चाहे संसद में रहे हों या संसद के बाहर, श्रमिक और देशहित से जुड़े मामलों को लेकर गुरुदास दासगुप्ता की आवाज हमेशा बुलंद रही। राजनीति विचारधारा से जब जुड़ी होती है तो राजनेता के समक्ष अपनी वैचारिक धारा की मर्यादा में अपने आचरण को समेटे रहना होता है। कैडर और खास विचारधारा वाली पार्टियों के राजनेताओं को तो अपनी पार्टी लाइन की मर्यादा कहीं ज्यादा गहरे तक देखना होती है।
आज के दौर में यह पार्टी लाइन इतनी कड़ी हो गई है, वैचारिकता की मर्यादा इतनी मजबूत हो गई है कि विपरीत विचारधाराओं के राजनेता संसद के केंद्रीय कक्ष में भले ही साथ बैठ लें, लेकिन संसद के बाहर उनका आपस में मिलना, बैठना या बात करना तक गुनाह समझा जाता है। इसे अनुशासनहीनता तक के दायरे में माना जाने लगा है।
दरअसल, यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक दलों ही नहीं, उनसे जुड़े युवा और दूसरे तरह के संगठनों की भी हो गई है। आज के दौर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता या पदाधिकारी अगर आइसा के कार्यकर्ता या पदाधिकारी से बात कर लें या इसके ठीक उलट हो तो दोनों ही वैचारिक संगठनों में अपने-अपने पदाधिकारी और कार्यकर्ता के खिलाफ आंखें तरेरी जाने लगती हैं, उसकी वैचारिक और राजनीतिक निष्ठा पर सवाल उठने लगते हैं।
संघ से जुड़े मजदूर नेता दत्तोपंत ठेंगड़ी से गुरुदास दासगुप्ता का रहा गहरा रिश्ता
इसके चलते आज राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच मानवीय रिश्ते भी तार-तार होने लगे हैं। लेकिन गुरुदास दासगुप्त इन बंधनों के बावजूद अपने रिश्ते निभाने में आगे थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक मर्यादा, देशहित और देशहित के लिए साथ काम कर रहे लोगों के साथ रिश्तों का तार संतुलन के साथ जोड़े रखा।
वाजपेयी सरकार के दौरान तो उनका यह संतुलन बार-बार दिखा। गुरुदास दासगुप्ता भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े मजदूर संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस यानी एटक के महासचिव के नाते श्रमिकों के हितों के मुद्दों पर हर साथ संस्था के साथ काम किया, जो मजदूरों के हितों के लिए लड़ रहे थे। इस सिलसिले में उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय मजदूर संघ और उसके संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी से भी गहरा रिश्ता रहा।
गुरुदास दासगुप्ता ने लगाए थे वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारे
नरसिंह राव सरकार जब भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे वैश्वीकरण के लिए खोल रही थी, तब मजदूरों के हितों की अनदेखी भी होने लगी थी। श्रम कानूनों को लगातार लचीला बनाया जाने लगा था। तब एक-दूसरे के विपरीत वैचारिक उत्स से निकले होने के बावजूद भारतीय मजदूर संघ और एटक ने मिलकर काम किया।
स्वदेशी आंदोलन को बढ़ाने का बीड़ा जब भारतीय मजदूर संघ ने उठाया तो उसमें एटक का भी साथ मिला। इसके चलते गुरुदास दासगुप्ता और दत्तोपंत ठेंगड़ी में ऐसा रिश्ता बना कि जब 14 अक्टूबर 2004 को ठेंगड़ी जी का निधन हुआ तो दिल्ली में भारतीय मजदूर संघ के दफ्तर पर उन्हें श्रद्धांजलि देने गुरुदास दासगुप्ता भी पहुंचे थे। उस समय उन्होंने ठेंगड़ी जी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, हमारा नेता चला गया। इतना ही नहीं, उन्होंने तब वंदेमातरम् और भारत माता की जय के नारे भी लगाए थे।
जिन्हें भारतीय वामपंथी विचारधारा और रुझान की समझ है, वे शायद ही स्वीकार कर पाएं कि कोई जाना-माना कम्युनिस्ट इस तरह के नारे लगा सकता है? लेकिन गुरुदास दासगुप्ता अलग थे। उन्हें अपनी वैचारिक राजनीति प्यारी थी, वे अपनी वैचारिकता के प्रति राजनीतिक तौर पर भी निष्ठावान थे, लेकिन उन्हें अपने रिश्तों की भी समझ थी और देशहित की भी, इसीलिए वामपंथी होते हुए भी ठेंगड़ी जी के अतीत होने के बाद अपनी वैचारिकता से इतर के भी नारे को पुरजोर तरीके से लगाने में उन्हें हिचक नहीं हुई।