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विमर्श: विलुप्त हो रहे गोडावण का संरक्षण केवल सरकार नहीं, सबकी जिम्मेदारी

Sat, 02 Nov 2024 12:51 PM IST
विनोद पाठक हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इंसान और प्रकृति के बीच की जंग का खामियाजा गोडावण ने उठाया है। सदियों से इंसान इसका शिकार करता आ रहा है। 2018 के बाद गोडावण की गिनती नहीं की गई है। तब की गणना के अनुसार 125 गोडावण डेजर्ट पार्क और 29 ब्रीडिंग सेंटर में थे, जबकि पांच दशक पहले इनकी संख्या 1500 के करीब थी।
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गोडावण पक्षी - फोटो : विनोद पाठक
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विस्तार
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प्रकृति प्रेमियों के लिए यह खबर खुश कर देने वाली है। जैसलमेर के सुदासरी गोडावण ब्रीडिंग सेंटर में कृत्रिम गर्भाधान यानी आर्टिफिशल इनसेमिनेशन (एआई) से विलुप्त हो रहे गोडावण का चूजा को पैदा किया गया है। भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने इस तकनीक का इस्तेमाल किया है। गोडावण राजस्थान का राज्य पक्षी भी है और वन विभाग के अनुसार अब केवल यह 173 ही बचे हैं। 

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वैसे तो गोडावण पक्षी की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई है। अपनी यायावरी प्रवृत्ति के चलते यह पक्षी भारत आ गया। पहले यह पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु और पड़ोसी देश पाकिस्तान में घास के मैदानों में पाया जाता था। अत्याधिक शिकार के कारण अब यह केवल राजस्थान की रेतीली भूमि पर पाया जाता है। इसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भी कहते हैं।

गोडावण के विलुप्त होने का था खतरा

इंसान और प्रकृति के बीच की जंग का खामियाजा गोडावण ने उठाया है। सदियों से इंसान इसका शिकार करता आ रहा है। पूर्व में शिकारी गोडावण के घोंसले या चूजों को घेरकर उनके चारों ओर घास-फूंस जमाकर आग लगा देते थे। चूजों या घोंसले को बचाने मादा गोडावण आती और पंखों से जब आग बुझाने की कोशिश करती है तो पंख जल जाते हैं। इसके बाद शिकारी मां गोडावण का शिकार कर लेते हैं। आधुनिक काल में स्वचलित हथियारों ने गोडावण का शिकार बेहद आसान कर दिया। 

फिर रेगिस्तान में विकास योजनाओं ने गोडावण के अस्तित्व पर संकट खड़ा किया है। जैसलमेर में पिछले कुछ वर्षों में सोलर और विंड एनर्जी के सैकड़ों प्रोजेक्ट शुरू हुए हैं। पूरे क्षेत्र में बिजली के तारों का एक पूरा जाल बिछा हुआ है। अक्सर गोडावण इन तारों में उलझ कर मर जाते हैं। बिजली के तारों से लुप्तप्राय हो रहे इस पक्षी के संरक्षण के प्रयासों को बड़ा धक्का लग रहा है। जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में गोडावण का आवारा कुत्ते शिकार कर लेते हैं। 

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भारत के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम- 1972 के तहत गोडावण संरक्षित श्रेणी में आता है। वर्ष 1981 में राजस्थान ने इसे राज्य पक्षी घोषित किया, लेकिन इसके संरक्षण के प्रयासों को लेकर जून, 2013 में तब गति मिली, जब राजस्थान सरकार ने प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड शुरू किया। हालांकि, वर्ष 2018 के बाद गोडावण की गिनती नहीं की गई है। तब की गणना के अनुसार 125 गोडावण डेजर्ट पार्क और 29 ब्रीडिंग सेंटर में थे, जबकि पांच दशक पहले इनकी संख्या 1500 के करीब थी।

वर्ष 2019 में 63 गोडावण अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तान पहुंच गए थे, जहां 49 का शिकार कर लिया गया। दरअसल, राजस्थान से इनके पलायन का मुख्य कारण इंसानी हस्तक्षेप, अवैध खेती और ऊर्जा कंपनियों की हाईटेंशन लाइनों को माना जाता है। वर्ष 2020 में गुजरात के गांधीनगर में प्रवासी पक्षियों पर आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में भारत-पाकिस्तान ने एक समझौता किया था, जिसमें गोडावण के अंतरराष्ट्रीय संरक्षण की बात कही गई। इसी समझौते के बाद पाकिस्तान में गोडावण के शिकार पर पाबंदी लगाने पर जोर दिया जाने लगा। 

कृत्रिम गर्भाधान से बढ़ेगी पक्षियों की संख्या

अब गोडावण को कृत्रिम गर्भाधान से पैदा कर एक ऐतिहासिक कदम आगे बढ़ाया गया है। इस सफलता के बाद गोडावण का स्पर्म बैंक बनाने और इनकी जनसंख्या को बढ़ाने में निश्चित रूप से मदद मिलेगी। हालांकि, पिछले कुछ सालों के प्रयासों से डेजर्ट नेशनल पार्क, जैसलमेर में इनकी संख्या में थोड़ा इजाफा जरूर हुआ है। डेजर्ट नेशनल पार्क को 1.2 मीटर ऊंचे और 2-3 किलोग्राम के गोडावण के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि यहां इसके प्रजनन की अनुकूल परिस्थितियां हैं। 

पर्यावरण और वन्यजीव प्रेमी गोडावण की घटती आबादी को लेकर आवाज उठाते रहे हैं। सरकार भी अपनी तरफ से प्रयास कर रही है। वैज्ञानिकों ने सुखद परिणाम दिया है। फिर भी गोडावण को बचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।

इस सुंदर पक्षी का लुप्त होना संपूर्ण मानव जाति के लिए एक बड़ा धक्का होगा। विकास की कीमत पर प्रकृति से छेड़छाड़ सही नहीं है। गोडावण के शिकार पर सरकार को और सख्त कदम उठाने चाहिए। सरकार के इन प्रयासों में यदि आम आदमी भी साथ दे तो गोडावण को लुप्त होने से बचाया जा सकता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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