वर्ष 1996 तक दुनियाभर में जीएम फसलों का कुल रकबा जहां 17 लाख हेक्टेयर था वहीं 2019 आते आते यह बढ़कर 1 करोड़ 94 लाख हेक्टेयर तक हो गया।
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जीएम फसलों का अर्थशास्त्र समझिए
वर्ष 1996 तक दुनियाभर में जीएम फसलों का कुल रकबा जहां 17 लाख हेक्टेयर था वहीं 2019 आते आते यह बढ़कर 1 करोड़ 94 लाख हेक्टेयर तक हो गया। भारतीय किसानों ने भी बीटी कॉटन के प्रयोग से बंपर उत्पादन प्राप्त करने और देश को शुद्ध आयातक से शुद्ध निर्यातक में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की है।
कॉटन उत्पादकों ने बीटी बीज की मदद से उत्पादन में 22 प्रतिशत की वृद्धि और मुनाफे में 68 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की जबकि इसी दौरान रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग में 37 प्रतिशत की कमी हुई।
बीटी कॉटन की सफलता से उत्साहित भारतीय कृषि विज्ञानियों ने वर्ष 2009 में ही बीटी बैंगन भी तैयार कर लिया। कुछ समय के भीतर ही भारतीय वैज्ञानिकों के द्वारा बीटी सरसों की नस्ल भी तैयार कर ली गई। यह बात और है कि भारत में किसान तो बीटी बैंगन उपाजने की अनुमति की राह तकते रहे जबकि पड़ोसी बांग्लादेश ने वर्ष 2014 में ही बीटी बैंगन का वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया।
2018 में जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेज़ल कमेटी (जीईएसी) की बैठक में बांग्लादेश में करीब 50 हज़ार किसानों द्वारा बीटी बैंगन उगाने की जानकारी दी गई थी। इसमें से 27 हज़ार से ज्यादा किसान ऐसे थे जिन्होंने पिछली फसल से अपने बीज बचाने के बावजूद नए बीटी बीजों का इस्तेमाल किया था।
कीटनाशकों का उपयोग हो सकेगा कम
इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) और बांग्लादेश एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट (बारी) ने बांग्लादेश में बीटी बैंगन की खेती करने और न करने वाले किसानों में 2018 में एक परीक्षण किया और पाया कि बीटी बैंगन की खेती करने वाले किसानों की प्रति किलोग्राम लागत में 31 फीसदी की कमी और प्रति हेक्टेयर कमाई में 27.3 फीसदी की वृद्धि हुई।
जबकि कीटनाशकों के प्रयोग में 39 फीसदी की कमी आई और बीटी बैंगन में एफएबीस कीड़े का प्रकोप केवल 1.8 फीसदी था। गत वर्ष फिलीपींस में भी बीटी बैंगन को मंजूरी दे दी गई। यही सूरते हाल भारतीय कृषि विज्ञानियों द्वारा विकसित सरसों की जीएम किस्म का भी है।
जीएम फसलों के उत्पादन से वर्ष 1996 से 2018 के बीच वैश्विक स्तर पर कृषि से होने वाली आय में 225 बिलियन डॉलर की वृद्धि हुई। जीएम फसलों का बड़े स्तर पर उत्पादन करने के कारण इस अतिरिक्त आय का सबसे बड़ा भाग (46%) अमेरिका के हिस्से में आया।
अर्जेंटिना, ब्राजील और चीन को भी क्रमशः 12.5%, 11.8%, और 10.3% का अतिरिक्त मुनाफा हुआ। भारत को भी बीटी कॉटन के उत्पादन के कारण 10.8% का अतिरिक्त मुनाफा हुआ। परंपरागत कॉटन के उत्पादन के दौरान भारी मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग किसानों के लिए मजबूरी थी।
एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2001 तक देश में प्रयुक्त होने वाले कुल पेस्टिसाइड्स (कीटनाशकों) का 45% और कुल इंसेक्टिसाइड्स (कृमिनाशकों) का 71% भाग कॉटन की खेती में प्रयुक्त होता था।
बीटी प्रजाति के कॉटन के वाणिज्यिक उत्पादन की अनुमति मिलने के बाद इंसेक्टिसाइड्स के प्रयोग में 95% तक की कमी आई और वर्ष 2002-03 में 4470 मीट्रिक टन से घटकर वर्ष 2011-12 में 222 मीट्रिक टन तक रह गया।
कॉटन की बीटी प्रजाती के कारण देश में कॉटन के उत्पादन और इससे किसानों की आय में महत्वपूर्ण रूप से वृद्धि हुई। वर्ष 2002 से 2008 के बीच के आंकड़े बताते हैं कि उस दौरान उत्पादन में 24% की वृद्धि सीमांत आय में 50% की वृद्धि हुई।
देश में जीएम फसलों के विरोध को पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए कहा था - ‘जीएम फसलों के विरुद्ध अवैज्ञानिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना ठीक नहीं है।
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खाद्यान्न आपूर्ति से ज्यादा राजनीतिक मुद्दा
दरअसल, भारत में जीएम फसलों का मुद्दा खाद्यान्न आपूर्ति से ज्यादा राजनीति का मुद्दा बन चुका है। एक आधारहीन अवधारणा के बल पर यह साबित करने का अनवरत प्रयास चल रहा है कि जीएम खाद्य पदार्थ मानव स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है। इसके अतिरिक्त इसे विदेशी बीज उत्पादकों के मुनाफे से जोड़कर देसी भावनाओं को भड़काने का काम किया जा रहा है।
कुछ सामाजिक संगठनों, कृषि विशेषज्ञों, कीटनाशक उत्पादकों की लॉबी आदि के दबाव में सरकार चाहते हुए भी जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों के वाणिज्यिक उत्पादन की अनुमति नहीं दे पा रही है। जबकि शेतकरी संगठन के नेतृत्व में महाराष्ट्र के किसान पिछले कई वर्षों से जीएम फसलों के वाणिज्यिक उत्पादन की अनुमति की मांग को लेकर सत्याग्रह कर रहे हैं और कानून के खिलाफ जाते हुए जीएम फसलों की बुआई कर रहे हैं।
भारत में जीएम फसलों का विनियमन पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अधीन ‘खतरनाक सूक्ष्मजीवों, अनुवांशिक रूप से अभियांत्रिक जीवों या कोशिकाओं के उत्पादन, उपयोग, आयात, निर्यात और भंडारण के लिए नियम, 1989’ के तहत होता है।
नियमतः जीएम फसलों को अंतिम अनुमति के पूर्व प्रयोगशाला के लिए अनुमति, क्षेत्र परीक्षण के लिए अनुमति, पारिस्थितिक निर्गमन के लिए अनुमति और वाणिज्यिक अनुमति जैसे अनुमतियों के चार चरणों से होकर गुजरना होता है।
यदि जेनिटिकली मॉडिफाइड उत्पाद इन चारों चरणों को सफलतापूर्वक पूरा कर भी ले तो भी यह आवश्यक नहीं कि कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत मूर्त रूप ले ही ले। क्योंकि तब उस एक अनाधिकारिक अनुमति की जरूरत पड़ती है जो वोट बैंक और एक्टिविज़्म की राजनीति के रहमों करम पर निर्भर होती है। इसकी बानगी देखिए।
फील्ड ट्रायल की अनुमति पर राजनीति
देश में जीएम फसलों के विरोध को पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए कहा था-
जीएम फसलों के विरुद्ध अवैज्ञानिक पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना ठीक नहीं है। जैव प्रौद्योगिकी में फसलों की पैदावार बढ़ाने की पर्याप्त संभावना हैं और हमारी सरकार कृषि विकास हेतु इन नई तकनीकों को प्रोत्साहन देने के प्रति वचनबद्ध है।’
इसके बावजूद तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने फरवरी, 2010 में बीटी बैंगन के फील्ड ट्रायल की अनुमति नहीं दी। उनकी उत्तराधिकारी जयंती नटराजन ने भी फील्ड ट्रायल पर रोक जारी रखा। वर्ष 2014 में कांग्रेस के ही पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोइली ने फील्ड ट्रायल की अनुमति जारी की।
उसी वर्ष केंद्र में भाजपा की सरकार आने पर पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने भी 16 जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल की अनुमति दे दी लेकिन व्यापक विरोध के बाद उन्होंने भी फैसले को वापस लेना ही बेहतर समझा। यह तब है जब सरकार ने आधिकारिक रूप से संसद में जीएम फसलों के मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर किसी प्रतिकूल प्रभाव की संभावना से इंकार किया था।
हाल ही में केंद्र सरकार ने जीएम फसलों के फील्ड ट्रायल से संबंधित अंतिम फैसलों को राज्य सरकारों के विवेक पर छोड़ने की घोषणा की।
इसके अलावा एमएस स्वामीनाथन के नेतृत्व में जाने माने कृषि वैज्ञानिकों का दल सरकार से मिलकर जीएम फसलों के समर्थन में 15 बिंदुओं वाले प्रस्ताव को सौंपा है। फिर भी किसानों को सरकार की तरफ से जीएम फसलों के कानूनी उत्पादन की हरी झंडी मिलने का इंतजार खत्म होता प्रतीत नहीं हो रहा है।
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