आज बात करती हूं, हिन्दी सिनेमा के एक बहुमुखी प्रतिभा एवं संख्यात्मक दृष्टि से भी सम्पन्न व्यक्तित्व की। वो अभिनेता हैं, सिने-निर्देशक हैं, साथ ही सिने-लेखक यानी स्क्रीनप्ले राइट और संवाद लेखक भी हैं। वैसे आज उनके लेखकीय व्यक्तित्व पर केंद्रित रहूंगी। बात हो रही है, अनुराग कश्यप की। जिनका पूरा नाम है अनुराग सिंह कश्यप।
अनुराग अनूठे तरीके से अधिकार के साथ कहानी कहते हैं। यही उन्होंने अपनी प्रसिद्ध फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ (2012) में किया है। ऐसा हुआ है, उस इलाके के लोगों ने इस बात की पुष्टि की है। यह दो गैंग के बीच की लड़ाई है। सुलतान और शाहिद खान के बीच जो संघर्ष प्रारंभ होता है, वह एक पीढ़ी में समाप्त नहीं होता है। यह खून-खराबा तीन पीढ़ियों तक चलता है।
अनुराग वास्तविक जीवन से कहानी उठा कर स्क्रीनप्ले तैयार करते हैं। वे सामाजिक मुद्दे उठाते हैं, मानव भावनाओं की गहराई में उतरते हैं। इन्हीं विशेषताओं के चलते ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को 18 पुरस्कार प्राप्त हुए, यह एक कल्ट फिल्म बन गई।
अनुराग की एक अन्य विशेषता है कहानी को परम्परागत ढंग से न कहना, वे यह चुनौती स्वीकारते हैं, यही उन्होंने ‘देव डी’ (2009) में किया है। शरत्चंद्र चैटर्जी लिखित ‘देवदास’ पर इसी नाम से कई भाषाओं में कई फिल्म बनी हैं। देवदास एक मिथक बन गया है, यह रूढ़ अर्थ में बंध गया है। इससे छोड़-छाड़ जोखिम का काम है, एक चुनौती है। अनुराग कश्यप ने यह जोखिम उठाया और चुनौती स्वीकार की। उन्होंने शराब की लत को नशे की लत में परिवर्तित कर दिया क्योंक कहानी आज के संदर्भ में चलती है।
यहां एक किशोरी वेश्यागिरी में पड़ती है। यहां पारो जैसे जाने-पहचाने पात्र को बिल्कुल नई रोशनी में प्रस्तुत किया गया है। एक बार फिर अनुराग निर्देशन भी संभालते हैं और इस फिल्म को भी 12 पुरस्कार मिलते हैं।
दर्शक उनके स्क्रीनप्ले से जुड़ जाता है, उनके यहां कहानी एक रेखीय (लीनियर) नहीं चलती है। 2013 की फिल्म ‘बॉम्बे टाकीज’ हिन्दी सिनेमा के सौ साल को चार कहानियों में समटती है। यहां एक कहानी का स्क्रीनप्ले अनुराग ने लिखा है। 2010 की ‘उड़ान’ का स्क्रीनप्ले अनुराग ने दो अन्य लोगों के साथ मिल कर लिखा है। गजब होता है जब इस फिल्म को 23 पुरस्कार मिलते हैं। फिल्म किशोर युवक एवं उसके पिता के संबंध को दिखाती है।
अनुराग कश्यप द्वारा लिखित (दो अन्य लोगों के साथ) और निर्देशित 2004 की फिल्म ‘ब्लैक फ़्राइडे’ विवादास्पद रही साथ ही इसे इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ लॉस एंजेलेस का सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार मिला। फिल्म में 1993 में हुए बम विस्फोट की छान-बीन की गई है। इसके साथ ही पुलिस, षडयंत्र, बिचौलियों, पीड़ितों की स्थिति को उजागर किया गया है।
60 फिल्मों का लेखन करने वाले अनुराग कश्यप अभी खूब सक्रिय हैं। उनसे हिन्दी फिल्म जगत को बहुत आशाएं हैं।
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