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हिंदी दिवस विशेष: 'अपनी भाषा में न गा सकना, सबब है बीमारी का'

सार

सवाल है कि संविधान के पहले मसौदे में भाषा के सवाल को क्यों नहीं शामिल किया गया और इसके अलावा संविधान सभा के अध्यक्ष द्वारा भाषा के आधार पर राज्यों के पुर्नगठन किए जाने का प्रस्ताव क्या दक्षिण के राज्यों के दबाव का नतीजा था अथवा इसके दूरगामी परिणाम के बारे में तब व्यापक स्तर पर चर्चा नहीं हो पायी?
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17 जून 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने प्रांतीय भाषा आयोग के गठन का आदेश जारी किया। - फोटो : istock
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विस्तार
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भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, सभ्यता, संस्कृति और परम्परा की संवाहिका भी होती है। भारतीय भाषाओं की विशेषता यह हैं कि विविधता के बावजूद उनमें एकात्मकता का भाव निहित है। इस लिए यूरोपीय भाषाओं से भिन्न भारतीय भाषाएं हमारी राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा की गारंटी है।

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यूरोप की भाषाई विविधता ने जहां नये राष्ट्रों को जन्म दिया, वहीं भारतीय भाषाओं परिवार में यदा- कदा हिंदी के बढ़ते वर्चस्व का सवाल भले उठा, पर देश से अलगाव की बात कम से कम भाषा की कोख से अभी तक नहीं पैदा हुआ। भारत की आजादी के बाद भारत की सभी भाषाओं के मूल समस्याओं का समाधान 12 सितम्बर से 14 सितम्बर के बीच चली मैराथन बहस के बाद तय हुआ।
 

अनुच्छेद 343 हिंदी को देवनागरी लिपि और रोमन संख्या के साथ भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता देती है और अनुच्छेद 345 राज्यों को राजकीय भाषा का भी अधिकार देती है।

 

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एक अरसे तक चला विवाद

आजादी के बाद हिंदी और हिंदुस्तानी का विवाद भी एक अरसे तक चला। फिर भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन का मुद्दा आज भी भाषायी सवाल को कभी न कभी पुनर्जीवित करता रहता है। देश की आजादी के बाद यह पहला अवसर था, जब भारतीय नेताओं को भारत के भविष्य से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल का समाधान ढूढ़ना था।

भाषा के सवाल पर लंबी बहस के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि "हमारे संविधान में बहुत से विवाद उठ खड़े हुए, बहुत से प्रश्न उठे हैं, जिन पर गंभीर मतभेद थे, किन्तु हमने किसी न किसी प्रकार उनका निबटारा कर लिया। यह सबसे बड़ी खायी थी, जिससे हम एक दूसरे से अलग हो सकते थे। हमें यह कल्पना करनी चाहिए कि यदि दक्षिण भारत हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि को स्वीकार नहीं करता, तो क्या होता... हमने यथासंभव बुद्धिमानी का कार्य किया और मुझे हर्ष है, प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी सन्तति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।"

21 फरवरी 1948 का वो दिन

संविधान का पहला मसौदा 21 फरवरी 1948 को पेश किया गया, जिसे बी एन राव ने तैयार किया था। इस मसौदे में भाषा से जुड़ा कोई प्रावधान नहीं था। 17 जून 1948 को संविधान सभा के अध्यक्ष के नाते राजेन्द्र प्रसाद ने प्रांतीय भाषा आयोग के गठन का आदेश जारी किया। इसे "डार कमीशन" के नाम से जाना जाता है।

इस कमीशन को 23 सवालों के साथ-साथ आंध्र, कर्नाटक, केरल और महाराष्ट्र के संदर्भ में भाषा के आधार पर राज्य गठन की संभावनाओं को तलाशने का काम दिया गया था। इस आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया। आयोग ने 1956 में अपनी रिपोर्ट पेश किया। आयोग की सिफारिशों  में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का  सुझाव दिया गया था। 

संविधान सभा में भाषा के सवाल पर हुए फैसलों और बहसों की अनुगूंज समकालीन राजनीति पर व्यापक स्तर पर पड़ा है और आज भी यह एक पेचीदा सवाल बना है। सवाल है कि संविधान के पहले मसौदे में भाषा के सवाल को क्यों नहीं शामिल किया गया और इसके अलावा संविधान सभा के अध्यक्ष द्वारा भाषा के आधार पर राज्यों के पुर्नगठन किए जाने का प्रस्ताव क्या दक्षिण के राज्यों के दबाव का नतीजा था अथवा इसके दूरगामी परिणाम के बारे में तब व्यापक स्तर पर चर्चा नहीं हो पायी?

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मंदारिन, स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद हिंदी दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। - फोटो : अमर उजाला

12 सितम्बर को रखा गया प्रस्ताव

राजेंद्र प्रसाद जी के व्यक्तव्य से भी इस बात की पुष्टि होती है कि दक्षिणी राज्यों के दबाव में संविधान सभा के सदस्यों को आम सहमति के सूत्र तलाशने पड़े। यह सहमति के.  एम. मुंशी और एन गोपाल स्वामी आयंगर के फार्मूले से तय हुआ। 12 सितम्बर को आयंगर ने इस बाबत प्रस्ताव रखा। जिसके तहत हिन्दी राजकीय भाषा, देवनागरी लिपि के साथ रोमन संख्या को मान्यता प्रदान किया गया। साथ ही भाषा और संस्कृति के सवाल पर भी संविधान सभा में चर्चा हुई। सेठ गोविंद दास ने  रोमन अंक को शामिल किये जाने का विरोध किया। संस्कृति से सम्बंधित एक और सवाल की ओर सभा का ध्यान आकृष्ट किया, जिससे आज भी देश दो-चार हो रहा है।
 
सेठ गोविंद दास का कहना है कि -" यह सत्य है कि सेकुलर स्टेट हमने मान लिया है। मगर हमने इसका अर्थ कभी नहीं समझा कि सेकुलर स्टेट मानना अनेक संस्कृतियों को मानना है। इस देश में हजारों साल से एक ही संस्कृति चली आ रही है और वह परम्परा अभी कायम है। इस परंपरा को कायम रखने के लिए और इस बात का खंडन करने के लिए कि  हमारी दो  संस्कृतियां हैं, हम इस देश में एक भाषा और एक लिपि रखना चाहते हैं।" 

सेठ गोविंद दास ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में सभापति के नाते जो भाषण दिया, वह आज भी भाषा संबंधी जो सवाल उठाए जाते हैं,उस  विवाद को एक सार्थक दिशा देता प्रतीत होता है। वे कहते है कि " प्रांतीय भाषाओं से हमारा कोई द्वेष नहीं है। प्रांतीय भाषाओं के बिना केन्द्रीय भाषा की उन्नति हो नहीं सकती। हर प्रांतीय भाषा को शिक्षा, अदालतों और असेम्बली की भाषा होना चाहिए। स्वतंत्रता के साथ, स्वतंत्र भारत कैसा होगा, इसकी भी कल्पना हमने की थी। वह कल्पना तब तक पूरी नहीं हो सकती, जब तक हम भाषा के प्रश्न को हल न कर लें। स्वराज का अर्थ इस देश में लोग तभी समझेंगे, जब भाषा का प्रश्न पूरी तरह हल हो जाए।"


डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भाषण

भाषा के सवाल पर सबसे लंबा भाषण और एक व्यावहारिक पहल की ओर दिशा संकेत करता भाषण डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भाषण भी उल्लेखनीय है। वे इस बात का जिक्र करते है कि-" अगर आप चाहते है कि हिंदी सारे भारत में अपनाई जाए और केवल राजकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी का स्थान न लें, तो आप हिंदी को इस योग्य बनाइए और उसमें प्राकृतिक रूप से न केवल संस्कृत से, बल्कि भगिनी रूप अन्य भारतीय भाषाओं से भी शब्द आने दीजिए।

हिंदी के विकास को कुंठित मत कीजिए। मैं अपने बंगाली ढंग से हिंदी बोल सकता हूं। महात्मा गांधी और सरदार पटेल गुजराती ढंग से ही हिदी बोलते है।" भाषाएं तब और समृद्ध होती हैं, जब बोलियों से उनका जीवंत सम्पर्क बना रहता है।आलोचक नामवर सिंह का ठीक ही कहना है कि- "बोलियां भाषाओं की गंगोत्री होती है।" 

आज मंदारिन, स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद हिंदी दुनिया की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, तो इसका श्रेय सुपरिचित आलोचक रामविलास शर्मा जी "उन हजारों मजदूरों को देते हैं, जिन्हें 19 वीं सदी में अंग्रेज  व्यापारी सस्ती मजदूरी कराने के लिए बाहर ले गए। मजदूरों द्वारा फैलाई हिन्दी के अलावा नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देश भी आर्य भाषा परिवार की ही भाषा बोलते हैं।" हिंदी-द्रविड़ भाषा विवाद रामविलास शर्मा की नज़र में अंग्रेजों की एक एक औपनिवेशिक चाल है।

भाषाई विवाद

भाषा समस्या पर विचार करते हुए रामविलास शर्मा का यह कथन भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि- "भाषा की समस्या मात्र प्रशासन की समस्या नहीं है। इसका गहरा संबंध देश के जनतांत्रिक आंदोलन और देश की सुरक्षा से है।" भाषायी विवाद पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यहां तक दावा है कि "देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे हों, सिर्फ यही बात नहीं, बल्कि उनका भरपूर सम्मान भी होता रहा है। एक बार मेरे इस कथन को अपने सामने रखकर देखें तो हमारी वर्तमान भाषा समस्या काफी स्पष्ट हो जाएगी।"

आज  वैश्वीकरण के युग में जब से अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व बढ़ा है। देशी भाषाओं को हीन और लोकभाषाओं को कुजात की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया है। ऐसे में तब सोवियत संघ के एक छोटे पहाड़ी प्रांत देगिस्तान में बोली जाने वाली 'अवारी भाषा' के कवि-लेखक की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक" मेरा दागिस्तान" की कुछ पंक्तियां याद आती हैं-

जब मैं अपनी सारी बीमारियों से मुक्त हो जाऊंगा, न किसी डॉक्टर की जरूरत होगी, न किसी दवा दारू की। पर मेरे लिए तो अपनी भाषा में न गा सकना ही, सबब है बीमारी का। अगर कल मेरी भाषा लुप्त हो जाती है, तो मैं क्या करूँगा भला जीकर। आज ही मर जाऊँ तो बेहतर।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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