फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: कमाल की सिने-एडिटर रेणु सलूजा

सार

बतौर एडिटर ‘परिंदे’ उनकी मुख्यधारा की पहली फिल्म थी। उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा, सुधीर मिश्रा, शेखर कपूर, गोविंद निहलाणी, कुंदन शाह, महेश भट्ट जैसे प्रसिद्ध सिने-निर्फेशकों के साथ काम किया। ‘कलकत्ता मेल’ उनकी एडिट की अंतिम फिल्म थी, जो उनके जाने के बाद 2003 में रिलीज हुई।
विज्ञापन
सिनेमा के पीछे की दुनिया - फोटो : Adobe Stock
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

5 जुलाई 1952 को जन्मी रेणु सलूजा यदि कैंसर से हार न जातीं तो न मालूम कितने और कमाल करतीं। मगर वो मात्र 48 साल की उम्र में 16 अगस्त 2000 को इस दुनिया से चली गईं।

विज्ञापन


हममें से अधिकांश ने ‘जाने भी दो यारों’, ‘1942: ए लव स्टोरी’, ‘सरदार’, ‘गॉडमदर’, ‘बैंडिट क्वीन’ आदि फिल्में देखी और सराही हैं। इनके निर्देशकों के नाम से भी हम परिचित हैं। मगर निर्देशक के विजन को पूरा करके परदे तक पहुंचाने वाले का नाम जानने का प्रयास शायद ही करते हैं।

यदि फिल्म के रॉ फुटेज देखें तो सारा कुछ अजीब गड़बड़झाला लगता है, कुछ समझ में नहीं आएगा। मगर शूट की गई हजारों फुटेज फिल्म को कांट-छांट कर, उसे मुकम्मल कर दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करने का कठिन काम एडिटर करता है। वही है जो दृश्यों में तारतम्य बिठा कर उसे अर्थवत्ता प्रदान करता है। इसी कमाल के एडिटिंग कार्य के लिए रेणु सलूजा सदैव स्मरण की जाएंगी।

विज्ञापन

चार बार मिला नेशनल फिल्म पुरस्कार

एडिटिंग हेतु चार बार नेशनल फिल्म पुरस्कार तथा दो बार सर्वोत्तम एडिटिंग केलिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से नवाजे जाने वाली रेणु सलूजा ने 1976 में पुणे के फिल्म एंड टेलिविजन संस्थान से निकल कर पुरुषों के क्षेत्र में कदम रखने की जुर्रत की और इस क्षेत्र के शीर्ष पर पहुंचीं। जी हां, उस समय एडिटिंग पर एकमात्र पुरुषों का अधिकार माना जाता था।

रेणु ने इस मिथ को तोड़ा। इसके पहले अरुणा राजे जैसी एकाध महिलाओं ने इस क्षेत्र में कुछ काम किया था। वैसे तो रेणु ने पुणे में निर्देशक के कोर्स के लिए आवेदन किया था, मगर एडिटिंग में प्रवेश मिला। 

1976 में ही पहले-पहल उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा की डिप्लोमा फिल्म ‘मर्डर एट मंकी हिल’ की एडिटिंग की। फिल्म को सर्वोत्तम इक्सपेरिमेंटल फिल्म का नेशनल फिल्म पुरस्कार मिला और रेणु को फिल्म क्रेडिट्स में एडिटर तथा सहायक निर्देशक का नाम मिला। उन्होंने अपने इसी साथी विधु विनोद चोपड़ा से उन्हीं दिनों विवाह किया। परंतु बाद में, 1983 में दोनों का संबंध टूट गया।

अलग होने के बाद भी वे विधु विनोद चोपड़ा की फिल्मों की एडिटिंग करती रहीं और उनकी सहायक निर्देशक भी बनी रहीं। पांच साल बाद रेणु ने 1988 में सुधीर मिश्रा से विवाह किया। 

फिल्म ‘परिंदे’, ‘धारवी’, ‘सरदार’ तथा ‘गॉडमदर’ केलिए नेशनल और ‘परिंदे’ एवं ‘1942: ए लव स्टोरी’ केलिए फिल्मफेयर और ‘इस रात की सुबह नहीं’ के लिए उन्हें स्टार स्क्रीन पुरस्कार प्राप्त हुआ।

रेणु ने मुख्यधारा और कला दोनों तरह की फिल्मों की एडिटिंग की। पुणे संस्थान से निकल कर सबसे पहले उन्होंने 1980 में क्लासमेट सईद मिर्जा की फिल्म ‘एल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ की एडिटिंग की। काफी समय तक वे अपने पुणे क्लास-साथियों, जैसे विधु विनोद चोपड़ा, सईद मिर्जा, कुंदन शाह, अशोक आहूजा आदि के साथ काम करती रहीं।

‘एलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’, ‘जीने भी दो यारों’, ‘सजा-ए-मौत’, ‘अर्ध  सत्य’, ‘तर्पण’, ‘पेस्टनजी’ आदि उनकी एडिट की हुई ऑफबीट फिल्में हैं। इनमें से कुछ बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रहीं।

विज्ञापन

सिनेमा का इतिहास - फोटो : Freepik
‘मैं फिल्म एडिटर हूं और मैं सोचती हूं कि बहुत अच्छी हूं’ आत्मविश्वास के साथ कहने वाली रेणु ने टेलीविजन यानी दूरदर्शन, लघु फिल्म और डॉक्यूमेंट्री की एडिटिंग के साथ-साथ मुख्यधारा की फिल्मों जैसे ‘1942: ए लव स्टोरी’, ‘कभी हां कभी न’, ‘परदेश’, ‘हैदराबाद ब्लूज’ आदि की एडिटिंग की।

फिल्म- ‘परिंदे’

बतौर एडिटर ‘परिंदे’ उनकी मुख्यधारा की पहली फिल्म थी। उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा, सुधीर मिश्रा, शेखर कपूर, गोविंद निहलाणी, कुंदन शाह, महेश भट्ट जैसे प्रसिद्ध सिने-निर्फेशकों के साथ काम किया। ‘कलकत्ता मेल’ उनकी एडिट की अंतिम फिल्म थी, जो उनके जाने के बाद 2003 में रिलीज हुई।

उनकी लोकप्रियता ऐसी है कि 2006 में एफटीआईआई के एलमनस एसोसिएशन ने उन पर एक किताब- ‘इनविजिबल-दि आर्ट ऑफ रेणु सलूजा’ रिलीज की। जब सुधीर मिश्रा ने 2005 में ‘हजारों ख्वाइशें ऐसी’ बनाई तो उन्होंने यह फिल्म रेणु सलूजा को समर्पित की। इतना ही नहीं 2006 से उनके नाम पर एडिटिंग का पुरस्कार दिया जाने लगा है।

2009 में एफटीआईआई के एलमनस एसोसिएशन GraFTII तथा ई-सिटी ने संयुक्त रूप से उनकी फिल्मों का समारोह मनाया जिसमें उन पर बनाई डॉक्यूमेंट्री दिखाई। इस डॉक्यूमेंट्री में उनके साथ काम करने वाले निर्देशकों ने अपने-अपने संस्मरण साझा किए हैं। यही नहीं, नवम्बर 2021 में उनके सम्मान में एफटीआईआई ने अपने स्क्रीनिंग ऑडिटोरियम का नाम ‘रेणु सलूजा ऑडिटोरियम’ कर दिया।

‘जाने भी दो यारो’ का महाभारत सीन

‘जाने भी दो यारो’ का महाभारत की पैरोडी वाला सीन मात्र 30 मिनट चलता है, जबकि कई घंटो में फिल्म के इस दृश्य का फिल्मांकन किया गया था। रेणु सलूजा इस पूरे फिल्मांकन के दौरान उपस्थित थीं। उन्हें फिल्म के मूड तथा टेम्परामेंट की पूरी जानकारी थी। उन्होंने अपनी एडिटिंग, अपने जादू से उसे सही गति एवं लय दी, उसे समय सीमा के भीतर ला दर्शकों को फिल्म का सही अनुभव अनुभव कराया। 

आज ‘जाने भी दो यारों’ की गिनती क्लासिकल फिल्मों में होती है और अध्ययन-अध्यापन हेतु इसका उपयोग किया जाता है। बिंदास रेणु सलूजा के लिए नसीरुद्दीन शाह ऐसे ही नहीं कहते हैं, ‘वह फिल्म एडिटर से कहीं बहुत अधिक थी। वह फिल्ममेकर थी।’ एक मजेदार बात, ‘जाने भी दो यारो’ में एक बुरका पहने औरत कुछ पलों केलिए परदे पर आती है, फिल्म में जिसका बुरका मृत डेमेलो सोच कर अभिनेता पंकज कपूर उठाते हैं और बदले में झन्नाटेदार थप्पड़ खाते हैं। यह बुरका वाली स्त्री रेणु सलूजा ही थीं। उनका नाम फिल्म के सहायक निर्देशक के रूप में भी इस फिल्म में आता है। 

प्रसिद्धि की बात भूल जाइए, एडिटर गुमनाम रहते हैं। जबकि सत्यजित राय ने कहा था, ‘एडिटिंग वह सोपान है जहां फिल्म वास्तव में जीवन अपती है।’ इतनी काबिल फिल्म एडिटर रेणु सलूज भी फिल्म से गहराई से जुड़े लोगों के समूह के बाहर अनजान हैं। उन्हें स्मरण किया जाना चाहिए।


-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें