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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: कमाल की निर्देशक जूली डैश

सार

1975 में उन्होंने ‘फोर वीमेन’ एक प्रयोगात्मक शॉर्ट फिल्म बनाई और पहली फिल्म के लिए उन्हें मियामी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल में गोल्ड मेडल फॉर वीमेन इन फिल्म पुरस्कार मिला। 22 अक्टूबर 1952 को न्यूयॉर्क में जन्मी जूली डैश ने नस्ल और लिंग की सीमाओं को तोड़ने का काम किया है।
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विश्व सिनेमा - फोटो : istock
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विस्तार
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कुछ समय पहले तक अश्वेत अभिनेताओं को परदे पर कोई नहीं देखना चाहता था। यदि वे परदे पर आते तो मात्र गुलाम अथवा घरेलू सहायिका के रूप में। उनके निर्देशक के रूप की कल्पना असंभव थी, मगर समय के साथ सोच बदली, सोच के साथ समाज बदला। समाज के नियम बदले। इन नियमों के बदलने के लिए बहुत लोगों ने संघर्ष किया, विद्रोह किया, क्रांतियां हुई। कइयों ने बलिदान दिया। इनके संघर्ष-बलिदान का नतीजा हुआ आने वाली पीढ़ियां स्वतंत्रता की सांस ले सकीं, उनके लिए मार्ग खुल गया।

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जूली डैश ऐसी ही एक स्त्री हैं जिन्होंने आगे वालों को राह दिखाई, उनमें आत्मविश्वास पैदा किया। उन्होंने अपने कार्य से फिल्म दुनिया में इस असंभव को संभव कर दिखाया। उनको प्रेरणा देने वाली भी उन्हीं की बिरादरी की अश्वेत स्त्रियां रही हैं। असल में जूली डैश को अश्वेत महिला उपन्यासकारों ने लुभाया।

सत्तर के दशक में जूली का अश्वेत महिला उपन्यासकारों खासकर एलिस वॉकर, टोनी मॉरीसन, टोनी सेड बाम्बारा आदि के काम से परिचय हुआ। इससे जूली के नजरिए में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। 
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1975 में उन्होंने ‘फोर वीमेन’ एक प्रयोगात्मक शॉर्ट फिल्म बनाई और पहली फिल्म के लिए उन्हें मियामी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल में गोल्ड मेडल फॉर वीमेन इन फिल्म पुरस्कार मिला। फिर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया में फिल्म मेकिंग की पढ़ाई करते हुए उन्होंने 1977 में 13 मिनट की ‘डायरी ऑफ एन अफ्रीकन नन’ निर्देशित की।

उनकी यह पहली नरेटिव फिल्म एलिस वॉकर की एक कहानी पर आधारित है। इस फिल्म में सिस्टर ग्लोरिया की भूमिका अश्वेत बारबाराओ ने की है। सिस्टर ग्लोरिया अपने नजरिए और अनुभवों को यहां दर्शकों से साझा करती है।

फिल्म ‘इलूशन्स’

हॉलीवुड में अश्वेत पात्रों के साथ न्याय नहीं होता है, इसी बात को जूली ने अपनी फिल्म ‘इलूशन्स’ में दिखाया है। 34 मिनट की इस फिल्म में हल्के रंग की मिगनॉन डुप्री स्टूडियो एक्जक्यूटिव है और अपने हल्के रंग के कारण बड़े आराम से श्वेत लोगों में घुलमिल जाती है।

इसी तरह एस्थर जीटर एक अश्वेत गायिका हॉलीवुड के नामीगिरामी श्वेत अभिनेताओं के लिए डबिंग का काम करती है। डुप्री खुद तो श्वेत जैसी दीखने के कारण भेदभाव से बची रहती है, मगर दूसरी अश्वेत स्त्रियों के साथ होने वाले रंगभेद को देखती रहती है।

जीटर इतनी काली है कि हॉलीवुड उसे परदे पर नहीं देखना चाहता है, लेकिन उसकी आवाज के जादू का फायदा उठाता है। अश्वेतों के जटिल जीवन को यह फिल्म ‘इलूशन्स’ प्रस्तुत करती है। सिने-संसार केवल ‘श्वेत दुनिया’ है, इस मिथ को यह फिल्म तोड़ती है। इसने अमेरिका के नेशनल फिल्म प्रिजर्वेशन बोर्ड का खिताब जीता।

22 अक्टूबर 1952 को न्यूयॉर्क में जन्मी जूली डैश ने नस्ल और लिंग की सीमाओं को तोड़ने का काम किया है। उन्हें फिल्म ‘डॉटर ऑफ द डस्ट’ केलिए सनडॉन्स पुरस्कार (सर्वोत्तम सिनेमाटोग्राफी) प्राप्त हुआ। चार पुरस्कार पाने वाली, 1991 में निर्देशित इस फिल्म की कहानी भी उन्होंने स्वयं लिखी है। इसकी कहानी 1902 में साउथ कैरोलाइन टापू में चलती है और गुलाह की तीन पीढ़ियों को प्रस्तुत करती है।

दस वर्ष के लम्बे समय में बनी, असामान्य सुंदरता की फिल्म ‘डॉटर्स ऑफ द डस्ट’ के बीस साल पूरे होने पर 2012 में एक बड़ा समारोह करके यह फिल्म नए दर्शकों को दिखाई गई, इसके निर्माण, प्रदर्शन और इस पर चर्चा भी हुई। इस समारोह में ऐसे दर्शक उपस्थित थे, जिन्होंने यह फिल्म दसियों बार पहले भी देखी थी। इस फिल्म ने अफ्रो-अमेरिकन स्त्री की छवि बदल डाली है।

इसमें अफ्रीकन इतिहास, मिथक, लोक कथाओं-विश्वासों का सकारात्मक प्रयोग किया गया है। यह अफ्रीकी लोगों की सशक्त आध्यात्मिक शक्ति को रेखांकित करती है। मौखिक कथाओं द्वारा आगे बढ़ती यह एक जटिल कहानी है। फिल्म का अंत अजन्मी बच्ची के स्वर से होता है, यह स्वर कहता है: ‘हम पीछे रह गए, बढ़ते, बुद्धिमान होते, मजबूत होते।’

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सिनेमा का इतिहास - फोटो : Freepik

गोल्ड मेडल फॉर वीमेन इन फिल्म

जूली डैश को दो साल के लिए फेलोशिप मिली और उसने कई प्रसिद्ध फिल्मकारों से फिल्म कला सीखी। जल्द ही उसने अपनी एक खास फिल्म शैली विकसित कर ली। उसने काइनेस्थेटिक मूवमेंट को आधार बना कर ‘फोर वीमेन’ नामक एक प्रयोगात्मक डांन्स फिल्म बनाई। इस फिल्म को 1978 में मियामी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में गोल्ड मेडल फॉर वीमेन इन फिल्म का पुरस्कार मिला। 

डैश ने सोचा था वे डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाएंगी, लेकिन आदमी जो सोचता है, वही नहीं होता है। जब-जब फीचर फिल्म बनाने की बात आती, उसके लिए एक बड़े बजट की जरूरत होती। नए लोगों के लिए, उसमें भी स्त्री के लिए फिल्म बनाने के लिए राशि जमा कर पाना कभी आसान नहीं रहा है।

जूली डैश को भी जब फीचर फिल्म बनानी होती यह समस्या आती। अत: अन्य स्रोतों के अलावा वे खुद डॉक्यूमेंट्री बना कर भी अपनी फिल्मों के लिए धन एकत्र करतीं। इस तरह उसकी झोली मे कई डॉक्यूमेंट्री फिल्में आ गई। इनमें से एक प्रमुख डॉक्यूमेंट्री है ‘द रोजा पार्कस स्टोरी’ है। 

आज रोजा पार्क और माउंटगोमरी असहयोग आंदोलन एक दूसरे का पर्याय हैं। रोजा पार्क्स ने एक श्वेत यात्री के लिए बस की अपनी सीट देने से इंकार किया और इस दोष के चलते उसे गिरफ्तार कर लिया गया। इसके प्रतिरोध में उस इलाके के अश्वेतों ने एक साल से ऊपर उस सड़क पर चलने वाली बसों का बहिष्कार किया। अब भला जब घाटा होगा तो लोगों का ध्यान उसके कारण पर जाएगा ही।

आंदोलन के कई अन्य फायदे होते हैं। इस आंदोलन का एक फायदा हुआ, इससे कई अश्वेत लीडर उभरे। यहां तक कि कानून बदला गया। आज रोजा पार्क्स के नाम पर सड़क और कई अन्य संस्थाएं हैं। जूली डैश ने इसी को लेकर टीवी केलिए फिल्म बनाई। इस फिल्म में रोजा पार्क्स की भूमिका एन्जेला बैसेट ने की है। पीटर फ्रांसिस जेम्स रेमंड पार्क्स की भूमिका में हैं। फिल्म को कई पुरस्कार मिले।

जूली डैश ने डॉक्यूमेंट्री, लघु, टीवी एवं फीचर मिला कर 22 फिल्मों का निर्देशन किया है। 7 फिल्मों का लेखन किया है साथ ही 7 फिल्में प्रड्यूस भी की हैं। कई अन्य पुरस्कारों के साथ-साथ उन्हें 2020 का विनर होराइज़न का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। 


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