जॉनसन का मामला ऐसा पहला केस है जिस पर सुनवाई हुई। यह केस विश्वभर में ग्लाइफोसेट के प्रयोग और इससे संबंधित नियामकों को समझने के लिए अच्छा उदाहरण है। बहुत से देशों ने ग्लाइफोसेट और उन हर्बीसाइड को, जिनमें इस रसायन का प्रयोग होता है, प्रतिबंधित करने की कोशिश की है। 2013 में अल सल्वाडोर की संसद ने ग्लाइफोसेट वाले कीटनाशकों पर रोक लगा दी। इसके अगले सालों में बेल्जियम, नीदरलैंड्स, न्यूजीलैंड, पुर्तगाल ने ग्लाइफोसेट को प्रतिबंधित कर दिया।
फ्रांस में भी इस पर प्रतिबंध के बारे में अच्छी खासी बहस चल रही है। खेतिहर मजदूरों में किडनी के रोगों की वृद्धि के मद्देनजर, श्रीलंका की सरकार ने ग्लाइफोसेट रसायन वाले कीटनाशकों पर आंशिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन बाद में इसे हटा लिया गया। भारत में कीटनाशक संबंधी कमजोर नियामक तंत्र और इसके खतरे को पहचानने में सरकार की आनाकानी के चलते, इस रसायन पर गहरी छानबीन नहीं हो सकी है।
अब अनुवांशिक परिवर्तित फसलों के साथ इस खतरनाक कीटनाशक का क्या संबंध है इसे भी समझना जरूरी है। ग्लाइफोसेट को गैरकानूनी हर्बीसाइड टॉलरेंट (एचटी) कपास की फसल में प्रयोग किया जाता है।
बता दें कि एचटी कपास आनुवांशिक संशोधित कपास है जिस पर हर्बीसाइड का असर नहीं होता। (जब ग्लाइफोसेट को एचटी कपास और उसके आसपास उगे हुए खरपतवार पर छिड़का जाता है तब यह सिर्फ खरपतवार को ही नष्ट करता है।)।
आईएआरसी की 2015 के अध्ययन के अनुसार रसायन का असर न होने वाले आनुवांशिक संशोधित फसलों के अस्तित्व में आने के बाद से दुनिया भर में ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल बढ़ा है। भारत में भी इसका प्रयोग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। खबरों के अनुसार भारत में भी हर्बीसाइड टॉलरेंट फसलों की गैरकानूनी खेती बढ़ने से ग्लाइफोसेट के प्रयोग में बढ़ोतरी आई है।
भारत में सरकार नहीं हैं सर्तक, मानवता की दुश्मन बनीं कंपनियां
भारत में लागू कीटनाशक नियामकों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं है। उदाहरण के लिए 2001 में केरल सरकार ने दुनिया भर में व्यापक स्तर पर प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक इंडोसल्फान को प्रतिबंधित कर दिया था।
फिर 2002 में यह प्रतिबंध हटा लिया गया (हवाई छिड़काव पर प्रतिबंध जारी रहा)। जबकि, इस बात के सबूत हैं कि इस रसायन के असर से विलंबित पौरुष, शारीरिक विकृति और मानसिक रोग होते हैं)। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में देशभर में इंडोसल्फान के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया।
कुल मिलाकर देखें तो दुनिया के खाद्य बाजार पर दुनिया के बीज की कंपनी की नजर है। वह चाहती है कि अनाज पर नियंत्रण किया जाए। इसके लिए बीज बनाने वाली कंपनी नित् नये हथकंडे अपना रही है। यही नहीं किसानों को सब्जबाग दिखाकर वह किसानों को लूटने में भी लगी है। यह क्रम चल रहा है।
अब इन्हीं कंपनियों ने उत्पादन और गुणवत्ता के नाम पर अनुवांशिक संशोधित फसलों के उत्पादन का खेल प्रारंभ किया है। इसके उत्पादन के लिए जिस कीटनाशक दवाओं का प्रयोग हो रहा है वह मानव जाति के विनाश की आहट है। इसे समझने की जरूरत है। इसके लिए दुनिया के मानवतावादियों को इकट्ठा होना चाहिए।
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