प्रोडक्शन की सफलता में वस्त्रों का योगदान
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कई फिल्मों के लिए किया काम
27 फिल्मों में बतौर अभिनेत्री डॉली अहलूवालिया ने कई प्रसिद्ध निर्देशकों के नाटक जैसे ‘तुगलक’, ‘अग्नि और बरखा’ (प्रसन्ना), ‘अंधा युग’ (एम के रैना), ‘सीगल’, ‘उमराओ’ (अनुराधा कपूर), ‘हेमलेट’ (हैनरी पीटरसन) आदि का वस्त्र सज्जा दायित्व संभाला है। उन्होंने टीवी केलिए ‘जमीन’, ‘तन्हाईयां’, ‘तितली’, ‘वापसी’ आदि हेतु भी यह कार्य किया है।
फिल्म ‘गांधी’ के लिए वे सहायक कस्टूम डिजायनर थीं। उन्होंने अब तक 28 फिल्मों के लिए कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग की है, जिसमें ‘मिडनाइट’स चिल्ड्रेन’, ‘रॉक स्टार’, ‘कमीने’, ‘आजा नच ले’, ‘पार्टीशन’, ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ जैसी फिल्में शामिल हैं।
किसी भी प्रोडक्शन की सफलता में वस्त्रों का बहुत बड़ा हाथ होता है। कपड़ों की अपनी चाक्षुष भाषा होती है, जो दर्शक से सीधे संवाद करती है, इसीलिए यदि कोई कपड़ों की बेकदरी करता है, तो डॉली को बहुत गुस्सा आता है। हमारे यहां कॉस्टूम डिजाइनिंग को अधिक सम्मान नहीं मिलता है, लोग उसे फैशन डिजाइनिंग ही मानते हैं, जबकि दोनों बहुत अलग है।
वस्त्र डिजाइनिंग हेतु रकम लगती है, बिना पैसा डाले, बिना उचित वेशभूषा के ‘हैदर’, ‘वाटर’, ‘रंगून’, ‘मिडनाइट’स चिल्ड्रेन’, ‘रॉक स्टार’ सफल नहीं हो सकती थीं।
कभी-कभी अजीब स्थिति उत्पन्न हो जाती है जैसे ‘हैदर’ की शूटिंग केलिए डॉली सारे कपड़े दिल्ली से तैयार करके ले गई थीं, मगर एक गाने के दौरान पहले बीस डांसर की बात थी मगर दृश्य फिल्माने केलिए पचास डांसर उपयुक्त अनुभव किए गए तब विशाल भारद्वाज ने डॉली पर भरोसा किया और उन्होंने डेढ़-दो दिन के भीतर सारी जरूरत पूरी की।
उनके अनुसार यह उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती रही है, खुश हैं कि वे उसका सफलतापूर्वक सामना कर सकीं। उनके अनुसार गुणवत्तापूर्ण काम करने केलिए आदमी को अपना दिल-दिमाग, आंख-विचार सब हर वक्त खुले रखने चाहिए।
समय के साथ अनुभव से उन्होंने बहुत कुछ सीखा है।
एक साक्षात्कार में वे कहती हैं कि उनके लिए मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता में सकून पाती हैं। वे पुरस्कार के पेछे नहीं भागती हैं, हां मिलता है तो उसे अपनी मेहनत पर बरस कृपा मान कर स्वीकार करना चाहिए। डॉली अहलूवालिया को भारतीय संगीत- शास्त्रीय, इंस्ट्रूमेंटल, पियानो सुनना पसंद है। उनके अनुसार संगीत रूह तक जाती है।
यह शौक उन्हें अपनी मां से मिला है। उन्हें याद है बड़े गुलाम अली खान उनके घर आते थे।
वंशी कौल ने ‘रंग यात्रा’ के दौरान नाटकों के प्रयुक्त हुए वस्त्रों की प्रदर्शनी लगाई थी जिसमें डॉली निर्मित ‘ऑथेलो’ नाटक के वस्त्र प्रदर्शित थे, जिनें खूब सराहना मिली। वे उसे अपना एक सर्वोत्तम काम मानती हैं। अपनी जिंदगी से खूब खुश डॉली अहलूवालिया अपनी काबिलियत के बल पर अंतरराष्ट्रीय कल्चरल एक्चेंज प्रोग्राम एवं समारोहों के तहत सिडनी, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, पेरिस, जर्मनी आदि देशों में जा चुकी हैं और इन अनुभवों ने उन्हें समृद्ध किया है। वे अपनी जिंदगी के अंत तक काम करना चाहती हैं। उम्र के बावजूद वे खूब सक्रिय हैं।
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