लोकसभा चुनाव से पहले जहां भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का कुनबा बड़ा करने में जुटी है, वहीं हरियाणा में उसने जननायक जनता पार्टी (जजपा) से राहें जुदा कर ली हैं। जजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर इस्तीफा दे चुके हैं और शाम को पुनः भाजपा नेतृत्व की सरकार बनने जा रही है।
दरअसल, जजपा से अलग होकर भाजपा ने कहीं न कहीं राजनीति की चतुर चाल चली है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में जजपा एक या दो सीट मांग रही थी और प्रेशर पॉलिटिक्स की कोशिश कर रही थी, लेकिन पिछले कुछ समय से जजपा से अलग होने का बहाना ढूंढ रही भाजपा को मौका मिल गया।
पहले हरियाणा की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से क्या चल रहा है? इसे समझते हैं। राज्य में कभी मुख्य सत्ताधारी पार्टी रही कांग्रेस पिछले नौ साल से विपक्ष में है। राज्य में जाट कांग्रेस का मुख्य वोटबैंक हैं। इसी जाट वोटबैंक में सेंध लगाकर वर्ष 2019 में युवा नेता दुष्यंत चौटाला ने नई नवेली जजपा को विधानसभा की 90 में से 10 सीटों पर जीत दिलाई थी। भाजपा को 41 सीटें, बहुमत से 5 सीटें कम, मिली थीं। कांग्रेस 30 सीटों पर रुक गई थी। उस समय दुष्यंत चौटाला एकाएक हीरो बनकर उभरे थे। तब 7 निर्दलीय, एक इनोलो और एक हलोपा का विधायक जीता था। कांग्रेस ने कुछ जोड़-तोड़ की कोशिश की थी, लेकिन दुष्यंत चौटाला को कांग्रेस के बजाय भाजपा के साथ जाने में फायदा दिखा था। फिर निर्दलीय भी भाजपा के पक्ष में थे।
पहला, दुष्यंत चौटाला को पता था कि यदि वो कांग्रेस के साथ गए तो उन्हें वोटबैंक का नुकसान होगा। दूसरा, दुष्यंत को भाजपा के साथ रहने का लाभ यह दिखा कि सरकार में न केवल हिस्सेदारी अच्छे से मिलेगी, बल्कि केंद्र में भाजपा के रहने का लाभ भी पार्टी को मिलेगा।
हालांकि, पिछले 4 साल में जजपा कोटे के मंत्रियों की कार्यशैली का विरोध हो रहा था। स्वयं उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला को लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर असहज थे।
जजपा के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। यहां तक दुष्यंत चौटाला पर उन्हीं की पार्टी के नारनौल विधायक राजकुमार गौतम ने उंगली उठाई थी और विधानसभा में दोनों के बीच नोकझोंक हुई थी।
अब वर्तमान के घटनाक्रम को समझते हैं। जजपा लोकसभा चुनाव में भाजपा से हिसार और महेंद्रगढ़-नारनौल सीट मांग रही थी, लेकिन भाजपा को पता था कि एक-दो सीटें जजपा को देने का कोई लाभ पार्टी को नहीं मिलने वाला है। खासकर जजपा के जाट वोटर भाजपा को वोट नहीं देंगे।
भाजपा को यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि जजपा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का ही वोट कटेगी, जिसका लाभ उसे मिलेगा। अब पूरी संभावना है कि लोकसभा चुनाव में राज्य की सभी 10 सीटों पर जजपा अकेले लड़ेगी।
कांग्रेस भी मजबूती के साथ अपने प्रत्याशी उतार रही है। ऐसे में जाट वोटर बंटेगा। राज्य में जो समीकरण बन रहे हैं, उसमें नॉन जाट वोटर भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया है। खासकर पंजाबी, ब्राह्मण और दलित वोटर भाजपा को सपोर्ट करता है। यदि जाट वोटर आपस में बंटता है तो उसका लाभ भाजपा को होने वाला है।
राज्य में विधानसभा चुनाव आगामी नवंबर में होने हैं और निर्दलीयों के सहारे भाजपा सरकार चलती रहेगी। ऐसे में भाजपा के लिए यह गठबंधन टूटना फायदे का सौदा होगा।
एक संभावना यह भी जताई जा रही है कि नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में इनेलो भाजपा के साथ आ सकती है। उसे गठबंधन में 90 में से 10-15 सीट मिल सकती हैं। इनेलो के पास 2-3 प्रतिशत जाट वोट बताया जाता है। कुछ सीटों पर भाजपा को लाभ इनेलो का लाभ मिल सकता है। हालांकि, इस गठबंधन को लेकर अभी कुछ कह पाना मुश्किल है।
कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि खट्टर करनाल सीट से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं, इसलिए भाजपा नेतृत्व ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नायब सैनी को नया मुख्यमंत्री चुना है। ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि जजपा विधायक टूट सकते हैं। राजकुमार गौतम समेत 6 विधायक भाजपा के संपर्क में हैं। साफ है कि भाजपा के लिए गठबंधन टूटना फायदे का ही सौदा होगा।
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