ट्रक पर जान जोखिम में डालकर जाने को मजबूर प्रवासी मजदूर।
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चुनावों में हवाई चप्पल वालों को हवाई जहाज में उड़ाने का सपना दिखाने वाले इस देश के प्रधान सेवक उनकी इस बदहाली पर मुंह फेरे हुए हैं। सरकार हर दिन आंकड़े जारी कर रही है कि इतने मजदूरों को उनके घर पंहुचा दिया गया, लेकिन वो ये नहीं बता रही है कि कितने लोगों ने घर जाने के लिए पंजीकरण कराया है। हर रोज ट्रकों पर लद रहे, घर लौटने के लिए शहरों में जमा हो रहे और माथे पर अपनी जमा पूंजी को लादे पैदल चल रहे प्रवासी मजदूर सरकार के ऐसे दावों पर सवालिया निशान लगा रहे हैं।
यूपीए सरकार की जिस योजना को प्रधानमंत्री ने संसद में विफलताओं का स्मारक बताया था, इस संकट के दौर में सबसे अधिक उसी पर भरोसा जताया है। मनरेगा में सरकार ने पैसा बढ़ाया है। इस साल के बजट में मोदी सरकार ने मनरेगा को लेकर 61 हजार करोड़ रुपये दिए थे, अब 40 हजार करोड़ रुपये और बढ़ा दिए हैं। गांव लौट रहे प्रवासी मजदूरों को जरूर इससे थोड़ी-बहुत राहत मिलेगी, लेकिन फिलहाल भूखे-प्यासे सड़कों पर जो मजदूर चल रहे हैं उन्हें फिलहाल सरकार के किसी आंकड़े से कोई मतलब नहीं है।
उन्हें उम्मीद है कि इस देश की सत्ता छालों से भरे उनके पांव पर मरहम लगाएगी, उन्हें उम्मीद है कि इस देश की सरकार उनके सूखते हलक तक दों बूंद पानी पहुंचाएगी। अगर सरकार मजदूरों की इन उम्मीदों पर खरा नहीं उतरी, तो ये लोग किसी ना किसी दिन पलटकर सवाल जरूर पूछेंगे और तब सरकार के आंकड़ों की पोल परत-दर परत खुल जाएगी।
सत्ता जिस तरीके से इनकी अनदेखी कर रही, उसे ये सनद रहे कि जिस महल में और जिस कुर्सी पर वो आंखे बंद किए हुए बैठी है, उसे इन्हीं लोगों के हाथों ने बनाया है। जिस दिन इनके पैरों में पड़े छाले फूटेंगे, उस दिन इसके छींटे सत्ताधीशों के चेहरे पर गहरे घाव दे जाएंगे।
अदम गोंडवी से माफी सहित
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।