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जन्म शताब्दी विशेष: आपदाओं का संकट, याद आने लगा गौरा देवी का चिपको आंदोलन

सार

चण्डी प्रसाद भट्ट और गोविन्द सिंह रावत आदि की प्रेरणा से गौरा देवी ने 1974 में जो चिपको आंदोलन शुरू किया था उसका विश्वव्यापी संदेश आज फिर प्रासंगिक उठा है।
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चिपको अंदोलन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पश्चिमी हिमालय दिन प्रतिदिन अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। बादल फटने की घटनाएँ, बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियरों का टूटना इस क्षेत्र की नियति बन गयी है। हर साल सेकड़ों लोग मारे जा रहे हैं और अरबों-खरबों की सम्पत्तियां नष्ट हो रही है। जो संसाधन विकास कार्यों पर लगने थे उन्हें आपदा के घावों को भरने पर लगाया जा रहा है।

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इन आपदाओं के पीछे वनों की अंधाधुंध कटाई और अनियोजित विकास को प्रमुख कारण माना जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में गौरा देवी और उनका विश्व विख्यात चिपको आंदोलन याद आ रहा है।

चण्डी प्रसाद भट्ट और गोविन्द सिंह रावत आदि की प्रेरणा से गौरा देवी ने 1974 में जो चिपको आंदोलन शुरू किया था उसका विश्वव्यापी संदेश आज फिर प्रासंगिक उठा है। पश्चिमी हिमालय पर भयंकर मानसूनी उत्पात के तुरन्त बाद शुरू हो रहा गौरा देवी का जन्म शती वर्ष 2025 हमारे योजनाकरों और नीति नियंताओं के लिये आत्म चिन्तन का वर्ष है।
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ऋषि गंगा और धौलीगंगा में फरबरी 2021 की बाढ़ भी एक चेतावनी ही थी। यह विनाशकारी बाढ़ उसी रेणी क्षेत्र में आयी थी जहां से दुनियांभर में गूंजने वाले चिपको आंदोलन का बिगुल बजा था।

गौरा देवी का जन्म 25 अक्टूबर 1925 को उत्तराखंड के चमोली जिले के सीमान्त लाता गाँव में हुआ था। वह एक साधारण भोटिया जनजाति महिला थीं। बारह वर्ष की आयु में विवाह के बाद वह सुसराल के रेणी गांव चली गईं और बाद में गाँव की महिला मंगल दल की अध्यक्ष बनीं।

26 मार्च 1974 को ठेकदार साइमन कंपनी ने रेणी गांव के जंगलों को काटने का प्रयास किया तब गौरा देवी ने 27 अन्य जनजातीय महिलाओं के साथ मिलकर पेड़ों पर चिपक कर कंपनी के मजदूरों को पेड़ों पर कुल्हाड़िया चलाने से रोक दिया। इन महिलाओं में 6 बच्चियां भी थीं।

एक सुनियोजित रणनीति के तहत उस दिन गांव के पुरुष जिला मुख्यालय बुलाये गये थे, इसलिए गांव में केवल महिलाएं ही थीं। इस दूरदराज के दुर्गम क्षेत्र में इन महिलाओं पर हमले हो सकते थे और उन्हें धमकियां भी मिली थीं, मगर वीर नारियां कुल्हाड़ियों से नहीं डरीं और अन्ततः कंपनी के मजदूरों को भागना ही पड़ा।

लगभग 6500 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस गांव के जंगल से 2451 देवदार के पेड़ काटे जाने थे। इन महिलाओं को चण्डी प्रसाद भट्ट और तत्कालीन ब्लाक प्रमुख गोविन्द सिंह रावत आदि की प्रेरणा मिली थीं जो कि पूरे जोशीमठ क्षेत्र में भ्रमण कर और पर्चे बांट कर लोगों को जंगलों को बचाने के लिये प्रेरित कर रहे थे।

दशोली ग्राम स्वराज संघ, मल्ला नगापुर सहकारी संघ आदि 1972 से ही केदार घाटी और चमोली की मंडल घाटी आदि में पेड़ों को बचाने का आंदोलन चला रहे थे। लेकिन इस रेणी की घटना ने वन आंदोलन में एक चिंगारी का काम किया जो कि चण्डी प्रसाद भट्ट और सुन्दर लाल बहुगुणा आदि के प्रयासों से दुनियां के कोने -कोने में फैल गया।

वनों को बचाने के लिये वन संरक्षण अधिनियम 1980 और वन संरक्षण नीति 1988 इसी चिपको आंदोलन का प्रतिफल थीं। कर्नाटक आदि राज्यों में भी इस आंदोलन ने लोगों को वन आंदोलनों के लिये प्रेरित किया। यही नहीं वैश्विक स्तर पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में नयी जागृति पैदा हुयी।

दरअसल, 1970 की भयंकर अलकनन्दा की बाढ़ के लिये भी नदी के जलागम क्षेत्र में पेड़ों के बेतहासा कटान को भी जिम्मेदार माना गया। इसलिये भी घने जंगलों वाली घाटियों में पेड़ों के कटान से लोग डरे हुये थे। चिपको का अभिप्राय था कि हिमालय के जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं है, बल्कि वे पानी, मिट्टी, हवा, चरागाह सांस्कृतिक जीवन और आर्थिक सुरक्षा का आधार हैं।

चिपको ने चेतावनी दी थी कि जंगलों की कटाई से पहाड़ अस्थिर होंगे, नदियाँ उग्र होंगी और जीवन असंतुलित हो जाएगा। आज चिपको की यह चेतावनी धराली-थराली और किश्तवाड़ आपदाओं में सत्य साबित हो रही है।

चिपको की चेतावनी इससे पहले 7 फरवरी 2021 को चमोली जिले में ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदियों में अचानक आई बाढ़ आने से साबित हो गयी थी। चिपको आंदोलन के जन्मस्थल में इस बाढ़ ने पूरे क्षेत्र को हिलाकर रख दिया। कड़ाके की ठंड में यह बाढ़ रोंथी पीक से हुए एक हिमस्खलन के कारण आयी थी।

इस हिमस्खलन ने नदियों में पानी, बर्फ और मलबे का सैलाब ला दिया था जिसने पुल, सड़कें, घर और दो जलविद्युत परियोजनाओं को बहा लिया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार इस आपदा में 200 से अधिक लोग मारे गए या लापता हो गए। गौरा देवी का अपना गाँव रेणी इस आपदा का केंद्र था जो सबसे अधिक प्रभावित हुआ।

गांव वालों ने पहले ही जलविद्युत परियोजनाओं के खिलाफ चेतावनी दी थी। पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट ने 13 मेगावाट की ऋषिगंगा और 520 मेगावाट की तपोवन विष्णुगाड परियोजनाओं के खिलाफ अपना विरोध प्रधानमंत्री कार्यालय तक दर्ज किया था, जिसे सुना नहीं गया और फिर ये विनाशलीला हो गयी।

रेणी के लोगों ने भी 2019 में हाइकोर्ट में एक मुकदमा दायर कर परियोजनाओं में हो रही ब्लास्टिंग, मलबे की डम्पिंग और खनन पर रोक लगाने की मांग की थी। क्योंकि इससे पहाड़ अस्थिर हो रहे थे।

दरअसल, यह घटना चिपको आंदोलन की चेतावनी को भूलने की कीमत थी। 2025 के मानसून के दौरान असाधारण वर्षा, बादल फटने और भूस्खलनों ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू.कश्मीर, नेपाल सिक्किम और यहां तक कि पाकिस्तान के कुछ हिस्सों को तबाह कर दिया। इस क्षेत्र में सेकड़ों लोगों की मौत हुई और खरबों की सम्पतित्तयां नष्ट हो गयीं।

पश्चिमी हिमालय में बादल फटने, त्वरित बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। 2019 से 2021 के बीच हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में 902 वर्ग किलोमीटर की कमी दर्ज की गई। वैश्विक भूस्खलनों में से 17 प्रतिशत अकेले हिमालयी क्षेत्र में हो रहे हैं।

इसरो की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड भूस्खलन की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील है। जंगलों की कटाई मिट्टी को ढीला करती है, ढलानों को कमजोर करती है और बारिश के पानी को अवशोषित होने से रोकती है, जिससे नदियों का बहाव उग्र हो जाता है और वह अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को बहा ले जाती है।

आज की हर आपदा गौरा देवी की पुकार को दोहराती है। उनकी जन्म शती केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं है, बल्कि एक नए जागरण का आह्वान है। चिपको की भावना को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जनन करने की आवश्यकता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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