केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और अन्य मांगों को स्वीकार किए जाने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का जंतर-मंतर पर चल रहा अनशन समाप्त हो गया। यह आंदोलनकारियों की सफलता तो है ही, साथ ही इसे सरकार की भी एक उपलब्धि माना जा सकता है कि उसने इस आंदोलन को बिना किसी जनहानि के समाप्त करा दिया और 2020-21 के दिल्ली किसान आंदोलन तथा 2024 के पंजाब-हरियाणा किसान आंदोलनों की तुलना में व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों को भी अपेक्षाकृत बहुत कम क्षति पहुंची।
इसलिए सरकार को वर्तमान कानूनों में आवश्यक संशोधन कर सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर आंदोलनों के दौरान, किसी व्यक्ति की माता, बहन, बेटी, पिता, पुत्र अथवा अन्य परिजनों के जननांगों का उल्लेख कर अपमानित करने के उद्देश्य से दी जाने वाली लक्षित अश्लील गालियों के लिए एक से तीन वर्ष तक की सजा का स्पष्ट प्रावधान करने पर विचार करना चाहिए। अभिव्यक्ति और असहमति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन उसकी आड़ में किसी की व्यक्तिगत और पारिवारिक गरिमा को तार-तार करने की स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती।
शास्त्रार्थ-आधारित जनसंपर्क रणनीति
अपने पक्ष की स्थापना के लिए सुदृढ़ संदेशों का प्रयोग और प्रतिपक्ष के विचारों का खंडन करना शास्त्रार्थ का प्रमुख उद्देश्य रहा है। किंतु सोशल मीडिया के इस युग में यह शास्त्रार्थ आमने-सामने बैठकर नहीं, बल्कि युवाओं के वैचारिक संसार में हो रहा है।
यह संभव है कि युवा दोषपूर्ण संदेशों से प्रभावित होकर उसी के अनुरूप व्यवहार और कार्य करने लगें। ऐसे में उनके वैचारिक संसार में प्रवेश कर दोषपूर्ण संदेशों का तर्कपूर्ण खंडन करना और उनके स्थान पर अधिक तथ्यपरक एवं प्रभावी संदेशों की स्थापना करना भी एक सुदृढ़ संचार-रणनीति के माध्यम से ही संभव है।
वस्तुतः सत्ता अब केवल पांच वर्ष में एक बार चुनाव के समय जनता को अपने विचारों से प्रभावित कर जनादेश प्राप्त करने और उसके आधार पर अगले पांच वर्ष तक सरकार चलाने का विषय नहीं रह गई है। सोशल मीडिया और युवा-आधारित आंदोलनों के इस दौर में सत्ता को बनाए रखना पूरे पांच वर्ष चलने वाले सतत वैचारिक संघर्ष और जनसंवाद का स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। इसके लिए सरकार को जनता के बीच जाकर सीधा संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है।
इस रणनीति में सोशल मीडिया के साथ-साथ जमीनी स्तर पर रैलियों, नुक्कड़ नाटकों और अन्य जनसंचार माध्यमों का भी समुचित उपयोग किया जा सकता है। इससे युवाओं को तथ्यों के आधार पर अपना मत बनाने का अवसर मिलेगा।
यदि सरकार शास्त्रार्थ की मूल भावना- तर्क, तथ्य, संवाद और प्रतिपक्ष के विचारों के विवेकपूर्ण खंडन के साथ इस रणनीति पर आगे बढ़ती है, तो सोशल मीडिया आधारित इस आंदोलन का शांतिपूर्ण और संवादपरक समाधान संभव हो सकता है।
-------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।