गणगौर शब्द भगवान शिव और पार्वती के नाम से बना है। गण यानि भगवान शिव और गौर यानि पार्वती। इसलिए शिव-पार्वती की पूजा के रूप में इस त्यौहार को मनाया जाता है। कहा जाता है कि चैत्र शुक्ला तृतीया को राजा हिमाचल की पुत्री गौरी का विवाह भगवान शंकर के साथ हुआ था उसी की याद में यह त्योहार मनाया जाता है।
कामदेव मदन की पत्नी रति ने भगवान शंकर की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया तथा उन्हीं के तीसरे नेत्र से भष्म हुए अपने पति को पुन: जीवन देने की प्रार्थना की। रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कामदेव को पुन: जीवित कर दिया तथा विष्णुलोक जाने का वरदान दिया। उसी की स्मृति में प्रतिवर्ष गणगौर का उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान विवाह के समस्त रस्मो रिवाज किए जाते हैं।
होलिका दहन के दूसरे दिन गणगौर पूजने वाली बालिकाएं होलिका दहन की राख लाकर उसके आठ पिण्ड बनाती हैं एवं आठ पिण्ड गोबर के बनाती हैं। गणगौर पूजने वाली लड़कियां उन सभी सोलह पिंडो को दूब पर रखकर प्रतिदिन उनकी पूजा करती हुई दीवार पर एक काजल व एक रोली की टिकी लगाती हैं। शीतलाष्टमी तक इन पिण्डों को पूजा जाता है। फिर मिट्टी से ईसर गणगौर की मूर्तियां बनाकर उनका पूजन करती हैं।
लड़कियां प्रात: ब्रह्ममुहुर्त में गणगौर पूजते हुए गीत गाती हैं। गीत गाने के बाद लड़कियां गणगौर की कहानी सुनती हैं। दोपहर को गणगौर को भोग लगाया जाता है तथा गणगौर को कुएं से लाकर पानी पिलाया जाता है। लड़कियां कुएं से ताजा पानी लेकर गीत गाती हुई आती हैं। लड़कियां गीतों में गणगौर के प्यासी होने पर काफी चिंतित लगती हैं एवं वे गणगौर को शीघ्रतिशीघ्र पानी पिलाना चाहती हैं। पानी पिलाने के बाद गणगौर को गेहूं चने से बनी ’’घूघरी’’ का प्रसाद लगाकर सबको बांटा जाता है और लड़कियां गाती हैं:-
महारा बाबाजी के माण्डी गणगौर, दादसरा जी के माण्ड्यो रंगरो झूमकड़ो,
ल्यायोजी - ल्यायो ननद बाई का बीर, ल्यायो हजारी ढोला झुमकड़ो।
रात को गणगौर की आरती की जाती है तथा लड़कियां नाचती हुई गाती हैं:-
म्हारा माथान मैमद ल्यावो म्हारा हंसा मारू यहीं रहवो जी,
म्हारा काना में कुण्डल ल्यावो म्हारा हंसा मारू यहीं रहवोजी।
गणगौर पूजन के मध्य आने वाले एक रविवार को लड़कियां उपवास करती हैं। प्रतिदिन शाम को क्रमवार हर लड़की के घर गणगौर ले जाई जाती है, जहां गणगौर का ’’बिन्दौरा’’ निकाला जाता है तथा घर के पुरुष लड़कियों को भेंट देते हैं। गणगौर विसर्जन के पहले दिन गणगौर का सिंजारा किया जाता है।
लड़कियां हाथों में मेहंदी रचाती हैं, नए कपड़े पहनती हैं, घर में पकवान बनाएं जाते हैं। सत्रहवें दिन लड़कियां नदी, तालाब, कुए, बावड़ी में ईसर गणगौर को विसर्जित कर विदाई देती है। गणगौर की विदाई का बाद श्रावण की तीज तक कोई लोक पर्व नहीं आते इसलिए कहा गया है। तीज त्यौहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर।
अर्थात्, जो त्यौहार तीज (श्रवणमास) से प्रारंभ होते हैं उन्हें गणगौर ले जाती है। ईसर-गणगौर को शिव पार्वती का रूप मानकर ही बालाएं उनका पूजन करती हैं। गणगौर के बाद बसन्त ऋतु की बिदाई व ग्रीष्म ऋृतु की शुरुआत होती है। घर से दूर रहने वाले युवक गणगौर के पर्व पर अपनी नव विवाहित प्रियतमा से मिलने अवश्य आते हैं।
राजस्थान की राजधानी जयपुर में गणगौर उत्सव दो दिन तक धूमधाम से मनाया जाता है। ईसर और गणगौर की प्रतिमाओं की शोभायात्रा राजमहलों से निकलती है। इनके दर्शन करने देशी-विदेशी सैलानी उमड़ते हैं। सभी उत्साह से भाग लेते हैं।
इस उत्सव पर एकत्रित भीड़ जिस श्रृद्धा एवं भक्ति के साथ धार्मिक अनुशासन में बंधी गणगौर की जय-जयकार करती हुई भारत की सांस्कृतिक परम्परा का निर्वाह करती है जिसे देखकर अन्य धर्मावलम्बी इस संस्कृति के प्रति श्रृद्धा भाव से ओतप्रोत हो जाते हैं। ढूंढाड़ की भांति ही मेवाड़, हाड़ौती, शेखावाटी सहित राजस्थान के विशाल नगरों में ही नहीं बल्कि गांव-गांव में गणगौर पर्व मनाया जाता है एवं ईसर-गणगौर के गीतों से हर घर गुंजायमान रहता है।
राजस्थान को देव भूमि कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। प्राचीन काल से ही यह वीर भूमि सर्व धर्म शरणदायनी रही है। इसी कारण सभी पूजा पद्धतियों एवं सम्प्रदाय यहां वैचारिक दृष्टि से फले फूले हैं। राजस्थानी शासकों ने लोक मान्यताओं का सदा सम्मान किया है। इसी कारण यहां सभी देवी देवताओं के उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।
गणगौर का उत्सव भी ऐसा ही लोकोत्सव है, जिसकी पृष्ठ भूमि पौराणिक है। हमें आज आवश्यकता है इस लोकोत्सव को मनाए जाने की परम्परा को अक्षुण बनाए रखने की। इसका दायित्व है उन सभी सांस्कृतिक परम्परा के प्रेमियों पर जिनका इससे लगाव है और जो लोकोत्सव को सिर्फ पर्यटक व्यवसाय की दृष्टि से न देखकर भारत के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से देखने के हिमायती हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।