आज भी मेरठ के छोटे-छोटे मोहल्लों में 125 इकाइयों में यह कैंची बनती है। इसको 2015 में जीआई टैग मिल चुका है और यह पहचान मजबूत हो गई कि कोई और मेरठ की कैंची को अपनी नहीं बता सकता। एक छोटी-सी कैंची को बनाने में मशीनों के साथ-साथ हाथ की कारीगरी की भी बड़ी भूमिका होती है। अखुंजी के परिवार से जुड़े शरीफ अहमद बताते हैं कि एक कैंची को बनाने में 17 कारीगर लगते हैं। हर कारीगर अलग-अलग काम करता है और एक कैंची को बनने में दो से तीन दिन लगते हैं। मेरठ की कैंची की धार को ऐसा बनाया जाता है कि यह लंबे समय तक चले। मशीनों के बजाय कारीगर का तर्जुबा ही इसका घुमाव और धार तय करता है।
ऐसा कोई फ्रेम नहीं होता, जिसमें कैंची की बनावट को फिट करके एक जैसे पीस बनाए जा सकें। चीन, जापान और इटली जैसे देशों में कैंची का उत्पादन तो खूब होता है, लेकिन वे मशीन से बनती हैं। उनमें मेरठ की कैंची की तरह दोबारा से धार नहीं लग सकती है। शरीफ अहमद बताते हैं कि कोरोना काल में जब विदेशों से कैंची आनी बंद हो गई, तो घरेलू कारोबार सालाना एक हजार करोड़ रुपये का हो गया था। अब कारीगरों की तैयारी है कि पुराने पैटर्न को बदलकर नए ट्रेंड की कैंची बनाई जाए, जिससे कि विदेशों से आने वाली कैंचियों को टक्कर दी जा सके। हालांकि, टक्कर की बात से कारीगर थोड़ा नाराज से दिखते हैं, वह कहते हैं-मेरठ की कैंची एक कला है, कारीगरी का हुनर है, किसी मशीन से बना उत्पाद नहीं। इसलिए, इसकी किसी से टक्कर हो ही नहीं सकती है।