सवाल केवल बेरोजगारी, परीक्षा या अवसर का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक अहंकार का भी है, जो मानकर चलता है कि युवा सिर्फ भाषण सुनेंगे और तालियां बजाएंगे।
बाबा रामदेव बोले तो संदेश साफ था
बाबा रामदेव का Gen-Z के पक्ष में बोलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने युवाओं के सवालों को खारिज करने के बजाय व्यवस्था से जवाब मांगने की जरूरत पर जोर दिया। यह उस बदलते माहौल का संकेत है, जिसमें युवाओं की नाराजगी को अब सिर्फ सोशल मीडिया का शोर समझना राजनीतिक भूल होगी। और फिर आया दूसरा संकेत- मायावती का बंद मुंह भी खुला।
मायावती ने क्यों तोड़ी चुप्पी?
मायावती की राजनीति लंबे समय से अपने पारंपरिक सामाजिक आधार और चुनावी समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन Gen-Z के सवालों पर उनका बोलना बताता है कि नई पीढ़ी की राजनीतिक अहमियत को अब कोई दल नजरअंदाज नहीं कर सकता। मायावती ने बेरोजगारी, आरक्षण और युवाओं के भविष्य जैसे सवालों को उठाया। संदेश साफ है-जिस युवा को राजनीति ने लंबे समय तक केवल वोट की मशीन समझा, वह अब खुद सवालों का एजेंडा तय करने लगा है।
बंद कमरों की राजनीति बनाम खुली डिजिटल पीढ़ी
पुरानी राजनीति में नेता बोलते थे और जनता सुनती थी। Gen-Z ने यह समीकरण उलट दिया है। अब जनता पूछती है और नेता को जवाब देना पड़ता है। यही फर्क नई राजनीति की असली चुनौती है। Gen-Z किसी एक नेता की जेब में नहीं है। वह किसी दल की स्थायी संपत्ति नहीं है। वह सवाल पूछती है, नेताओं को ट्रोल करती है, समर्थन देती है तो विरोध भी उतनी ही तेजी से करती है।इसलिए उसे खारिज करना आसान नहीं।
बाबा रामदेव से मायावती तक-खतरे की घंटी किसके लिए?
बाबा रामदेव का बोलना और मायावती का चुप्पी तोड़ना महज दो अलग-अलग बयान नहीं हैं। यह राजनीतिक वर्ग के लिए एक चेतावनी है। Gen-Z को गाली देकर आप उसे चुप नहीं करा सकते। उसे नजरअंदाज करके आप उसका समर्थन नहीं पा सकते। और उसे उपदेश देकर उसके सवाल खत्म नहीं कर सकते। जिस पीढ़ी के हाथ में मोबाइल है, उसके पास सूचना भी है और सवाल भी। वह मंच पर खड़े नेता से ज्यादा तेजी से तथ्य जांच सकती है और एक बयान को कुछ ही मिनटों में देशव्यापी बहस बना सकती है।
अब सवाल Gen-Z का नहीं, राजनीति का है
असल सवाल यह नहीं कि Gen-Z राजनीति को समझती है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या राजनीति Gen-Z को समझने के लिए तैयार है? बाबा रामदेव बोले। मायावती भी बोलीं। क्योंकि Gen-Z ने आखिरकार वह कर दिखाया, जो कई वर्षों से राजनीति के बंद कमरों में नहीं हो पाया था-उसने नेताओं को बोलने के लिए मजबूर कर दिया। मायावती का भी बंद मुंह खुलना शायद सिर्फ एक बयान नहीं, बदलते राजनीतिक मौसम का संकेत है।
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