गंगा का पानी अब न पीने के लायक है, न नहाने के लायक
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गंगा का पानी अब न पीने के लायक है, न नहाने के लायक और न खेतों की सिंचाई के उपयुक्त ! बहुत कम लोगों को पता है कि मोक्ष की कामना लिए प्रयागराज या बनारस की जिस गंगा में हर साल करोड़ों लोग स्नान करते हैं, वह वस्तुतः गंगा है ही नहीं। गंगोत्री से नरोरा के बीच बने दर्ज़नों डैम, बांधों और नहरों में बंद और विभाजित गंगा बुलंदशहर तक आते-आते दम तोड़ देती है।
बुलंदशहर के बाद आप जिसे गंगा कहते हैं, उसमें गंगोत्री से आनेवाली पवित्र धारा का पानी नाम मात्र का भी शायद नहीं है। उसमें बरसाती और सहायक नदियों का जल, शहरों के हजारों नालों से गिरने वाला गंदा पानी, मल-मूत्र और रासायनिक कचरा भर है। गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने के बावज़ूद देश की कांग्रेस या भाजपा सरकार ने गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए कभी कुछ नहीं किया और तो और गंगा के प्रति अपनी तमाम आस्था के बावजूद हमने भी तो उसे गंदा ही किया है।
हम लज्जित हैं मां गंगे।आज गंगा दशहरा पर किस नैतिक अधिकार से तुम्हे नमन और बाबा भगीरथ को श्रद्धांजलि कहें?
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