स्लेटी खंजन यूरोप, साइबेरिया और एशिया क्षेत्रों में व्यापक रूप से वितरित है। शीतकाल प्रवास के लिए स्लेटी खंजन ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों से प्रत्येक वर्ष सितंबर माह से मैदानी व जलिय स्रोतों वाले क्षेत्रों में प्रवास करते हैं!
पहचान: शरीर का आकार लम्बा और पतला होता है। स्लेटी सिर और पीठ, सफेद भौंह और पूंछ लंबी होती है। प्रजनन करने वाले नर का गला काला होता है, उदर भाग ज्यादातर पीले रंग की होती है। यह अपनी पूंछ को लगातार ऊपर निचे हिलाता जिस से इसका नाम अंग्रेजी में वैगटेल पड़ा है जबकि जलीय स्रोतों पर भोजन के लिए निर्भर इस पक्षी को धोबन चिड़िया के नाम भी लोग जानते हैं।
आवास और प्रजनन: यह नदियों, तालाब, झील, नाला, जंगलों में किसी पानी के स्त्रोत आदि के नजदीक भोजन ढूंढते देखे जा सकते हैं। यह बहते झरने और नदियों के आसपास प्रजनन करते हैं। इनका प्रजनन अप्रैल से जुलाई माह तक चलता है। इनके भोजन में तरह तरह के किट पतंगे शामिल हैं।
महाकाव्यों में है वर्णन: यह भारत के प्रसिद्र पक्षियों में से एक पक्षी है। इस पक्षी का जिक्र कवियों ने नेत्रों की उपमा इसी पक्षी (खंजन) से दिया है क्योंकि इस पक्षी के नेत्र हमेशा चंचल रहते हैं। इस खूबसूरत पक्षी को तुलसीदास से लेकर मैथलीशरण गुप्त ने भी अपनी रचनाओं में स्थान दिया है। तुलसीदास ने रामचरितमानस कहा है - जानि शरद ऋतु खंजन आए, पाई समय जिमि सुकृत सुहाए।" जबकि इसके जिक्र मैथिलीशरण गुप्त ने भी अपने महाकाव्य "साकेत" लिखा है कि ‘निरख सखी, ये खंजन आये, फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये! स्वागत स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाये।’ यथार्थ खंजन अपनी खूबसूरत आंखों के कारण जाने जाते हैं।
अरण्यकांड में सीता हरण के पश्चात् राम जब आश्रम लौटकर आते हैं और सीता को वहां नहीं पाते हैं तो सीता के विरह में पागल के समान पेड़-पौधों तक से सीता का पता पूछने लगते हैं और कहते हैं “खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।” खंजन पक्षी, शुक कपोत, कमल, आदि सभी सीता के चले जाने से बड़े प्रसन्न हैं क्योंकि सीता उनसे भी अधिक सुंदर हैं और सीता के सामने उनकी सुंदरता तुच्छ है। शरद ऋतु में यह पक्षी अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों से नीचे वे तरफ आती है।
पक्षियां प्रतिकूल परिस्थितियों प्रवास करती हैं और लंबी दूरी तय करने हेतु एक आकाशीय मार्ग का इस्तेमाल करती है जिन्हें हम पक्षियों के लिए फ्लाईवे के नाम से जानते हैं। पूरे पृथ्वी को 9 आकाशीय मार्गों में बांटा गया है। भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले रूस, यूरोप, साइबेरिया, कज़ाकिस्तान, मंगोलिया और चीन से आने वाली पक्षियाँ मध्य एशियाई प्रवास मार्ग (सेंट्रल एशियाई फ्लाईवे) का इस्तेमाल करती हैं। इस मार्ग का फैलाव 30 बिभिन्न देशों तक है।
यह फ्लाईवे आर्कटिक और हिंद महासागरों के बीच यूरेशिया के एक बड़े महाद्वीपीय क्षेत्र को कवर करता है। इस मार्ग का उपयोग 182 प्रजाति के पक्षी प्रवास के लिए करते हैं। बार हेडेड गूस (राजहंस) हिमालय की ऊंची चोटी 29,000 फ़ीट की ऊंचाई तक उड़ानभर के हमारे भारत इस मार्ग से आते हैं । वहीं East Asian - Australasian Flyway में 22 देश शामिल है । इस प्रवास मार्ग का इस्तेमाल करीब 210 प्रजाति के पक्षी करते हैं।
सामान्यतः ठंड में लंबी दूरी तय करके हमारे वतन आने वाली जलीय पक्षियाँ यहाँ घोसलें नही बनाते हैं बजाय भोजन करती हैं और मौसम गर्म होते ही पुनः मार्च-अप्रैल में अपने वतन लौट जाती है और वही अपने घोसलें भी बनाते हैं। पित खंजन की तरह पीला खंजन, सफेद खंजन भी भारत मे प्रवास करते हैं।
एशियाई जलीय पक्षी गणना
भारतीय उपमहाद्वीप एशियाई जलीय पक्षी गणना की शुरुआत 1987 में में की गई थी और तब से यह तेजी से एशिया के प्रमुख क्षेत्र, अफगानिस्तान से लेकर पूर्व में जापान, दक्षिण पूर्व एशिया और आस्ट्रेलिया तक फैल गया है। इस प्रकार, इस गणना में संपूर्ण पूर्वी एशियाई - ऑस्ट्रेलियाई फ्लाईवे और मध्य एशियाई फ्लाईवे का एक बड़ा हिस्सा शामिल है जिन मार्गो का इस्तेमाल करके प्रवासी पक्षी हमारे क्षेत्रो में आते हैं। इस प्रकार पक्षियों के गणना के साथ पर्यावास की स्थिति की वार्षिक आधार पर निगरानी करने और नागरिकों के बीच जलीय और जलीय स्रोतों पर निर्भर पक्षियों और उनके आवास में के प्रति उनके रुचि को प्रोत्साहित करने में यह मदद करता है।
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