मनुष्य अपने जीवन का बड़ा हिस्सा उन चीजों के पीछे भागते हुए नष्ट कर देता है, जिनके बारे में उसे लगता है कि वे उसे सुख देंगी। वह बड़े-बड़े आलीशान घर बनाता है, बेशकीमती कपड़े, जेवरात पहनता है, नाम के आगे उपाधियां जोड़ता रहता है और फिर एक दिन अकेले कमरे में बैठ कर खुद से यह पूछने पर मजबूर होता है कि मैं अब भी अशांत क्यों हूं? यह प्रश्न ही मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी है। यदि सुख वास्तव में विलासिता में होता, तो राजाओं से ज्यादा सुखी कोई नहीं होता। पर इतिहास के पन्ने पलटने पर मालूम पड़ता है कि राज-दरबारों में उत्सवों की रोशनी से ज्यादा भय की छाया हुआ करती थी। सिंहासनों पर बैठे लोग भी संदेह, ईर्ष्या और असुरक्षा के साये में जीते थे।
सोने-चांदी के बर्तनों में खाना तो खाते थे, पर कभी भी चैन से सो नहीं पाते थे। विलासिता शरीर को सुविधा दे सकती है, पर आत्मा को शांति नहीं। मनुष्य की भूल यह है कि वह सुख को बाहर खोजता है, जबकि सुख का स्रोत तो भीतर है। वह सोचता है कि यदि उसके पास और ज्यादा धन-संपत्ति, शोहरत होगी, तो उसका दिल और भर जाएगा।
पर दिल किसी खजाने की पेटी तो नहीं है, जिसे धन-दौलत से भरा जा सके। वह तो एक ऐसी जगह है, जो प्रेम, स्वतंत्रता व आत्म-सम्मान से भरती है। मैंने ऐसे लोगों को देखा है, जिनके पास सब कुछ था, सिवाय संतोष के। और ऐसे लोगों को भी देखा, जिनके पास कुछ नहीं था, पर वे एक शांत मुस्कान के साथ जीवन जीते थे। आखिर फर्क कहां था? वस्तुओं में नहीं, दृष्टि में।
जिस मनुष्य ने अपने सुख को भोग-विलास के साधनों पर निर्भर बना दिया, उसने अपने जीवन को भाग्य का दास बना दिया, क्योंकि वस्तुएं तो नश्वर हैं। धन आज है, कल नहीं। लेकिन जो मनुष्य विचार की स्वतंत्रता में सुख खोजता है या कर्म-मेहनत में सुख खोजता है, उससे उसका भौतिक सुख तो छिन सकता है, पर उसका आंतरिक सुख कोई नहीं छीन सकता। विलासिता मनुष्य को बनावटी बना देती है। वह अपनी प्राकृतिक खुशियों को भूलने लगता है। तब उसे सूर्यास्त देखने के लिए भी विशेष अवसर चाहिए। वह जीवन को अनुभव नहीं करता, बल्कि उसका प्रदर्शन करता है।
मैंने सीखा कि सुख का संबंध ‘अधिक’ से नहीं, ‘पर्याप्त’ से है। जिसे यह हुनर आ गया कि सीमित वस्तुओं में भी संतोष कैसे पाया जा सकता है, वही वास्तव में स्वतंत्र है। मैं यह नहीं कहता कि गरीबी कोई महान आदर्श है। अत्यधिक अभाव भी आत्मा को तोड़ सकता है। सुख एक स्वतंत्र मन में है, जो बिना भय के सोच सके। वह उस प्रेम में है, जहां दिखावा नहीं, सच्चाई हो। सुख का रहस्य संसार को जीत लेने में नहीं, खुद के भीतर एक छोटा-सा शांत प्रदेश बना लेने में है। और शायद इसी कारण एक साधारण किसान, जो दिनभर कड़ी मेहनत करने के बाद शाम को अपने परिवार के बीच बैठ कर रोटी खाता है और हंसता है, कभी-कभी उस सम्राट से ज्यादा सुखी होता है, जो सोने के सिंहासन पर बैठा हुआ भी भय से कांप रहा हो।
सूत्र: लालच से बचें
सच्चा सुख धन, वैभव और विलासिता में नहीं, बल्कि मन के संतोष और जीवन के संतुलन में छिपा है। मनुष्य जितना अधिक बाहरी वस्तुओं के पीछे भागता है, उतना ही अपने भीतर की शांति से दूर होता जाता है। इसलिए जीवन में आवश्यकताओं को समझें, लालच से बचें और छोटी-छोटी खुशियों का आनंद लें।