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विक्रम संवत् 2077: सबकी सुख समृद्धि के लिए होता है, नवसंवत्सर

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हिंदू नववर्ष को पूरे देश में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है. - फोटो : अमर उजाला
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जो सभ्यता अपने इतिहास पर गर्व करती है, अपनी संस्कृति को सहेज कर रखती है और अपनी परंपराओं का श्रद्धा से पालन करके पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाती है वो गुज़रते वक्त के साथ बिखरती नहीं बल्कि और ज्यादा निखरती जाती है।

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जब चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा के सूर्योदय के साथ सम्पूर्ण भारत के घर घर में लोग अपने इष्टदेवी देवता का अपनी अपनी परंपरा अनुसार पूजन करके नवसंवत्सर का स्वागत कर रहे होते हैं, तो विश्व इस सनातन संस्कृति की ओर कौतूहल से देख रहा होता है। क्योंकि कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से पूर्वोत्तर तक लोग इस दिन को उगादि, नवरेह, नवरात्र, गुढ़ी पड़वा, जैसे त्योहारों के रूप में मना रहे होते हैं, पावन नदियों की पूजा कर रहे होते हैं, मंदिरों में मंत्रोच्चार के साथ शंखनाद और घंटनाद चल रहा होता है, तो यह पूजन अपने लिए नहीं होता। क्योंकि अपने लिए जब मनुष्य पूजा करता है तो अकेले कर लेता है कभी भी कर लेता है कहीं भी कर लेता है, कैसे भी कर लेता है।
 

सालों से चलने वाली यह परंपरा हर भारतीय घर की संस्कृति का हिस्सा है

नववर्ष तो अपने इष्टदेव के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ ही मानते हैं। - फोटो : अमर उजाला
कभी करता है, कभी नहीं भी करता। लेकिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पहली तिथि को वो केवल जीवन जीता ही नहीं है, वो इस दिन को मनाता भी है। इस दिन वो कृतज्ञता प्रकट करता है उस प्रकृति के प्रति जिसने उसके खेतों को फसलों से भर दिया वो आभार व्यक्त करता है उन फसलों का जो उसकी खुशहाली का प्रतीक हैं वो शुक्रिया अदा करता है उस सृष्टि का जिसने उसे इतना कुछ दिया, और वोनतमस्तक होता है उस परम पिता परमेश्वर के आगे जो इस सृष्टि का पालनहार है।

और इसलिए यह पूजन उसके खुद के लिए न होकर सम्पूर्ण सृष्टि के लिए होता है, प्रकृति के लिए होता है, मानव समाज के लिए होता है, पशुओं के लिए होता, पक्षियों के लिए होता है, फल देने वाले पेड़ों के लिए होता है, फसलों पौधोंके लिए होता, सबकी सुख समृद्धि के लिए होता है। और चूंकि अच्छी फसल पर केवलवो किसान ही नहीं निर्भर होता जिसने खेतों में साल भर मेहनत की होती है बल्किहम सभी निर्भर होते हैं।

इसलिए यह दिन एक त्यौहार बन जाता है जिसमें मनुष्य बीते हुए साल के लिए कृतज्ञता प्रकट करता है तो आने वाले साल के लिए आशीर्वाद की मंगलकामना करता है। सालों से चलने वाली यह परंपरा हर भारतीय घर की संस्कृति का हिस्सा है। शायद इसलिए पूरी दुनिया के साथ मौज मस्ती करते हुएझूमते नाचते हुए हम भारतीय भी भले ही पहली जनवरी को न्यू ईयर पार्टी मेंजाते हों, लेकिन नववर्ष तो अपने इष्टदेव के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ ही मानते हैं।
 

शून्य की खोज हो चाहे नक्षत्रों की खोज...

हिंदू नववर्ष का वैज्ञानिक महत्व भी है. - फोटो : फाइल फोटो
तारीखें देखने के लिए भले ही अंग्रेजी कैलेंडर लाते हों लेकिन तिथियांं तो पंचांग में ही देखते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु ,गृह प्रवेश से लेकर भूमिपूजन, मुंडन से लेकर विवाह तक शुभ मुहूर्त तो विक्रम संवत से ही निकालतें हैं। उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ईसाई युग से 57 साल पहले विक्रम संवत शुरू किया गया था जिसकी वैज्ञानिकता के आगे आज भी आधुनिक विज्ञान बहुत बौना साबित होता है।

दरअसल जब पश्चिमी सभ्यता में गैलेलियो को उनकी खोजों के लिए सजा दी जा रही थी तब भारत ब्रह्मांड के रहस्य दुनिया के सामने खोलते जा रहा था। जब पश्चिमी सभ्यता में एक हज़ार से ऊपर की गणना का ज्ञान नहीं था, तब भारत को गणित की विराटतम संख्या "तल्लाक्षण" का भी ज्ञान था।

तल्लाक्षण अर्थात एक के आगे त्रेपन शून्य से निर्मित संख्या। "ललित विस्तार" नामक ग्रंथ में तल्लाक्षण की व्याख्या करते हुए कहा गया है, "सौ करोड़ यानी एक अयुत,सौ अयुत यानी एक नियुत, सौ नियुतयानी एक कंकर,सौ कंकर यानी एक सर्वज्ञ,सौ सर्वज्ञ यानी एक विभूतंगमा और सौ विभूतंगमा का मान एक तल्लाक्षण के बराबर होता है।

शून्य की खोज हो चाहे नक्षत्रों की खोज, गणित का क्षेत्र हो या खगोल का, आध्यात्म का ज्ञान हो या ज्योतिष, भारतीय दर्शनशास्त्र हो या अर्थशास्त्र इसकी वैज्ञानिकता आज भी अचंभित करने वाली है। इस बात का प्रमाण भारतीय कालगणना है जिसे आज अकाट्यमानकर नासा में इस पर खोज हो रही है।

 
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कालगणना के आधार पर जब हिन्दूनववर्ष का आगमन होता है तो...

शक्ति की उपासना के साथ नवसंवत्सर के स्वागत से बेहतर और क्या हो सकता है।
और इसी कालगणना के आधार पर जब हिन्दू नववर्ष का आगमन होता है तो इसकी वैज्ञानिकता का प्रमाण इससे अधिक क्या हो सकता है कि केवल मानव मात्र इसे एक उत्सव के रूप में नहीं मनाता अपितुप्रकृति भी इस खगोलीय घटना के स्वागत को आतुर दिखाई देती है।

महीनों से खामोश कोयल कूकने लगती है, पक्षी चेहचहाने लगते हैं, पेड़ नए पत्तों से सजजाते हैं, बगीचे रंग बिरंगे फूलों से खिलखिला उठते हैं, पूरी धरती लाल, पीली, हरी चुनरी ओढ़कर इठला रही होती है, और सर्द मौसम वसंत की अंगड़ाई ले रहा होता है। क्या पौधे क्या जानवर सभी एक नई ऊर्जा एक नई शक्ति का अनुभव कर रहे होते हैं।

ऐसे में शक्ति की उपासना के साथ नवसंवत्सर के स्वागत से बेहतर और क्या हो सकता है। यही सनातन संस्कृति और परंपराएं हमारी पहचान हैं। महात्मा गांधी ने भी कहा है कि "स्वराज का अर्थ है, स्वसंस्कृति, स्वधर्म एवं स्वपरम्पराओं का हृदय से निर्वाह करना।"
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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