के. के. महाजन ने आर्ट फिल्म तथा कमर्शियल फिल्मों के अलावा डॉक्यूमेंट्री तथा विज्ञापन फिल्में भी कीं। इनमें भी वे उसी जुनून और मेहनत से काम करते थे। उन्होंने करीब 100 विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग की। इसके साथ महाजन ने 20 डॉक्यूमेंट्री के लिए कैमरा निर्देशन किया और कई टीवी सीरियल की शूटिंग की। दर्शकों में टीवी के शुरुआती दौर का सीरियल ‘बुनियाद’ देखने का क्रेज था। रमेश सिप्पी निर्देशित, इस मील के पत्थर सीरियल की शूटिंग महाजन ने की थी।
जब इसकी शूटिंग के अनुभव की बात आई तो महाजन का कहना था, अधिकांश समय वे लोग यू-मैटिक (एक वीडियो फ़ॉर्मेट) में काम कर रहे थे। इसमें जब आप काम करते हैं, तो नतीजा काफी संतोषजनक होता है, लेकिन जब यह टेलीकास्ट किया जाता है, तो इसके रंग अपनी चमक खो देते हैं। और जब आप इसे अपने घर में देखते हैं, तो लगता नहीं है कि यह काम आपने किया है।
के. के. महाजन अपनी प्रसिद्धि को बहुत हल्के तरीके से लेते थे, कभी घमंड नहीं करते थे। वे खुद को नहीं बल्कि सुब्रत मित्र को सर्वोत्तम कैमरामैन मानते थे। कहते, भारत ने जिस सर्वोत्तम कैमरामैन को उत्पन्न किया है वह सुब्रत मित्र हैं। उनके अनुसार वे सुब्रत मित्र के स्तर पर पहुंचने के लिए अपना सर्वोत्तम देते हैं लेकिन अभी तक उनके स्तर पर नहीं पहुंच पाए हैं। कहते जरा कल्पना करो पचास-साठ के दशक में कलकत्ता में जब मित्र काम कर रहे थे।
उन दिनों आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं, इसके बावजूद उन्होंने कैमरे से जो कमाल किया है, वह अद्भुत है। हालांकि उन्हें मित्र की पहली फिल्म उतनी अच्छी नहीं लगी थी। लेकिन दूसरी फिल्म से लेकर बाकी सारी फिल्में खूब पसंद थीं। सुब्रत मित्र ने सत्यजित राय की पहली फ़िल्म ‘पथेर पांचाली’ (1955) मिशेल कैमरा से शूट की थी।
मिले चार नेशनल पुरस्कार
साठ के दशक में अपना कैमरामैन का पेशा प्रारंभ कर के. के. महाजन ने चार दशक से अधिक यह काम किया और सिनेमाटोग्राफी के चार नेशनल पुरस्कार प्राप्त किए।
पहला पुरस्कार राजेंद्र यादव की रचना पर बनी श्वेत-श्याम फिल्म ‘सारा आकाश’ केलिए 1970 में मिला। एक साल बाद दूसरा नेशनल अवॉर्ड मोहन राकेश की कहानी पर बनी ‘उसकी रोटी’ केलिए प्राप्त किया। यह फिल्म भी श्वेत/श्याम थी। फिर दो साल बाद 1973 में रंगीन ‘माया दर्पण’ के लिए और इसके एक साल बाद मृणाल सेन की ‘चौरस’ के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला, यह भी रंगीन फ़िल्म थी। इससे स्पष्ट होता है महाजन जितना श्वेत/श्याम में सहज थे, उतना ही सहज रंगीन सिनेमाटोग्राफी में थे।
वे अलग-अलग मिजाज और राजनैतिक विचारधारा के निर्देशकों के साथ भी सहज से। वाम और दूसरे विचार के निर्देशकों से उनकी अच्छी पटती थी। एक ओर मृणाल सेन जैसे धुर वामपंथी निर्देशक थे और दूसरी ओर बासु चैटर्जी तथा रमेश सिप्पी जैसे लोकप्रिय निर्देशक। ऐसे विलक्ष्ण सिनेमाटोग्राफर थे के. के. महाजन।
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