सिनेमा की दुनिया का इतिहास
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‘मून्ड्राई पिरई’ की खूब होती है चर्चा
बालु ने कथानक में एक नई शैली से उस समय के सिनेमा को परिचित कराया, इस शैली में फिल्मांकन द्वारा पात्र की अभिव्यक्ति को प्राकृतिक लाइट के साथ मिलाया जाता है। इस कारण दर्शक तत्काल कहानी से जुड़ जाता है। इसका जीता-जागता उदाहरण ‘मून्ड्राई पिरई’ (हिन्दी में ‘सदमा’) तथा उनकी एक अन्य फिल्म ‘वीडू’ है। उनकी फिल्मांकन की विशेषता को ‘छत्तकारी’, ‘मुलुम मलरम’, ‘शंकराभरणम्’ जैसी फिल्मों में भी देखा जा सकता है।
इस स्टाइलिश सिनेमाटोग्राफर ने अपने पीछे इस कला की एक भरी-पूरी विरासत छोड़ी है। सिनेमाटोग्राफी के इसी ज्ञान के चलते उन्होंने जो फिल्में बनाई वे भी विशिष्ट हैं। निर्देशन उन्होंने किया, सफल फिल्मों का किया मगर उनका पहला जुनून फोटोग्राफी ही रहा। उनके फिल्माए सिनेमा को देखते ही पहचाना जा सकता है।
उनके पेशे के अन्य लोग उनको सम्मान देते थे, उनकी प्रशंसा करते थे इसीलिए सत्यजित राय के सिनेमाटोग्राफर सुब्रत मित्रा ने उनकी प्रतिभा को मान्यता देते हुए उन्हें व्यूफाइंडर उपहार में दिया था। कमल हासन उन्हें कला और लोकप्रिय सिनेमा में संतुलनकर्ता कहते हैं।
प्रकृति से प्रेम
बालु उन विरल सिने-व्यक्तित्व में से हैं, जो कहानी को चाक्षुष रूप से कहते हैं। तमिल फिल्मों में पारदर्शी हरियाली विरले ही नजर आती थी, बालु ने सोचा इसे परदे पर आना चाहिए। परदे पर आना चाहिए मगर प्रयोगशाला में प्रोसेसिंग के द्वारा नहीं। आसपास जीवन की जो हरियाली दीखती है, उसे वे परदे पर लेकर आए।
प्रकृतिवाद उनका सिग्नेचर है। इसे आप पत्तों से छन कर आती धूप में देख सकते हैं। उनके यहां यह बाहरी शॉट्स में भी दिखता है और आंतरिक दृश्यों में भी नजर आता है। भीतर यह खिड़की-दरवाजों से झांकता है। कभी कोने में रखे लैंप से झरता है, इस कारण कभी-कभी कमरा रहस्यमय लगता है। वे अभिनेताओं के भारी मेकअप के खिलाफ थे और आप उनके काम में अभिनेताओं को ऐसे देखते हैं, मानो वे पहली बार नजर आ रहे हों।
सिनेमाटोग्राफर के अनुसार, बालु ने पहली बार एफटीआईआई से निकले सिनेमाटोग्राफर को प्रसिद्धि दिलाई। उनको ‘प्राकृतिक प्रकाश’ के लिए जाना जाता है। बालु चाहे गानों को फिल्मा रहे हों, अथवा नृत्य या फिर मूक संवाद को, वे यह सब दर्शक तक अपने कैमरे से संप्रेषित कर पाने में समर्थ थे। यदि कोई गलती करता था तो इतने कुशल और प्रसिद्ध सिनेमाटोग्राफर को बहुत भयंकर गुस्सा आता था।
उनकी अंतिम फिल्म ‘तलैमुरैगल’ के समय कार्तिक शुभ्रमणियन को उनका एक साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। यह साक्षात्कार लेने कार्तिक चेन्नई के पास वडपलनि गए। बालु के वर्कशॉप में कार्तिक के सिनेमाटोग्राफर ने इस साक्षात्कार के दौरान एक गलती कई बार की और बालु का गुस्सा फट पड़ा। पर बाद में उन्होंने उस व्यक्ति को उसकी गलती बताई और उसे ठीक करने केलिए विस्तार से समझाया। ऐसे थे बालु महेंद्र। उनके वर्कशॉप में कई फिल्म स्टूडियो और पोस्ट-प्रोडक्शन की सुविधाएं उपलब्ध हैं।
हालांकि वे यथार्थवाद से प्रभावित थे, लेकिन उन्होंने अमेरिकन सिनेमा से भी काफी कुछ ग्रहण किया। वे स्वयं नेस्टर एलमेंड्रोज एवं माइकेल चैपमैन जैसे कैमरामैन से प्रभावित थे और वे स्वयं संतोष शिवन, रवि चंद्रन, नटराजान शुभ्रमणियम तथा के. वी. आनंद जैसे सिनेमाटोग्राफर की प्रेरणा हैं।
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