तमिलनाडु के एक महिला संगठन ने छोटी-छोटी बचतों से न केवल हाशिये पर रहने वाली महिलाओं को सशक्त व आत्मनिर्भर बनाया है, बल्कि समाज के कई सामाजिक मुद्दों पर संघर्ष भी किया है। इससे समाज में परिवर्तन की एक नई लहर आई है। इस पहल का नाम है महालिर एसोसिएशन फॉर लिटरेसी अवेयरनेस एंड राइट्स, जिसे संक्षेप में मलार कहा जाता है। मलार की शुरुआत 90 के दशक में हुई। जब देश में साक्षरता अभियान समाप्त होने लगा, तो उससे जुड़े लोगों ने
समाज की बेहतरी के लिए इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। इसी से नवसाक्षर व गरीब महिलाओं को संगठित कर स्वयं सहायता समूह बनाने का विचार सामने आया। इन समूहों के जरिये महिलाओं को एक-दूसरे से सीखने, बचत करने व आर्थिक रूप से मजबूत बनने का अवसर मिला। वर्ष 1994 में पंजीकृत मलार के लक्ष्यों में महिलाओं को सामाजिक नेटवर्क से जोड़ना और नेतृत्व क्षमता विकसित करना भी है। आज इस संगठन से लगभग 1,771 स्वयं सहायता समूह जुड़े हैं, जिनमें करीब 30,000 महिलाएं सदस्य हैं।
संगठन की उपाध्यक्ष जे. जानसिली बाई ने बताया कि मलार ने समय-समय पर कई विकास और जनकल्याण योजनाएं भी शुरू की हैं। इनमें पेंशन कल्याण निधि, मृत्यु सहायता योजना, सदस्य कल्याण योजना व विभिन्न सहकारी उद्यम शामिल हैं।
इन पहलों का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा देना और छोटे-छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देना है। मलार से जुड़े समूहों में महिलाएं हर सप्ताह थोड़ी-थोड़ी बचत जमा करती हैं। यही राशि बाद में जरूरतमंद सदस्यों को ऋण के रूप में दी जाती है। इन ऋणों का उपयोग महिलाएं सब्जी बिक्री, डेयरी, सिलाई-कढ़ाई, मुर्गीपालन और मत्स्य पालन जैसे छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए करती हैं। कई महिलाओं ने इससे अपने परिवार की आय बढ़ाई है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनी हैं।
आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्राम विकास और सामाजिक समरसता पर भी ध्यान देता है। समूह नियमित बैठकों में सामूहिक निर्णय लेता है और जरूरतमंदों की सहायता भी करता है। कुल मिलाकर, मलार ने महिलाओं के जीवन में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। जिन महिलाओं की दुनिया कभी घर तक सीमित थी, वे आज सार्वजनिक मंचों पर आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखती हैं और समाज के विकास में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। यह पहल महिला सशक्तीकरण का भी अच्छा उदाहरण है, जो सराहनीय होने के साथ प्रेरणास्पद भी है।