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ऐसी जिंदगी जीने को क्यों मजबूर हैं लड़कियां? भारत में क्यों हैं औरतों की ये स्थिति?

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भारत में महिला सुरक्षा को लेकर आज भी स्थितियां गंभीर हैं। - फोटो : फाइल फोटो
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आचार्य कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में कहा था कि महिलाओं की सुरक्षा ऐसी होनी चाहिए कि महिलाएं खुद को अकेली सूनसान सड़कों पर भी बिल्कुल सुरक्षित समझें। आखिर क्यों घर के अंदर और बाहर महिलाएं खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं? दरअसल, भारत में महिला सुरक्षा को लेकर आज भी स्थितियां गंभीर हैं। मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति के लिए सुरक्षा सबसे अहम मुद्दा होती है जबकि दूसरी बुनियादी बातें बाद में। देश-दुनिया में महिलाओं के सम्मान और अधिकार के नाम पर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने और महिला सशक्तिकरण की सारी बातें महिलाओं की सुरक्षा के आगे जाकर फेल हो जाती हैं।

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भागीदारी बढ़ी लेकिन संतोषजनक नहीं
बहरहाल, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि बीते 5 दशकों में भारतीय महिलाओं की भागीदारी समाज में हर स्तर पर बढ़ी है। लेकिन आज भी समाज में महिलाओं के योगदान, उनकी आर्थिक उपादेयता का न तो सही तरीके से आकलन होता है और ना ही उन्हें वाजिब हक मिलता है। बड़े फलक पर भी देखें तो महिलाओं की बदौलत कई पैमाने पर विकास में सफलता मिली है। कोई भी समाज महिला कामगारों द्वारा राष्ट्रीय आय में किए गए योगदान को दरकिनार नहीं कर सकता। बावजूद इसके उनको पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। हालांकि भारत के श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी दुनिया के मुकाबले काफी कम है।

घरेलू काम में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी से अधिक है। - फोटो : अमर उजाला
आज भी घरेलू कामकाज में महिलाएं ज्यादा सक्रिय
फिर भी घरेलू काम में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी से अधिक है। यह सर्वव्यापी है कि ग्रामीण एवं शहरी दोनों इलाकों में महिलाओं की शिक्षा दर में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि महिलाओं की पूरी आजादी की मांग तो लंबे अरसे से चली आ रही है, लेकिन वह दिवास्वप्न जैसा ही प्रतीत हो रहा है। पर, ज्यों-ज्यों वक्त बदल रहा है, त्यों-त्यों इस मांग का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। पहले महिलाएं याचक की मुद्रा में थीं, लेकिन जिस रफ्तार से उनके व्यक्तित्व का विकास हो रहा है, उससे लग रहा है कि अपनी पूरी आजादी के लिए वो ‘याचना नहीं अब रण होगा' की तर्ज पर काम करेंगी।

उल्लेखनीय है कि ग्रामीण इलाकों में 15 से 19 आयु वर्ग की लड़कियों में शिक्षा के प्रसार के साथ श्रम क्षेत्र में उनकी भागीदारी घटी है। यह अच्छी बात है, लेकिन, 20 से 24 वर्ष की आयु सीमा की लड़कियों के आंकड़े बताते हैं कि उनके द्वारा प्राप्त शिक्षा का लाभ उन्हें रोजगार में बहुत नहीं मिला है। दरअसल, महिलाओं की क्षमता को लेकर समाज में व्याप्त धारणा का भी अहम योगदान होता है। देश की पितृसत्तात्मक व्यवस्था में आधुनिकता के बावजूद कई स्तरों पर महिलाओं को उनका वाजिब हक नहीं मिल पाता।

क्या महिला-पुरुष बराबरी सिर्फ किताबी बातें ही रह जाएंगी? - फोटो : Pixabay.com
महिलाओं को लेकर बदलना होगी सोच
जब तक इस भेदभाव को दूर नहीं किया जाता, तब तक महिला-पुरुष बराबरी सिर्फ किताबी बातें ही रह जाएंगी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 21वीं सदी के सत्रहवें वर्ष में भी महिलाओं के प्रति दूषित दृष्टिकोण रखा रहा है।  फर्क नज़रिए का है, रेखा के इस ओर या उस ओर। महिला की तारीफ एक जगह है और उसकी काबिलियत को कम आंकना या सुंदरता के नाम पर दरकिनार कर देना दूसरी। आखिर ये भी साफ़ है कि सफल कामकाजी पुरुषों के रूप-रंग पर ऐसी टिप्पणियां नहीं की जातीं। शायद ही किसी लेख में उनके पहनावे को उनके करियर से जोड़ा जाता हो। कहने का अर्थ यह है कि समाज की सोच को बदलने की ज़रूरत है।

बताते हैं कि जेनेवा स्थित वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के वार्षिक जेंडर गैप इंडेक्स के अनुसार भारत 142 देशों की सूची में 13 स्थान गिरकर 114 वें नंबर पर पहुंच गया। भारत में महिला सशक्तिकरण और आरक्षण को लेकर भले ही लंबे-चौड़े दावे किए जाते रहे हों, यहां महिला उद्यमियों की राह आसान नहीं है। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की तरह उनको उद्योग जगत में भी भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

भेदभाव के अलावा महिलाओं की काबिलियत पर सवाल उठाए जाते हैं। यही वजह है कि महिला उद्यमिता सूचकांक की ताजा सूची में शामिल 77 देशों में से भारत 70वें स्थान पर है। पश्चिम बंगाल समेत देश के कई राज्यों में तो हालात और बदतर हैं। महिला मुख्यमंत्री के सत्ता में होने के बावजूद इस मामले में बंगाल की हालत बाकी राज्यों से खराब है। बताते हैं कि उद्योग के क्षेत्र में महिलाओं के पिछड़ने की प्रमुख वजहों में मजदूरों की उपलब्धता और कारोबार के लिए पूंजी जुटाने में होने वाली दिक्कतें शामिल हैं।



 
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पढ़ी-लिखी महिलाओं की स्थिति भी गंभीर
वॉशिंगटन स्थित ग्लोबल इंटरप्रेन्योरशिप एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (जीईडीआई) की ओर से वर्ष 2015 में जारी ऐसे सूचकांक में 30 देश शामिल थे और उनमें भारत 26वें स्थान पर था। इससे साफ है कि देश में महिला उद्यमियों के स्थिति सुधरने की बजाय और बदतर हो रही है। हालांकि संस्था का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले भारत की रैंकिंग दरअसल कुछ सुधरी है।

यह सही है कि भारत में अब उच्च तकनीकी शिक्षा और प्रबंधन की डिग्री के साथ हर साल पहले के मुकाबले ज्यादा महिलाएं कारोबार के क्षेत्र में कदम रख रही हैं। लेकिन यह भी सही है कि समानता के तमाम दावों के बावजूद उनको इस क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। महिला उद्यमियों की राह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए पहले समाज का नजरिया बदलना जरूरी है।

(लेखिका उत्तर प्रदेश सरकार में राजपत्रित अधिकारी हैं।)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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