रंग हमारी दुनिया को रंगीन बनाते हैं, जीवंत बनाते हैं। जरा सोचिए यदि रंग नहीं होते तो दुनिया कितनी बेरंग होती, कितनी असहनीय होती? दुनिया केवल श्वेत/श्याम नहीं है। उसमें हजारों रंग हैं। यही हाल जीवन का है। हजारों रंग की छटाओं से मिल कर बनता है, हमारा जीवन। सिनेमा जीवन को प्रतिबिंबित करता है, तो वहां भी हजारों रंग बिखरे हुए हैं।
क्या हैं रंग? रोशनी का खेल। रोशनी का खेल, रंग हमारे मन-मस्तिष्क पर प्रभाव डालते हैं। रोशनी न हो तो यह खेल जारी नहीं रहता है। सब अंधेरा हो जाता है। सिनेमा भी प्रकाश एवं छाया का खेल है। सिनेमा बनाने और उसे देखने-दिखाने के लिए प्रकाश होना आवश्यक है। बिना प्रकाश के फिल्मांकन नहीं हो सकता है। यह प्रकाश प्राकृतिक अथवा कृत्रिम हो सकता है, अथवा दोनों का सहमेल भी। जब सिनेमा बनना शुरू हुआ तो वह रंगीन नहीं था, मात्र श्वेत/श्याम था। श्वेत/श्याम सिनेमा का अपना आकर्षण, अपना जादू होता है, जो आज भी कायम है। फिर रंगीन सिनेमा आया।
पूरी तरह भारत में निर्मित पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ थी इसे 1937 में मोती बी. गिडवानी ने निर्देशित किया था। इसकी कहानी सादत हसन मंटो की है। फिल्म ‘किसान कन्या’ किसान के दु:ख-दर्द को लेकर चलती है। फिर तो रंगीन फिल्मों का सिलसिला चल निकला। बाद में कई श्वेत/श्याम फिल्मों को भी रंगा गया। पहले फोटोग्राफ भी हाथ से रंगीन बनाए जाते थे। अब किसी खास वजह से ही श्वेत/श्याम फिल्म बनती है।
रंग ने हमारे मन-मस्तिष्क पर ऐसा जादू कर रखा है कि दुनिया भर में लोग रंगों के नाम अपने बच्चों के नाम पर रखते हैं। इसी तरह दुनिया की कई भाषाओं की फिल्मों के नाम रंगों से लिए गए हैं। कुछ फिल्मों के नाम जो तत्काल दिमाग में आते हैं, ‘धरती के लाल’, ‘पिंक’, ‘मीट जो ब्लैक’, ‘रेड बैलून’, ‘व्हाइट बैलून’, ‘कलर पर्पल’, ‘रेज द रेड लैंटेर्न’, ‘सोनार केला’, ‘नीलाकाशम्, पच्चाकडलम्, चुवाना भूमि’ (नीला आकाश, हरा समुद्र, लाल भूमि), ‘ब्लैक स्वान’, ‘ब्लू वेल्वेट’, ‘ब्लू रेन’, ‘ग्रीन रूम’, ‘रेड ड्रेगन’, ‘रेड स्कोर्पियन’, ‘द रेड थिन लाइन’, ‘लाल बादशाह’, ‘लाल सलाम’, ‘नीलकमल’, ‘सफेद हाथी’, ‘ब्लैक’, ‘ग्रीन बुक’। इसी तरह गीतकार संगीतकार तमाम फिल्मी गीतों में रंग भरते हैं। रंगों से जुड़े गीतों पर फिर कभी। अभी बात करती हूं उन फिल्मों की जिनके शीर्षक रंग से जुड़े हुए हैं।
मजीद मजीदी ने पूरा ‘कलर ऑफ पैराडाइज’ रच दिया है। यह इरानी फिल्म नेत्रहीन मोहम्मद और उसके पिता की कहानी है और लीजिए शेफ विकास खन्ना ने ‘द लास्ट कलर’ उपन्यास लिख दिया जिस पर इसी नाम की फिल्म बन गई। यहां कहानी वृन्दावन में चलती है तथा रस्सी पर चलने वाले बालक और विधवा नूर (नीना गुप्ता) की दिखाई गई है।
1982 की फिल्म ‘द कलर पर्पल’
पुलित्जर पुरस्कृत एलिस वॉकर की प्रसिद्ध किताब ‘द कलर पर्पल’ (1982) पर हॉलीवुड के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक स्टीवन स्पीयलबर्ग ने इसी नाम से फिल्म बनाई। द कलर पर्पल’ पितृसत्तात्मकता से एक स्त्री के निजी प्रतिरोध और स्त्री के सशक्तिकरण का ज्वलंत उदाहरण है। उपन्यास भेदभाव, अत्याचार, बलात्कार, शक्तिहीनता, शक्ति, बहनापा, अलगाव, प्रेम, यौन संबंध, घृणा, ईर्ष्या, अस्मिता, आत्मसम्मान, आवेश, ज्ञान और पराशक्ति कई बातों को चित्रित करता है। एलिस वाकर काले रंग की विविधता, उसकी विभिन्न छटाओं का चित्रण करती हैं। फिल्म में डैनी ग्लोवर (मिस्टर अलबर्ट), ओफ्रा विंफ्रे (सोफिया), अकोसुआ बूसिया (नेटी) ने भूमिका की हैं।
‘मीट जो ब्लैक’ में स्वयं मृत्यु जो ब्लैक (ब्रैड पिट) है। जो लेने आता है बिजनेस मुगल विलियम पैरिश (एन्थॉनी होप्किंस) को लेकिन उसकी बेटी सूसैन (क्लैरे फोर्लानी) के प्रेम में पड़ जाता है।
1995 में अपनी पहली फीचर फिल्म ‘द व्हाइट बैलून’ से विश्व प्रसिद्ध हुए जफर पनाही अपनी फिल्मों में ईरानी जन-जीवन के मानवीय पहलु पर ध्यान केंद्रित करते हैं। सात साल की रज़ेह (ऐडा मोहममादखानी) नवरोज पर 500 का बड़ा नोट लिए खुशी-खुशी अपनी मनपसंद फिश लेने चल पड़ती है। यहीं से उसकी मुसीबत शुरु होती है। बेहतर जीवन की तलाश में निकली, रजेह पूरी मानवता की कहानी बन जाती है।
तमाम कोशिशों के बावजूद नाली में गिरा नोट अंतत: एक अफगानी शरणार्थी बैलून बेचने वाले बच्चे की सहायता से निकलता है। सब खुशी-खुशी नया साल मनाने चले जाते हैं, अकेला रह जाता है, अपना बिना बिका सफेद बैलून लिए हुए।
‘रेज द रेड लैंटेर्न’
चीन की फिल्म ‘रेज द रेड लैंटेर्न’ बहुत भिन्न मिजाज की फिल्म है। इसमें एक युवती एक धनी आदमी की चौथी पत्नी बनती है। उस आदमी का ध्यानाकर्षण और उस घर की सुविधाएं पाने केलिए सब पत्नियों में भारी प्रतियोगिता चलती है। क्या चौथी पत्नी इस स्पर्धा में शामिल होने से बच सकती है या उसे भी इस दौड़ में शामिल होना पड़ता है, जानने केलिए तो पूरी फिल्म देखनी होगी।
‘नीलाकाशम्, पच्चाकडलम्, चुवाना भूमि’ में काशी (दुल्कर रहमान) एवं सुनी (सनी वायने) काशी की प्रेमिका की खोज में केरल से नागालैंड तक सड़क यात्रा करते हैं। रास्ते में उन्हें तरह-तरह के लोग मिलते हैं, भिन्न-भिन्न अनुभव होते हैं जिससे उनकी जिंदगी बदल जाती है।
‘पिंक’ फिल्म में मीनल अरोड़ा (तापसी पन्नू), एंड्रिया (एंड्रिया टेरिअंग) तथा फलक अली (कीर्ति कुल्हरी) तीन युवतियां एक घर में रह रही हैं। मगर उन्हें अपराध में फंसा दिया जाता है। उनकी ओर से मुकदमा लड़ने एक रिटायर्ड वकील डीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) आगे आता है।
तीन ऑस्कर प्राप्त ‘ग्रीन बुक’ दक्षिण अमेरिका की यात्रा (पिछली सदी के साठ का दशक) पर डॉ. डॉन शिर्ली (मैहेरशाला अली) एफ्रो-अमेरिकन क्लासिकल पियानिस्ट निकलता है, उसका ड्राइवर टोनी (विगो मोर्टेनसेन) इटैलियन-अमेरिकन है। फिल्म का नाम ‘ग्रीन बुक’ मोटरिस्ट ग्रीन बुक से आता है जो एक ट्रैवेल गाइड है इसकि सहायता से दोनों दक्षिण में सुरक्षित होटल एवं रेस्तरॉ में जाते हैं। शुरू का संबंध धीरे-धीरे दोस्ती में बदल जाता है। फिल्म के दोनों अभिनेताओं की दर्शकों एवं सिने-समीक्षकों ने भरपूर प्रशंसा की है। तीन में से एक ऑस्कर नायक ड. डॉन शिर्ली के नाम रहा।
जिन फिल्मों का यहां उल्लेख भर हुआ है, उनमें से प्रत्येक पूरे आलेख की मांग करता है। कुछ पर विस्तार से पहले लिखा भी है। कुछ और पर भविष्य में लिखा जाएगा।
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