एक फिल्ममेकर के मन-मस्तिष्क की झांकी देने वाली किताब का गद्य बहुत प्रवाहमय है। वैसे कहीं-कहीं घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन अतृप्ति देता है। एक तरह से यह ‘स्ट्रीम-ऑफ-कॉन्सेसनेस’ में लिखी गई है। इसमें फिल्म बनाने की सृजनात्मक प्रक्रिया और उसकी जद्दोजहद देखने को मिलती है। वे कहीं भी कुछ छिपाते नहीं है और कई बार आत्म-घृणा तक जाते हैं।
वे अपने सहकर्मियों, हैरिएट एंडरसन, लिव उलमान, बीबी एंडरसन, इंग्रिड बर्गमैन, ग्रेटा गार्बो, चर्ली चेपलिन लॉरेंस ओलिवियर जैसे सहयोगियों से अपने संबंध को भी लिखते हैं। मगर अपनी फिल्म के नामी अभिनेताओं के विषय में नहीं लिखते हैं, क्योंकि वे जवित मित्रों के बारे में लिखना नहीं चाहते हैं।
उनके ये शब्दचित्र उनके जीवन को स्वीडन के ग्रामीण इलाके में बीते बचपन से लेकर उनकी हॉलीवुड तक की यात्रा को दिखाते चलते हैं। इस जीवन में कई पत्नियां आती हैं, पत्नियां हैं, साथ में कुछ प्रेमिकाएं भी हैं। बार-बार वे फ्लैशबैक में जाते हैं और अपने जीवन को दिखाते हैं। बचपन की परेशानियों के बावजूद वे लिखते हैं, तीनों बच्चों ने जीवन में जितना कर सकते थे, किया।
वे कहते हैं, तीनों बच्चों में उन्होंने सर्वोत्तम किया। उन्हें सबसे कम नुकसान पहुंचा। उन्हें न्यूनतम हानि हुई क्योंकि उन्होंने खुद के लिए एक अलग चरित्र निर्मित किया, जिसका वास्त्विक बर्गमैन से बहुत कम लेना-देना था। उनके अनुसार जो नुकसान हुआ, वह उनके वयस्क जीवन और उनकी सृजनात्मकता को हुआ।
एक अलग दुनिया में ले जाती है ‘द मैजिक लेंटर्न’
‘द मैजिक लेंटर्न’ मूल किताब स्वीडिश भाषा में है। मेरे पास जॉन टेट का इंग्लिश अनुवाद है। इस विशिष्ट संस्मरणात्मक आत्मकथा में कुछ भी सिलसिलेवार नहीं है। साथ ही कोई कुतर्क नहीं है। इसे हड़बड़ी में पढ़ कर समाप्त नहीं किया जा सकता है। एक सुस्वादु भोजन की तरह इसे धीरे-धीरे चुभला कर, रस लेकर ग्रहण करना होगा। इतना ही नहीं, पचाने से पहले कई दिन जुगाली करनी होगी। तभी इसका वास्तविक आनंद लिया जा सकता है।
जल्दबाजी करेंगे, तो अर्नेस्ट इंग्मर बर्गमैन के निजी जीवन एवं उनके सिने-जीवन में उलझ जाएगें। अच्छा होगा किताब पढ़ने के साथ-साथ बर्गमैन की बनाई आत्मकथात्मक फिल्में ‘द सेवेन्त सील’, ‘वाइल्ड स्ट्राबेरीज’, ‘ऑवर ऑफ द वुल्फ’, ‘स्माइल्स ऑफ ए समर नाइट’, ‘सॉडस्ट एंड टिनसेल’, ‘द मैजिसियन’, ‘प्राइवेट कन्फेसंस’, ‘क्राइज एंड विस्पर्स’, ‘ऑटम सोनाटा’ आदि भी देख लें।
84 स्क्रीनप्ले लिखने वाले बर्गमैन के पैदा होते मां फ्लू से ग्रसित थी, बच्चा भी बीमार था, अत: उसे नानी ले गई। नानी द्वारा स्पंज केक पानी में डुबा कर खिलाने से किताब प्रारंभ होती है। और इसका अंत मां की जुलाई 1918 डायरी को खंगालने से होता है। उनकी मां उनके अवसादग्रस्त पिता से चाह कर भी अलग नहीं हो पा रही हैं। उन्हें बच्चे के जीवित रहने को लेकर शंका है। उनका दूध नहीं उतर रहा है। वे बहुत द्विविधा में हैं।
आप एक बार ‘द मैजिक लेंटर्न’ शुरू करेंगे तो पढ़ते चले जाएंगे।
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