क्या आपने कभी समुद्र को देखा है? यदि आप वास्तव में समुद्र को देखें, तो पाएंगे कि उसमें एक विलक्षण व्यवस्था है। लहरें उठती हैं, गिरती हैं, गर्जना करती हैं, लेकिन तब भी उसके भीतर एक गहरा मौन मौजूद रहता है। वह अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ उपस्थित है, फिर भी अपनी सीमा का अतिक्रमण नहीं करता। अब प्रश्न यह नहीं है कि समुद्र अपनी सीमा क्यों नहीं लांघता।
प्रश्न यह है कि मनुष्य अपनी सीमा क्यों लांघता है? हमारे भीतर आखिर ऐसा क्या घटित होता है कि हम निरंतर ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेने की होड़ में लगे रहते हैं? ज्यादा से ज्यादा धन, सत्ता, ज्ञान और सुरक्षा। यह ‘ज्यादा से ज्यादा’ की इच्छा ही हमारे भीतर अशांति पैदा करती है। और जहां अशांति है, वहां अतिक्रमण है। समुद्र महत्त्वाकांक्षी नहीं है। उसने कभी पर्वत, नदी या आकाश बनने की इच्छा नहीं की। वह जो है, उसे पूर्ण रूप से स्वीकार करता है। लेकिन मनुष्य स्वयं से कभी संतुष्ट नहीं होता। वह निरंतर किसी और जैसा बनने की कोशिश करता है। और यह 'बनने' की प्रक्रिया ही संघर्ष का स्रोत है।
जब हम अपनी तुलना किसी और से करने लगते हैं, तभी ईर्ष्या जन्म लेती है। ईर्ष्या से महत्त्वाकांक्षी आती है, महत्वाकांक्षा से प्रतिस्पर्धा, प्रतिस्पर्धा से भय और भय से मनुष्य अपनी सारी सीमाएं तोड़ डालता है। इसलिए समस्या सीमा की नहीं है। समस्या उस मन की है, जो स्वयं को नहीं जानता। समुद्र को किसी ने अनुशासन नहीं सिखाया। फिर भी उसमें व्यवस्था है, क्योंकि उसकी व्यवस्था भीतर से आती है, बाहर से थोपी नहीं गई है। यही बात मनुष्य के लिए भी सत्य है।
यदि आपका अनुशासन भय पर टिका है, तो वह वास्तविक अनुशासन नहीं है। यदि आप सजा के खौफ से मर्यादा में रहते हैं, तो वह मर्यादा नहीं, कैद है। सच्ची मर्यादा तो तब जन्म लेती है, जब मन स्वयं को स्पष्ट रूप से देख लेता है। बिना निर्णय के, बिना निंदा के और बिना औचित्य सिद्ध किए देखना ही ध्यान है। और जब देखने वाला तथा देखा जाने वाला अलग नहीं रह जाते, तब मन में एक अद्भुत शांति जन्म लेती है। उस शांति में अतिक्रमण संभव नहीं। समुद्र की गहराई को देखिए। सतह पर तूफान हो सकता है, लेकिन गहराई शांत रहती है।
हमारा जीवन ठीक इसके विपरीत है। सतह पर हम मुस्कुराते हैं, मगर भीतर तो बड़ा तूफान है। हम सम्मान, प्रेम और सुरक्षा चाहते हैं और इसी खोज में खुद को खो बैठते हैं। जब तक आप केवल सतह पर जीते हैं, तब तक हर छोटी बात आपको विचलित करेगी। किसी की आलोचना, प्रशंसा, सफलता या असफलता- ये सब आपको प्रभावित करते हैं। लेकिन यदि मन में गहराई है, तो बाहरी लहरें आपको हिला नहीं सकतीं। समुद्र हमें यही सिखाता है- गहराई, न कि विस्तार। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर ऐसी गहराई खोज लेगा, उस दिन वह भी समुद्र की तरह होगा- असीम होकर भी मर्यादित, शक्तिशाली होते हुए भी शांत और स्वतंत्र रहते हुए भी व्यवस्था से परिपूर्ण।
सूत्र: दुनिया से पहले खुद को जानें
इन्सान को समुद्र की तरह अपनी गहराई को पहचानना चाहिए। जब मन सजा के दबाव से मुक्त होकर स्वयं को स्पष्ट रूप से देखता है, तब सच्ची मर्यादा का जन्म होता है। बाहरी आलोचना या प्रशंसा से विचलित हुए बिना यदि हम अपनी सतह से परे भीतर की शांति को खोज लें, तो हम भी असीम और मर्यादित बन सकते हैं। दुनिया से पहले खुद को जानें।