कलकत्ते में काफी संघर्ष के बावजूद वे अपने खानदानी पेशे में मन न लगा सके और जतिन दास के शिष्य बने। यह एक रोचक कथा है, जो काम के प्रति उनकी दृढ़ता प्रदर्शित करती है। उन दिनों विशेषज्ञों में अपनी कला को छिपाकर रखने की प्रवृति थी और वे अपने सहयोगियों से बड़ा रूखा और कठोर व्यवहार करते थे।
घर वालों के न चाहने के बावजूद उन्होंने एक फिल्म लैब में काम शुरू किया। आश्चर्य उनके पिता ने आपत्ति न की। उन दिनों निगेटिव को हाथ से धोया जाता और काम करने का स्थान बहुत बुरी स्थिति में होता था। अत: लोग जल्द ही बीमार पड़ते और अक्सर मर जाते थे। ऐसे ही एक व्यक्ति द्वारा रिक्त स्थान पर राधु को काम मिला।
भागवत वाशीकर से सीखा कैमरा चलाना
इस काम को करते हुए वे मौका मिलते भाग कर स्टूडियो जाते और कैमरा संचालन ध्यान से देखते और जब कोई नहीं होता तो कैमरा भी परखते। उनकी यह चोरी एक दिन पकड़ी गई और कैमरामैन भागवत वाशीकर ने उनकी लगन से प्रभावित हो उन्हें सिखाना स्वीकार किया। इस तरह राधु का प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ। वैसे सैद्धांतिक शिक्षा का उन्हें अवसर नहीं मिला। वाशीकर ने जो कृपा राधु पर की वे उसे कभी नहीं भूले और एवज में उन्होंने जरूरत पड़ने पर दूसरों की सहायता की।
इसके बाद करीब छ: साल उन्होंने जतीन दास की शागिर्दी की। राधु उस जमाने के व्यक्ति थे, जो एहसान कभी नहीं भूलते हैं और जिसके साथ जुड़ते हैं, उसके प्रति सदैव वफादार बने रहते हैं। उन्हें कई अन्य स्थानों से बेहतर प्रस्ताव मिले मगर वे जतीन दास के प्रति वफादार बने रहे। इसी तरह जब वे राज कपूर से जुड़े तो उनके प्रति भी ईमानदार रहे और राज कपूर के मर्दवादी तथा सामंती रवैये के बावजूद उनसे एक लंबे समय तक जुड़े रहे।
राज कपूर को वे एक बहुत बड़ा फिल्म जानकार, महान निर्देशक और दिलदार मानते हैं, साथ ही उनकी कमियों का भी उल्लेख करते हैं। वे राज कपूर के सबसे विश्वस्त सिनेमाटोग्राफर थे।
विभिन्न विचार-पद्धतियों और जीवन-शैलियों को राधु करमाकर प्रेम भाव से देखते थे, मगर गलत को गलत कहने में हिचकते नहीं थे इसीलिए ईमानदार लोग उन्हें पसंद करते थे और इसी कारण वे कई भिन्न विचार वाले लोगों के साथ काम कर सके। वे आदमी पहचानना जानते थे और लोगों के गुणों की कद्र करते थे। खुले मन से उनकी प्रशंसा करने में हिचकते नहीं थे।
राधु अपने समय के बड़े सिनेमाटोग्राफर, जैसे जतिन दास, नितिन बोस, दिलीप गुप्ता को बड़े प्रेम और आदर के साथ याद करते हैं। कई फिल्मों की तकनीकि खूबियों को बताते हैं, कई की कमियां गिनाते हैं। सरकार की नीतियों की पड़ताल करते हुए वे सरकार को कुछ सुझाव भी देते हैं। उनके जीवन में कई अच्छे लोग आए, कई लोगों ने उन्हें तंग समय में सहायता की और राधु ने भी कई लोगों की दोस्ती आजीवन निभाई कई लोगों को मुसीबत में सहारा दिया।
कैमरामैन का काम प्रशिक्षण की मांग करता है। हमारे देश में कुछ समय पहले तक कैमरा प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था नहीं थी। आज यह सुविधा हमारे यहां है। पहले के कुछ जुनूनी कैमरा प्रेमियों ने कैमरा संचालन की शिक्षा दूसरों की शागिर्दी और अपनी लगन से प्राप्त की। ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘संगम’, ‘सन्यासी’, ‘ प्रेम रोग’, ‘मिलन/नौका डूबी’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘जागते रहो’, ‘सपनो का सौदागर’, ‘जिस देश में गंगा बहती’, बेईमान’, ‘बॉबी’ और कई फिल्में ऐसे ही प्रशिक्षित राधु करमाकर के कैमरे द्वारा बनाई हैं।
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