भाषा व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य अथवा दो समूहों के मध्य केवल संपर्क का ही माध्यम नहीं होती। वह संपर्क से आगे बढ़कर उनके मध्य स्नेह का सूत्र भी सुदृढ़ करती है, उनमें अंतरंगता स्थापित कर उनके बीच भ्रातृत्व-भाव का विकास और मैत्री-भाव की पुष्टि भी करती है।
यही वजह है कि नेतागण जिस क्षेत्र विशेष में वोट मांगने जाते हैं उस क्षेत्र की भाषा, शब्दावली, कहावत आदि अपने भाषण में पिरोने का प्रयत्न भी करते हैं। विक्रेता अपने ग्राहक को लुभाने के लिए ग्राहक की भाषा में बात करने का प्रयास करते हैं।
रेल के डिब्बों में पहले से बैठे यात्री नवागंतुक यात्रियों को प्रायः नहीं बैठने देते, तरह-तरह के बहाने बनाते हैं किंतु अगर खड़ा हुआ यात्री बैठे हुए यात्री की बोली में बात करना प्रारंभ कर देता है तब उसे अपना बंधु समझ कर थोड़ी सी ना-नुकुर के बाद बैठने की जगह दे दी जाती है।
क्षेत्रीय भाषा-बोली के ये प्रयोग इस तथ्य के साक्षी हैं कि भाषा विविध-पक्षों के मध्य सहभाव के विकास का भी सशक्त साधन है। वह राष्ट्रीय-एकता के चक्र की धुरी है और विशिष्ट संदर्भों में राष्ट्र-निर्माण का महत्वपूर्ण कारण भी है। पाकिस्तान से छिन्न होकर भाषाई आधार पर ‘बांग्लादेश‘ का प्रथक राष्ट्र के रूप में गठन इस तथ्य का जीवंत उदाहरण है।
भारत अनेक भाषाओं का देश है। सुदूर अतीत से ही भारतवर्ष में परस्पर भिन्न प्रतीत होने वाली अनेक भाषाओं की प्रवाह-परंपरा विद्यमान है और इन सबके मध्य संस्कृत की निर्विवाद स्वीकृति इस देश की सामाजिक- सांस्कृतिक एकता को पुष्ट करती हुई राष्ट्रीय-एकता को सुदृढ़ आधार देती रही है।
वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कश्मीर से कन्याकुमारी तक आज भी समादृत हैं। इस ग्रंथों से कथा-सूत्र चुनकर प्रायः समस्त भारतीय भाषाओं ने अपने साहित्य को समृद्ध किया है। संस्कृत की शब्दावली प्राचीन पाली, प्राकृत भाषाओं में ही नहीं अपितु तमिल, तेलगू, बंगला, मराठी, कन्नड़ आदि अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी सुलभ है।
हिंदी का तो वह सर्वस्व ही है। राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में संस्कृत की इस व्यापक और निर्विवादित स्वीकृति ने बारह सौ वर्ष की गुलामी में भी इस राष्ट्र को बिखरने नहीं दिया, भाषा और संस्कृति के धरातल पर राष्ट्रीय-एकता को संरक्षित-संवर्धित किया किंतु भारत को विभाजित, खंडित और अशक्त देखने की दुरभिलाषा पालने वाली भारत-विरोधी शक्तियों ने पहले इस्लामिक शासन के सहयोग से और फिर ब्रिटिश सत्ता के साथ मिलकर संस्कृत को उपर्युक्त गौरव से अपदस्थ करने का हरसंभव प्रयत्न किया किंतु काल के प्रवाह में जैसे-जैसे संस्कृत केंद्र से परिधि की ओर धकेली गई वैसे-वैसे उसकी उत्तराधिकारिणी हिंदी उत्तरोत्तर पुष्ट होती हुई उसका स्थान ग्रहण करती गई।
बीसवीं शताब्दी के मध्य तक हिंदी अपने विरुद्ध किए जाने वाले समस्त कुचक्रों पर विजय पाती हुई इतनी सशक्त और समृद्ध भाषा बन गई कि ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में वही राष्ट्रीय जागरण का प्रमुख माध्यम बनी।