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खुला आकाश: गोल्ज्यू देव के दरबार में दया और न्याय, हर अर्जी की होती है सुनवाई

Sun, 18 Jan 2026 05:36 AM IST
लव गौर डॉ. राजेन्द्र सिंह क्वीरा

सार

स्थानीय लोगों के साथ ही दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भी गोल्ज्यू देवता के प्रति अटूट आस्था है। ऐसा विश्वास है कि उनके दरबार में लगाई गई हर अर्जी की सुनवाई होती है। गोल्ज्यू देव दयालु और न्यायप्रिय देवता के रूप में पूजे जाते हैं।
 
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गोल्ज्यू देव दयालु और न्यायप्रिय देवता के रूप में पूजे जाते हैं - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड में अनेक लोक देवताओं की मान्यता है, जिनमें ग्वाल या गोल्ज्यू देवता को न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है। उनके प्रति लोगों की आस्था आज भी उतनी ही प्रगाढ़ है, जितनी सदियों पहले थी। ऐसा विश्वास है कि गोल्ज्यू देवता के दरबार में पहुंचने वाला कोई भी फरियादी निराश नहीं लौटता और वहां लगाई गई हर अर्जी की सुनवाई के बाद न्यायपूर्ण समाधान होता है।
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गोल्ज्यू देवता को कुमाऊं क्षेत्र में ग्वाल्ल, गोल्ज्यू और ग्वाल महाराज जैसे नामों से भी जाना जाता है। उनका बाल्यकालीन मंदिर चंपावत जनपद के गोरलचौड़ में स्थित है। इसके अलावा अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर गैराड़ का गोल्ज्यू देव मंदिर तथा नैनीताल जिले के घोड़ाखाल स्थित गोल्ज्यू देव (गोल्ज्यू) मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध हैं। इन मंदिरों में पूरे साल श्रद्धालुओं और फरियादियों की भीड़ लगी रहती है। लोग अपनी समस्याएं कागज पर लिखकर मंदिर में रख देते हैं और मनोकामना पूरी होने पर घंटियां अर्पित करते हैं। मंदिरों में टंगी हजारों घंटियां लोगों की अटूट श्रद्धा का प्रमाण हैं।

लोक कथाओं के अनुसार, गोल्ज्यू देवता के पिता झालुराय कत्यूरी वंश के राजा थे। उनकी सात रानियां थीं, लेकिन कोई संतान नहीं हुई। बाद में उन्होंने पंचनाम देवों की बहन कालिंका से विवाह किया। जब कालिंका गर्भवती हुईं तो अन्य रानियां ईर्ष्या से भर गईं और उन्होंने षड्यंत्र रचा कि किसी प्रकार इस बालक को जन्म से पहले ही मार दिया जाए। सातों रानियों ने राजा से कहा कि वे सभी मिलकर प्रसव में सहायता करेंगी।
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उन्होंने कालिंका की आंखों पर पट्टी बांध दी और बालक को नीचे बकरियों की गोठ में डाल दिया। जब वहां भी बालक सुरक्षित रहा तो उसे लोहे के संदूक में बंद कर कालीगंगा नदी में बहा दिया। कालीगंगा में मछली पकड़ने गए एक निस्संतान व्यक्ति को वह संदूक मिला। संदूक खोलने पर उसे बालक ग्वाल्ल प्राप्त हुआ, जिसे उसने अपने पुत्र की तरह पाला। समय के साथ ग्वाल्ल ने अपनी माता कालिंका को पहचान दिलाई और सच्चाई सामने आई। आगे चलकर वह उत्तराखंड में गोल्ज्यू देवता, ग्वाल महाराज, बाला गोरिया और गौर भैरव जैसे नामों से प्रसिद्ध हुए।
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