पौड़ी के प्रेक्षागृह में नर्रुभाई और गिर्दा की वह जुगलबंदी भी इतिहास बन गई। जुगलबंदी का यह विचार राजूभाई का था। शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदियां तो सुनी थी, लेकिन लोकगायकों की जुगलबंदी? यह अभिनव प्रयोग इतना सफल रहा कि इसकी गूंज सात समुंदर पार भी पहुंची। लेकिन यह सिर्फ गीत और गायिकी का आनंद भर नहीं था, बल्कि एक ऐसा प्रयोग था जिसने गढ़वाल और कुमाऊं से जुड़ी पहाड़ की सांस्कृतिक एकता के बचे-खुचे सूराख भी पाट दिए।
यूं तो गिर्दा अधिकांश लोगों की नजर में जनाधिकारों के लिए संघर्षरत एक लोककवि थे लेकिन एक रचनाकार के रूप में उन्हें सिर्फ इसी खांचे में रखकर देखना उनके साथ अन्याय होगा। वह एक बेहतरीन गायक और रंगकर्मी भी थे। अपने समग्र रूप में वह उत्तराखंड की एक खरी और तपी हुई बौद्धिक संपदा थे। हिमालय के शिखरों, गिरिवरों, नदियों, घाटियों, नौले-पंधेरों और लोकजीवन की झांकियों से कभी प्रेरणा और कभी पीड़ा लेकर गिर्दा ने ऐसा बहुत कुछ रचा जो उन्हें एक ऊंचे पायदान पर खड़ा कर देता है।
गिर्दा को जब हम पहाड़ में जन अभियानों के एक सक्रिय कार्यकर्ता की भूमिका में देखते हैं तो उनका यही रूप उन्हें अग्रिम पंक्ति की ललकार बना देता है। तब उनके हाथ में जो हुड़का होता है, वह महज एक बाजा नहीं होता, बल्कि मशाल बन जाता है। हुड़के की थाप पर प्रकट होते इस इंकलाब ने न जाने कितने अभियानों में जनचेतना की कौंध पैदा की और पहाड़ के चप्पे-चप्पे को झकझोरा।
अफसोस कि गिर्दा ने जाने में जल्दी कर दी। ऐसे समय जब उत्तराखंड राज्य के सियासी सरमाएदार पहाड़ की थाती कूटकर पूंजी उगाहने पर आमादा हों, गिर्दा का न रहना बड़ा झटका है। पहाड़ ने आर्थिक आंदोलनों की बजाय देशहित से जुड़े सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आंदोलन छेड़े और फटेहाल होकर भी पहाड़ की छाती पर चलने वाले कुदालों और धनाक्रमणों की जमकर मुखालफत की। यह सब किसके बूते? गिर्दा जैसों के ही तो, जिन्होंने अलख जगाई थी- ‘आज हिमालै तुमुकै धत्यूं छौ, जागो-जागो ओ मेरा लाल...।’
गिर्दा की स्मृति को सलाम!
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