परिवार, समाज, परम्परा, पितृसत्ता सब प्रेम के खिलाफ हैं और तो और प्रकृति भी इससे शत्रुता नाथती है। विश्वास न हो तो ज्ञानपीठ (1984) और साहित्य अकादमी 1957 (‘चेम्मीन’ हेतु) प्राप्त मलयाली लेखक तकषी शिवशंकर पिल्लई का उपन्यास ‘चेम्मीन’ पढ़ लीजिए। मेरी तरह मलयालम पढ़ना नहीं आता है, तो इसका इंग्लिश अनुवाद पढ़ कर संतोष करें, निराशा नहीं होगी। अनुवाद में कुछ तो नष्ट हो ही जाता है। मगर उपाय क्या है, जब तक मूल भाषा न सीखी जाए?
तकषी के नाम से प्रसिद्ध लेखक ने 1956 में ‘चेम्मीन’ (झींगा मछली) लिखा और रचना की प्रसिद्धि ऐसी हुई कि दस साल बाद इसी नाम की फिल्म (राष्ट्रीय सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार प्राप्त) में रूपांतरित हो गया। उपन्यासों के अलावा 600 सौ कहानियां लिखने वाले का ‘कयर’ एक और प्रसिद्ध कार्य है।
‘चेम्मीन’ का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। इंग्लिश में भी कई अनुवाद हुए हैं। वी.के. नारायण मेनन (‘एंगर ऑफ द सी गॉडेस’) तथा अनीता नायर (‘चेम्मीन’) का अनुवाद प्रसिद्ध है।
‘चेम्मीन’ का लयात्मक गद्य और रोमांस मलयानिल का झोंका है, साथ ही प्रेम और लालसा की यह कथा सामाजिक नियमों का उलंघन कर अति त्रासद हो उठती है। सामाजिक निषेध की यह कथा एक मछुआरे की बेटी करुत्तम्मा और मछली बेचने वाले मुसलमान परीकुट्टी की जुनूनी प्रेम कहानी चार अध्यायों में चलती है। बचपन का प्रेम ठीक है, पर आवेशपूर्ण प्रेम जवानी तक चला आए, भला समाज यह कैसे सहे। परिवार को भी गंवारा नहीं है।
इनके अलावा करुत्तम्मा की मां चक्की (शक्ति), उसका लालची, जिद्दी एवं महत्वकांक्षी पिता चेम्बनकुंजु, उसकी बहन पंचमी, करुत्तम्मा का पति अनाथ मछुआरा पलनी उपन्यास के अन्य पात्र हैं। यहां समुद्र स्वयं एक किरदार के रूप में उपस्थित है। सागर माता (कडलम्मा) का तकषि की कलम ने गजब का सुंदर चित्रण किया है। समुद्र अपने सब रूप-रंग में यहां उपस्थित है, आप पढ़ते हुए समुद्र का अनुभव करते हैं। कभी वह शांत है, कभी क्रोधित हो गर्जन-तर्जन कर रहा है, कभी प्रेम-स्थली है, तो कभी मृत्यु-शैय्या।
बहुत रोचक है ‘चेम्मीन’ उपन्यास
सरल भाषा में लिखा उपन्यास ‘चेम्मीन’ मनुष्य और प्रकृति की विभिन्न भावनाओं का सूक्ष्म विवरण देता है। यहां चुलबुलापन, क्रोध, दु:ख, असहायता, पराजय, हंसी-खुशी, हास्य-रोदन सब भावनाएं जीवंत हैं। मछुआरों के रीति-रिवाज, विधि-निषेध, संभ्यता-संस्कृति, विश्वास, मिथक, उनके दैनंदिन जीवन का जीता-जागता चित्रण है उपन्यास ‘चेम्मीन’।
पूरी कथा एक विश्वास, एक मिथक पर आधारित है। केरल के मछुआरों का विश्वास है कि पत्नी का पातिव्रत्य ही समुद्र में पति की रक्षा करता है।
मां के समझाने पर करुत्तम्मा अपने प्रेम की बलि चढ़ा, पलनी से शादी करती है। पलनी को अपनी पत्नी का अतीत मालूम है, फिर भी वह पत्नी पर पूरा विश्वास करता है। परम्परा को पोषित करते उपन्यास में करुत्तम्मा और परीकुट्टी मरते हैं, पत्नी के अपने पुराने प्रेमी से मिलन का नतीजा पति अर्थात पलनी की मृत्यु में होता है। जाने क्यों पलनी के चरित्र को लेखक ने कारुणिक बनाया है, क्योंकि वह बिना अपनी किसी गलती के मरता है। क्या स्त्री की गलती (?) की सजा मात्र स्त्री ही नहीं उसके आदमी को भी भोगनी होगी?
सामाजिक परम्परा तो यही कहती है। पिता चेम्बनकुंजु मछुआरा समुदाय के नियम विरुद्ध हो लालची बन, धन संग्रह करता है, धन से जुड़ी बुराइयों में डूबता है, दूसरी पत्नी को निकाल बाहर करता है, बर्बाद होकर अपने कर्मों का बड़ा मूल्य चुकाता है। उसकी पहली पत्नी चक्की हर बात में उसका सहयोग करती है और अंत में वह मर जाती है।
इस बहुपरतीय क्लासिक रचना में प्रेम, लालसा के अलावा पितृसत्ता, विद्रोह तो है, साथ ही है मानव मन की प्रत्येक अनुभव और अनुभूति। स्वार्थी चेम्बन सबको नियंत्रित करता है, सारे निर्णय लेता है, गुस्सा होता है, मनमर्जी का काम करता है। उसकी जिद कई जिंदगियां नष्ट करती हैं। वह खुद नष्ट होता है, साथ में बड़ी बेटी करुत्तम्मा, पहली पत्नी चक्की, दूसरी पत्नी पापीकुंजु, छोटी बेटी पंचमी सबका जीवन तबाह करता है।