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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मलेशिया सिनेमा और छाया नाटक का विस्तार

सार

मलेशिया की फिल्मों पर भारत का प्रभाव रहा है। मलाया भाषा में पहली फिल्म ‘लैला मजनू’ बनी। चौथे प्रधानमंत्री डॉ. महाथिर मोहम्मद के साथ यहां एनीमेशन फिल्में बनने लगीं क्योंकि वे सूचना एवं संचार तकनीकि के पक्ष में थे। 1995-2015, बीस साल के दौरान मलेशिया में करीब 200 एनिमेशन फिल्मों का निर्माण हुआ।
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मलेशिया फिल्मों का इतिहास - फोटो : Istock
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विस्तार
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1963 से पहले मलेशिया का नाम मलाया या ब्रिटिश मलाया था। 1957 में इसने स्वतंत्रता हासिल की और पहले द फेडरेशन ऑफ मलाया और फिर नाम परिवर्तित होने पर मलेशिया बना। मलेशिया में सिनेमा और सिनेमा जाने वालों को अक्सर ‘पैन्गुन्ग वैयान्ग’ कहते हैं। यहां पैन्गुन्ग का अर्थ थियेटर, मंच और यहां तक कि दर्शक भी है तथा वैयान्ग का मतलब परम्परागत पुतली थियेटर। वैयान्ग को ‘गैम्बर’ से जोड़ कर भी बोलते हैं, जिसका अर्थ है, चित्र, चित्रांकन, फोटो मतलब मूवी।

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विश्व सिनेमा में मलेशिया की फिल्मों की बात प्रमुखता से नहीं होती है। शायद ही इसका कहीं उल्लेख होता है। मलेशिया में यहां के छाया-नाट्य तथा थियेटर में सिनेमा की जड़ें हैं, जो यहां सदा से बहुतायत से रही हैं। छाया-नाट्य, फिल्मों की भांति सफेद परदे का उपयोग करता है। मूक सिनेमा की तरह छाया-नाट्य में भी ध्वनि तथा संगीत का प्रयोग अलग से होता है।

मूक फिल्मों के दौर में वादक परदे और दर्शकों के सामने वैठ कर पियानो-बैंड आदि बजाते थे, पुतली-छाया नाट्य में भी संवाद-संगीत पीछे से दिया जाता है। हालांकि सिनेमा के सवाक होते ही यह सब बदल गया। इसी कारण यहां के अभिनेताओं को परिवर्तित होकर सिने-अभिनेता बनने में खास दिक्कत न हुई और इनमें से कई आगे चल कर सिने-निर्देशक भी बने। 
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मलेशिया में पहले-पहल फिल्म स्क्रीनिंग 1897 में अल्हाम्ब्रा थियेटर हाल में सिंगापुर में हुई थी, जिन्हें ब्रिटेन के रॉबर्ट विलियम पॉल ने प्रदर्शित किया था। जिसमें लघु फिल्मों की शृंखला दिखाई गई थी। बाद में यहां के दर्शकों ने ‘सिंड्रेला एंड हर ग्लास स्लिपर’, ‘मेस्मेरिज्म एंड वन्डरफुल ड्रीम लाइफ पैशन ऑफ क्राइस्ट’, तथा एडविन एस. पोर्टर की ‘द ग्रेट ट्रेन रोबरी’ भी देखी। 1913 तक मलाया पेनिन्सुला में करीब 14 थियेटर थे। 1929 में सोलह शहरों में 35 थियेटर थे और छोटे शहरों में 10-12 थियेटर आम बात थी।


मलेशियन फिल्मों पर भारत का प्रभाव

मलेशिया की फिल्मों पर भारत का प्रभाव रहा है। मलाया भाषा में पहली फिल्म ‘लैला मजनू’ बनी। यह 1933 में हुआ मगर इसे बनाने वाले केवल मलाया के लोग ही न थे। इसे बनाने में मलाया के अलावा इंडोनेशिया के लोग भी शामिल थे। इनमें से अधिकतर लोग किसी-न-किसी परम्परागत कला से जुड़े हुए थे। इसीलिए उन्हें स्टेजक्राफ्ट, अभिव्यक्ति तथा अभिनय की आधारभूत जानकारी थी। बाद में इसी नाम से कई बार फिल्म बनी। यह भारत का प्रभाव था। भारत में भी ‘लैला मजनू’ फिल्म बहुत बार बनी है।

चालीस के दशक में यहां ‘मुतिअरा’ (पर्ल), ‘बेरमाडु’ (पोलीगैमी), टोपेंग शैतान’ (मास्क ऑफ द देवी), ‘हैंचुर हैटी’(हार्ट ब्रोएअ), ‘इबु तिरी’(स्टेपमदर), ‘तीगा केकैसिह’ (थ्री लवर्स) तथा ‘तेरैंग बुलान डी मलाया’ (फुल मून इन मलाया) जैसी फिल्में बनीं। जब 1941-1945 में मलाया पर जापान का आधिपत्य रहा तो यहां ढेर सारी प्रोपेगंडा फिल्में बनीं।

इनमें ‘मार्च टू सिंगापुर’, ‘ए नाइट इन चाइना’ आदि फिलें प्रमुख हैं। इसी समाय चैपलिन की ‘सिटी लाइट्स’ की तर्ज पर ‘टोकियो सिंफनी’ बनी और पता नहीं कैसे इसे दिखाने भी दिया।

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पचास के दशक में मलाया फिल्मों में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा जिसका मुख्य कारण था स्थानीय लोगों का सिने-निर्देशन की दिशा में आगे आना था। ये लोग अधिक वास्तविक तथा वांछिनीय फिल्म बनाए लगे। ये मलेशिया के जीवन से जुड़े मुद्दों को उठा रहे थे। आधुनिक सभ्यता पर टिप्पणी कर रहे थे। इस समय काफी लोग मलेशिया छोड़ कर रोजगार की खोज में सिंगापुर पलायन कर रहे थे और अपनी जड़ों से, अपनी परम्परा से, अपनी संस्कृति से दूर हो रहे थे।

इस काल की मलाया फिल्में इन बातों को अपनी फिल्मों में उठा रही थीं। इसी समय ‘विस्ट्फुल रीड’ बनी इसे बी. एस. राजहंस ने निर्देशित किया था और इसमें इंडोनेशिया के कलाकार शरीफ मेडान ने भूमिका की थी। यह मलेशिया की पहली रंगीन फिल्म है।

साठ के दशक की फिल्में मुख्य रूप से हास्य फिल्में थीं। इसी समय ‘शी-वैम्पायर’ फिल्म सिरीज भी बनी, लेकिन इसी समय बनी फिल्म ‘ग्रैंडसन ऑ लोर्ड मेराह’ भिन्न प्रकृति की थी। सत्तर के दशक में ‘लव एंड सॉन्ग’ म्युजिकल फिल्म बनी।


90 के दशक में एनिमेशन फिल्में

चौथे प्रधानमंत्री डॉ. महाथिर मोहम्मद के साथ यहां एनीमेशन फिल्में बनने लगीं क्योंकि वे सूचना एवं संचार तकनीकि के पक्ष में थे। 1995-2015, बीस साल के दौरान मलेशिया में करीब 200 एनिमेशन फिल्मों का निर्माण हुआ। ये फिल्में देश के बाहर भी देखी गईं। एनीमेशन फिल्म ‘गैंग: दि एडवेंचर बिगिंन्स’ ने बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाई की। यह मलेशिया के अलावा इंडोनेशिया, सिंगापुर, भारत में भी देखी गई। निजाम रजक द्वारा निर्देशित यह फिल्म मलेशिया के जंगल में चलती है जहां कुछ युवा और बच्चे दूसरे डाइमेंशन के जीवों के संपर्क में आते हैं।

मलेशिया के सिने-निर्देशक, स्क्रिप्टराइटर तथा एक्टर एडमैन बिन मोहम्मद सालेह, जो एडमैन सालेह के नाम से जाने जाते हैं, उन्होंने अब तक मात्र तीन फिल्में बनाई हैं जिसमें ‘ब्युटीज ऑफ द नाइट’ एक भाई की अपनी बहन की खोज से जुड़ी है, ‘अमोक’ परम्परा के साथ ‘येलो कल्चर’ यानि पतनशील व्यवहार को दिखाती है। ये दोनों फिल्में उन्होंने पिछली सदी में बनाई। इस सदी में उन्होंने बनाई ‘पालोह’ (2003, पालोह टाउन)। फिल्म द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान एक युवक की चिंताओं, परेशानियों भरे अनुभवों को साझा करती है। इस समय जापान ने देश को अधिकृत कर लिया है।

यह फिल्म पहली बार चीनी व्यक्ति के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया दिखाती है। चीनी व्यक्ति जो उथल-पुथल में फंसकर अपनी मानसिक शांति खो बैठा है। यह अपने समय से आगे की फिल्म है। उस समय कई दर्शकों को फ्लैशबैक समझ में न आया और वे पूरी फिल्म देखे बगैर उठ जाते थे।

राजा अहमद अलाउद्दीन ने भी 1990 में ‘द हार्ट इज नॉट ए क्रिस्टल’, 1996 में ‘वैली ऑफ वेंजेन्स’ पिछली सदी में बनाई और 2005 में ‘कैसी एंड लैला’ (द लवर्स) बनाई तथा 2007 में ‘कैयांगन’ (फैंटसी) बनाई। इसी समय टेलेविजन कमर्शियल्स के निर्देशक सी. एल. होर ने भी फिल्मी दुनिया में प्रवेश किया और उन्होंने 2008 में ‘द थर्ड जेनेरेशन’ फिल्म चीनी भाषा में बनाई।

फिल्म बताती है कि परिवार का जमा किया गया धन तीसरी पीढ़ी तक नहीं पहुंचेगा। उन्होंने ही ‘किन्टा’ कुंगफू एक्शन फिल्म बनाई थी। 2010 में एक और एक्शन फिल्म ‘द गिफ्ट’ यहां बनी। हिजमुद्दीन राइस ने एक विद्रोही फिल्म ‘फ्रॉम जेमापोह टू मैनचेस्टर’ 2001 में बना कर मलेशिया के युवाओं को आवाज दी कि वे मलाया संस्कृति अथवा यहां की राजनीति के नियंत्रण में न रह कर अपने जीवन की बागडोर स्वयं संभालें।

यदि हम देखें तो पाएंगे कि मलेशिया का सिने-इतिहास निरंतर विकासशील है।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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