमा का पहला प्रदर्शन हुआ तो दर्शक बहुत उत्तेजित नहीं थे, लेकिन जल्द ही दर्शकों की इसके साथ दोस्ती हो गई और इसीलिए तीस के दशक में यहां खूब बड़े-बड़े थियेटर बने। यह बढ़ोतरी प्रथम विश्वयुद्ध पहले शुरू हुई, एडिनबर्ग में 43 स्क्रीन थे। स्कॉटलैंड में तीस के दशक में फिल्में बनने लगीं। 

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इस समय तक यहां ‘द लिटिल मिनिस्टर’ (1913), ‘माइरी: द रोमांस ऑफ ए हाईलैंड मैडन’, ‘द हार्ट ऑफ मिड्लोथिअन’, ‘द लिटिल मिनिस्टर (1915), ‘किडनैप्ड’, ‘किल्टीज थ्री’, ‘द लिटिल मिनिस्टर’ (1921), ‘द लिटिल मिनिस्ट” (1922)’, ‘बोनी प्रिंस चार्ली’, ‘द ब्लैइक वाच’, ‘लव्स ऑफ रॉबर्ट बर्न्स’ आदि कई फिल्में बनीं।
 
अपनी फोटोजेनिक प्रकृति के कारण यह देश दुनियाभर के फिल्म और टेलीविजन के लिए फिल्म बनाने वालों को आकर्षित करता रहा है। यहां आकर इन निर्देशकों ने थ्रिलर, कॉमेडी तथा आर्ट फिल्में बनाईं। 

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मूक सिनेमा के दौर की फिल्में

मूक सिनेमा के दौरान यहां ऐसी फिल्में बन रही थीं, जिनमें स्कॉटलैंड की कहानियां, चरित्र अथवा थीम होती थीं। 1938 में यहां ‘फिल्म्स ऑफ स्कॉटलैंड’ की पहली समिति बनी। इसके बैनर तले स्कॉटिश जीवन के विविध पहलुओं पर फिल्म बनी जिनका उद्देश्य राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्कॉटलैंड को प्रमोट करना था। इसी साल ग्लासगो में एम्पायर प्रदर्शनी हुई, इसे करोड़ों लोगों ने देखा। 

जॉन ग्रियर्सन को स्कॉटलैंड की ‘डॉक्युमेंट्री फिल्म का जनक’ कहा जाता है। वे पहली समिति के पहले चेयरमैन थे। इन्होंने दो फिल्म- ‘ड्रिफ्टर्स’ तथा ‘नाइट मेल’ का निर्देशन भी किया और साथ ही ढेर सारी डॉक्युमेंट्री को प्रड्यूस किया।

प्रड्यूसर, लेखक जॉन ग्रियसन का जन्म 26 अप्रैल 1898 को स्कॉटलैंड में हुआ था। 19 फरवरी 1972 को इंग्लैंड में इनकी मृत्यु हुई। इसी साल इन्हें कनाडा का नागरिक न होते हुए भी ‘कम्पैनियन ऑफ ऑर्डर ऑफ कैनडा’ की पदवी देने की बात थी, मगर पिछले दिन ये गुजर गए।

1954 में स्कॉटलैंड में दूसरी फिल्म समिति बनी। इसने 1982 तक 150 से अधिक डॉक्युमेंट्री प्रड्यूस की। इसमें भी ग्रियसन का योगदान रहा और उन्हें 1968 में विश्व सिनेमा में योगदान केलिए गोल्डेन थिसल पुरस्कार मिला।

1954 की फिल्म ‘ब्रिगैडून’ में दो अमेरिकी शिकार के लिए स्कॉटललैंड की यात्रा पर हैं। उन्हें एक रहस्यमय गांव ब्रिगैडून मिलता है, लेकिन उन्हें मालूम नहीं है कि यह गांव जादुई है, जो सौ साल में केवल एक दिन के लिए नजर आता है। एक मुख्य किरदार, टोमी एल्ब्राइट गांव की एक स्त्री फिओना के प्रेम में पड़ जाता है। यदि कोई गांव छोड़ता है, तो उसका अस्तित्व सदा के लिए समाप्त हो जाएगा। अगर कोई बाहरी आदमी यहां के किसी को प्रेम करता है, तो उसे बाहरी दुनिया का सब कुछ छोड़ना होता है। मजेदार है न! प्रेम में आपको बाकी सब कुछ छोड़ना होता है।


सोन कॉनरी और इनका अभिनय

स्कॉटलैंड ने कुछ बड़े सितारे सिने-दुनिया को दिए हैं। इसमें एक सर्वाधिक सितारा है, सोन कॉनरी है। इस अभिनेता ने ब्रिटिश उपन्यासकार इआन फ्लेमिंग के एक चरित्र जेम्स बॉन्ड को ‘डॉ. नो’ फिल्म में सबसे पहले परदे पर उतारा। 1958 के बाद यह इतिहास बन गया क्योंकि इस चरित्र पर अब तक 25 फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें से सोन कोनरी ने ‘फ्रॉम रशिया विद लव’, ‘गोल्डफिन्गर’, ‘थंडरबॉल’, ‘यू ओनली लिव ट्वाइस’, ‘डिमंड्स आर फोरएवर’ तथा ‘नेवार से नेवर अगैन’ फिल्म में इस पात्र को निभाया है।

इतना ही नहीं, अभी कुछ साल पहले ‘फ्रॉम रशिया विद लव’ नामक खेल में उन्होंने अपनी आवाज भी दी है। सोन कोनरी के अलावा डेबोराह केर, गेरॉल्ड बटलर, पीटर मुलान भी स्कॉटलैंड से हैं।

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फिल्म- ‘द ट्रेजडी ऑफ मेकबेथ’ का दृश्य - फोटो : Twitter

ऐतिहासिक चरित्रों पर बनी फिल्में

स्कॉटलैंड के ऐतिहासिक चरित्रों पर कई फिल्में बनी हैं। इनमें से एक बायोपिक है ‘मेरी क्वीन ऑफ स्कॉट्स’ (2018), इस दो घंटे की फिल्म का निर्देशन जोसी रोरेक ने किया है और इसमें मुख्य कलाकार शोसा रोनान तथा मार्गोट रोबी हैं। मेरी क्वीन पर पहले भी, यहां तक कि मूक सिनेमा काल में भी फिल्म बनी। एक फिल्म एल्फ्रेड क्लार्क ने 1895 में ‘दि एक्जक्युशन ऑफ मेरी, क्वीन ऑफ स्कॉट्स’ नाम से बनाई। एक और फिल्म आज से सौ साल पहले 1923 में ‘द लव्स ऑफ मेरी क्वीन ऑफ स्कॉट्स’ नाम से डेनिसन क्लिफ ने बनाई थी।

इसके काफी पहले 1995 में एक और बायोपिक बनी थी, नाम था ‘ब्रेवहार्ट’। 5 ऑस्कर प्राप्त इस करीब तीन घंटे की फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध अभिनेता मेल गिब्सन ने किया है और प्रमुख भूमिका भी मेल गिब्सन ने की है। यह स्कॉटिश योद्धा विलियम वैलस की जीवनी है, जो अपने देशवासियों को इंग्लैंड के किंग एडवर्ड प्रथम से स्वतंत्र करा कर अपने देश लाता है।

इसी साल एक और बायोपिक ‘रॉबरॉय’ नाम से बनी है, इसमें 1713 का रॉब रॉय तथा उसका भतीजा एक नोबेलमैन के गलत व्यवहार के कारण बदला लेने के लिए कानून के बाहर जा कर काम करते हैं। सवा दो घंटे की इस फिल्म में लिआम नीसन ने भुख्य भूमिका की है और निर्देशन माइकेल कैटॉन-जॉन्स का है। ‘बॉब रॉय’ नाम से आर्दर विवियन ने 1911 तथा इसी नाम से ड्ब्ल्यु. पी. केलिनो ने 1022 में फिल्म बनाई थी।

‘मेकबेथ’ पर बनी फिल्म

शेक्सपियर एक ऐसा नाटककार है, जिसकी रचनाओं पर कई फिल्म बनी हैं, एक ही नाटक पर कई-कई फिल्म बनी हैं। हर बड़ा निर्देशक यह महत्वाकांक्षा रखता है कि वह इस नाटककार के काम को परदे पर उतारे। ‘मेकबेथ’ ऐसा ही नाटक है। इस पर कई बार फिल्म बनी है, भारत में भी विशाल भारद्वाज ने कुछ साल पहले ‘मकबूल’ बनाई थी।

इस बेरहम स्कॉटिश राजा पर प्रसिद्ध निर्देशक रोमन पोलांस्की ने भी 1971 में फिल्म बनाई। इस 2 घंटे 20 मिनट की फिल्म का लेखन भी उन्होंने ही किया है। फिल्म का मूल नाम रखा गया है, ‘द ट्रेजडी ऑफ मेकबेथ’। इसे बाफ्टा पुरस्कार प्राप्त हुआ। ‘रेस्टलेस नेटिव्स’ नाम से एक फिल्म 1985 में बनी।

इस इक्कीसवीं सदी में स्कॉटलैंड से कई अच्छी फिल्में आई हैं, जिनमें से कुछ को देखते हैं।

2008 में एक फिल्म ‘स्टोन ऑफ डेस्टिनी’ नाम से आई, लेकिन कमाल किया 2013 की फिल्म ‘अंडर द स्किन’ ने। इस फिल्म में एक रहस्यमयी युवती स्कॉटलैंड में एक अकेले आदमी को शाम के समय लुभाती है। स्कारलेट जॉन्ससन अभिनीत इस फिल्म में नायिका आदमी को लुभाने की प्रक्रिया में खुद को भी समझती और पाती है।

इसे निर्देशक जोनाथन ग्लैजेर ने बनाया है, उसी ने वॉल्टर कैम्पबेल तथा मिशेल फैबर के साथ मिल कर फिल्म का स्क्रीनप्ले तैयार किया है। 2012 में ब्रैव’ नाम से एक एनीमेटेड फिल्म बनी यह काल्पनिक मध्यकालीन स्कॉटलैंड में अवस्थित है। इसमें राजकुमारी मेरीडा घुड़सवारी और तीरांदाजी करती है। वह अपनी मां के खिलाफ जाती है और राजधानी में गड़बड़ी मच जाती है। 

स्कॉटलैंड के सिनेमा की लोकप्रियता बढ़ रही है।




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यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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