देशवासियों को प्यार हो गया था गांधी से, वे स्वयं तो लोगों से मुहब्बत की भीख नहीं मांग रहे थे।
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कभी गूगल करके राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस लंदन की देखिएगा वहां वो सारे बैठे हुए हैं सूट ही नहीं गर्म सूट पहनकर के और उनके बीच में बैठे एक नंगे आदमी ने बाकी सब में हीन भावना भर दी थी, ठंड नहीं लग रही और यह एक मोरल वेपन (नैतिक हथियार) था जिसका उन्होंने इस्तेमाल किया, जैसे कह रहे हों-
अरे मैं भारतीय हूं और अकेला हूं, मेरे पास संख्या नहीं है, मेरे पास बल नहीं है, मेरे पास पैसा भी नहीं है लेकिन देखो मेरे सामने तुम सब लज्जाए बैठे हो।
कौन कह रहा है कि गांधी को तुम देवता या भगवान का दर्जा दे दो, लेकिन इंसान को इंसान की तरह तो देखो न। मरने के बाद उनके चरित्र का नाश कर रहे हो, ये बिलकुल शोभा नहीं देता। सौ उनमें खोट थी, कौन इंकार कर सकता है लेकिन उनसे कोई बेहतर अगर था तो वहां खड़ा हो जाता देशवासी उसके साथ चल देते गांधी, पर कोई खड़ा नहीं हुआ। गांधी को महात्मा इस देश ने बनाया है तो अगर हमें गांधी की प्रसिद्धि इत्यादि की समस्या है तो दोष देशवासियों को देना चाहिए, गांधी को नहीं।
देशवासियों को प्यार हो गया था गांधी से, वे स्वयं तो लोगों से मुहब्बत की भीख नहीं मांग रहे थे। लोगो को अच्छा लगता था 12 हड्डी का आदमी चला आ रहा है और तेजी से चल रहा है और चलता ही जा रहा है, रुकते ही नहीं। एक गांव से दूसरे गांव भाग रहा है, ये कर रहा है, वो कर रहा है। लोगों को बड़ा अच्छा लगा, दोष देना है तो देशवासियों को दो।
उन्होंने थोड़े ही कहा था मुझे महात्मा बोलो। वो भारतवासियों के लिए आमरण अनशन पर बैठे थे चर्चिल के खिलाफ। रविन्द्रनाथ थे जिन्होंने महात्मा की उपाधि दे दी थी उनको। क्या बापू भी उन्होंने खुद को ही बोल दिया था? क्या राष्ट्रपिता उन्होंने स्वयं को घोषित करा था? राष्ट्र पिता उन्हें सुभाष चंद्र बोस ने बोला था। अब आप ऐसे विवाद करते हो जैसे वो चाह रहे हों कि उन्हें महात्मा माना जाए, और हम कह रहे हैं, “नहीं, फरेब हुआ है। यह महात्मा नहीं है, और महात्मा बनकर बैठ गया है। वो कहां कह रहे हैं महात्मा बोलो?" लेकिन आज जो उनके ऊपर कीचड़ उछाला जा रहा है वह बहुत दुखदाई है। ऐसा नहीं होना चाहिए।
बिल्कुल गलत है। और वो कौन है जो गांधी पर कीचड़ उछाल रहे हैं, उनका अपना क्या स्थान है, किस स्तर के लोग हैं वो? गांधी से अगर किसी ने कुछ पूछा तो वे एकदम स्पष्ट सब बता दिया करते थे और उन्हीं बातों को लेकर आज तुम शोर मचाते हो। तुम्हारे जीवन के कितने राज हैं जो तुमने आज तक किसी के सामने प्रकट नहीं किए और जैसे उनको तुम बताते हो कि अरे वो तो दो लड़कियों को लेकर चलते थे, वृद्ध थे ऐसे पर देखो कितना हवसी बुड्ढा था, यह सब किसी भी तरह से शोभा नहीं देता। वो तो अपना जन सामान्य के बीच चल रहे हैं तो उनकी तस्वीरें भी खिंच रही हैं पर क्या तुम अपनी जिंदगी का भी कुछ बताओगे? वो कब प्रकट होगा?
देखो, कोई आवश्यकता नहीं है कि आप गांधी की विचारधारा पर चलें, बिल्कुल नहीं। उनकी बहुत सारी बातें हैं विशेषकर जो उनके आर्थिक क्षेत्र में सिद्धांत थे, वो अगर आज लागू कर दिए जाएं, तो उसके परिणाम बहुत भयानक हो जाएंगे, तो एक निष्पक्ष चिंतन होना चाहिए जो बातें ठीक नहीं है, उनको अस्वीकार कर दो और जो सही है, सराहनीय हैं, उन पर एक बार तो विचार करो, उसका असली मूल्य समझो। मत चलो उनके सिद्धांतों पर, मत मानो उनके आदर्शों को, लेकिन उनको एक बार ठीक से पढ़ लो, जान लो, वैसा कोई आदमी आज भी खड़ा हो जाए तो सबको बहुत अच्छा लगेगा, आसान नहीं होता गांधी बनना।
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