आज अगर मानक हिंदी अपनी उपभाषाओं और बोलियों पर हावी हो रही है तो इसके पीछे बोलियों के संहार की मंशा न होकर मानक हिंदी भाषा का व्यावहारिक कारणों से बढ़ता इस्तेमाल है।
2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 96.71 फीसदी आबादी भारतीय मानक भाषाओं का प्रयोग करती हैं। बोलियों का विलुप्त अथवा धीरे धीरे चलन से बाहर होते जाना, यह समस्या अकेले हिंदी के साथ ही नहीं है बल्कि उन सभी संविधान मान्य 22 भारतीय भाषाओं के साथ है, जो अब अपने अपने राज्यों की राजभाषाएं भी हैं, जिसमे खुद स्टालिन की मातृभाषा तमिल भी शामिल है।
मानक हिंदी के बढ़ते चलन के कारण हिंदी की 18 बोलियों का दायरा सिकुड़ जरूर रहा है, लेकिन यह कहना कि हिंदी सुनियोजित तरीके से उनको ‘खा’ रही है, अपने आप में कुत्सित भाव लिए हुए है। स्टालिन को हिंदी के बारे में इतनी दुराग्रह पूर्ण गहरी जानकारी भी किसी ने दी ही होगी। अपने केन्द्र पर सियासी वार में स्टालिन ने दावा किया कि यूपी बिहार कभी हिंदी क्षेत्र नहीं थे तथा बीती एक सदी में जबरन हिंदी थोपने से उत्तर भारत की 25 भाषाएं समाप्त हो गईं।
हिंदी कई भाषाओं के अस्तित्व पर खतरा
एक्स पर अपनी पोस्ट में स्टालिन ने कहा कि हिंदी के कारण भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खरिया, खोरठा, कुरमाली, कुरुख, मुंडारी, और कई सारी भाषाएं अब अस्तित्व के लिए हांफ रहे हैं। हालांकि भाजपा ने स्टालिन के इस बयान को ‘
मूर्खतापूर्ण’ कहा है। भाषा विज्ञान के अनुसार यूपी की ‘
पूर्वी हिंदी’ और बिहारी की ‘
बिहारी हिंदी’ मानक हिंदी से थोड़ी अलग जरूर है, लेकिन वह हिंदी क्षेत्र का भाग नहीं है, यह सरासर असत्य है।
अलबत्ता स्टालिन की पोस्ट में यह चिंता जरूर विचारणीय है कि हिंदी सहित सभी मानक भारतीय भाषाओं के अतिक्रमण से उनकी बोलियाँ और उप भाषाएं अपना वजूद कैसे बचाएं? खासकर वो बोलियां जो कभी मान्य भाषाएं ही थीं, लेकिन कालांतर में बोलियां बन कर रह गईं।
जाने माने पत्रकार पी. साईनाथ का कहना है कि अवधी, ब्रज, भोजपुरी जैसी भाषाओं को बोलियां कहना ही गलत है। हिंदी की तरह मानक कन्नड के कारण वास्तव में मान्य भाषाएं ही हैं, लेकिन अब मानक भाषाओं की दबंगई के आगे बोलियां कहलाने लगी हैं, प्रचलन से या तो बाहर होती जा रही है या फिर उनका दायरा ग्रामीण क्षेत्रों तक सिमटता जा रहा है। जहां तक आधुनिक और मानक हिंदी की बात है तो इसका इतिहास ही करीब डेढ़ सौ साल पुराना है। इसे भी शुरू में खड़ी बोली ही कहा जाता था।
हिंदी के पांच रूप
हिंदी के भी विद्वानों के अनुसार हिंदी के भी पांच रूप हैं। पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहारी हिंदी, राजस्थानी हिंदी और पहाड़ी हिंदी। इनमें भी विभिन्न कारणों से पश्चिमी हिंदी ही पहले खड़ी बोली और आज की मानक हिंदी के रूप में स्थापित हो गई है। यही राजभाषा भी है और विदेशियों के लिए भी ‘
हिंदी’ से तात्पर्य इसी मानक हिंदी से है।
शिक्षण संस्थानों में भी यही हिंदी पढ़ाई जाती है। हालांकि इस मानक हिंदी का स्वरूप भी बदलता रहा है। यह हिंदी अपनी बोलियो से ही ऊर्जा प्राप्त करती है। साथ ही उसे अन्य भाषाओं से शब्द संपदा लेने से गुरेज नहीं है।
लिहाजा इसकी पाचन शक्ति भी अंग्रेजी की तरह विराट है। यह हिंदी चाहे अनचाहे दूसरी भाषाओं से शब्द, तेवर और मुहावरे लेती जा रही है और खुद को समृद्ध करती जा रही है। ऐसा नहीं है कि भाषा का यह आदान- प्रदान एकतरफा हो, अन्य भारतीय भाषाएं भी व्यावहारिक तकाजों की वजह से हिंदी से शब्द और मुहावरे आयात कर रही हैं।
कई बार तो यह आरोप भी लगता है कि हिंदीतर भारतीय भाषाएं हिंदी के ‘
अतिक्रमण’ से भी जूझ रही हैं। सच्चाई यही है कि आज आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक कारणों से भी हिंदी देश की सर्वाधिक स्वीकार्य भाषा स्वत: बनती जा रही है, जिसमें राजनीतिक पलीता लगाने की कोशिश बहुत ज्यादा सफल शायद ही हो।