‘मैं फिल्म एडिटर हूं और मैं सोचती हूं कि बहुत अच्छी हूं’ आत्मविश्वास के साथ कहने वाली रेणु ने टेलीविजन यानी दूरदर्शन, लघु फिल्म और डॉक्यूमेंट्री की एडिटिंग के साथ-साथ मुख्यधारा की फिल्मों जैसे ‘1942: ए लव स्टोरी’, ‘कभी हां कभी न’, ‘परदेश’, ‘हैदराबाद ब्लूज’ आदि की एडिटिंग की।
फिल्म- ‘परिंदे’
बतौर एडिटर ‘परिंदे’ उनकी मुख्यधारा की पहली फिल्म थी। उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा, सुधीर मिश्रा, शेखर कपूर, गोविंद निहलाणी, कुंदन शाह, महेश भट्ट जैसे प्रसिद्ध सिने-निर्फेशकों के साथ काम किया। ‘कलकत्ता मेल’ उनकी एडिट की अंतिम फिल्म थी, जो उनके जाने के बाद 2003 में रिलीज हुई।
उनकी लोकप्रियता ऐसी है कि 2006 में एफटीआईआई के एलमनस एसोसिएशन ने उन पर एक किताब- ‘इनविजिबल-दि आर्ट ऑफ रेणु सलूजा’ रिलीज की। जब सुधीर मिश्रा ने 2005 में ‘हजारों ख्वाइशें ऐसी’ बनाई तो उन्होंने यह फिल्म रेणु सलूजा को समर्पित की। इतना ही नहीं 2006 से उनके नाम पर एडिटिंग का पुरस्कार दिया जाने लगा है।
2009 में एफटीआईआई के एलमनस एसोसिएशन GraFTII तथा ई-सिटी ने संयुक्त रूप से उनकी फिल्मों का समारोह मनाया जिसमें उन पर बनाई डॉक्यूमेंट्री दिखाई। इस डॉक्यूमेंट्री में उनके साथ काम करने वाले निर्देशकों ने अपने-अपने संस्मरण साझा किए हैं। यही नहीं, नवम्बर 2021 में उनके सम्मान में एफटीआईआई ने अपने स्क्रीनिंग ऑडिटोरियम का नाम ‘रेणु सलूजा ऑडिटोरियम’ कर दिया।
‘जाने भी दो यारो’ का महाभारत सीन
‘जाने भी दो यारो’ का महाभारत की पैरोडी वाला सीन मात्र 30 मिनट चलता है, जबकि कई घंटो में फिल्म के इस दृश्य का फिल्मांकन किया गया था। रेणु सलूजा इस पूरे फिल्मांकन के दौरान उपस्थित थीं। उन्हें फिल्म के मूड तथा टेम्परामेंट की पूरी जानकारी थी। उन्होंने अपनी एडिटिंग, अपने जादू से उसे सही गति एवं लय दी, उसे समय सीमा के भीतर ला दर्शकों को फिल्म का सही अनुभव अनुभव कराया।
आज ‘जाने भी दो यारों’ की गिनती क्लासिकल फिल्मों में होती है और अध्ययन-अध्यापन हेतु इसका उपयोग किया जाता है। बिंदास रेणु सलूजा के लिए नसीरुद्दीन शाह ऐसे ही नहीं कहते हैं, ‘वह फिल्म एडिटर से कहीं बहुत अधिक थी। वह फिल्ममेकर थी।’ एक मजेदार बात, ‘जाने भी दो यारो’ में एक बुरका पहने औरत कुछ पलों केलिए परदे पर आती है, फिल्म में जिसका बुरका मृत डेमेलो सोच कर अभिनेता पंकज कपूर उठाते हैं और बदले में झन्नाटेदार थप्पड़ खाते हैं। यह बुरका वाली स्त्री रेणु सलूजा ही थीं। उनका नाम फिल्म के सहायक निर्देशक के रूप में भी इस फिल्म में आता है।
प्रसिद्धि की बात भूल जाइए, एडिटर गुमनाम रहते हैं। जबकि सत्यजित राय ने कहा था, ‘एडिटिंग वह सोपान है जहां फिल्म वास्तव में जीवन अपती है।’ इतनी काबिल फिल्म एडिटर रेणु सलूज भी फिल्म से गहराई से जुड़े लोगों के समूह के बाहर अनजान हैं। उन्हें स्मरण किया जाना चाहिए।
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