इसे वर्ष 1949 में खोजा गया था, तब विशेषज्ञों का आकलन था कि ये कला इससे कम से कम 500 साल पुरानी जरूर रही होगी। पूर्वी तुर्किस्तान में तीसरी से छठी शताब्दी तक कालीन बुनने की कला का पता चलता है। यह कला धीरे-धीरे लगभग पूरे मध्य एशिया में अपनाई जाने लगी। भारत में कालीनों को लाने का श्रेय मुगल बादशाह अकबर को जाता है। 16वीं सदी में अकबर (1542-1605) के नवरत्न और आइन-ए-अकबरी के लेखक अबुल फजल ने लिखा है, शहंशाह ने कालीन अलग-अलग रंग के और इतने शानदार बनवाए हैं कि ईरान-तूरान के कारीगर भला इनका क्या मुकाबला करेंगे। आगरा में इन कालीनों को जहां तैयार किया जाता, उन्हें कारखाने कहा जाता था।
इन कारखानों में फारस के पारंगत कलाकार स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षण देते थे। यहीं से फारसी डिजाइन व भारतीय कारीगरी का मेल हुआ। गलीचे व कालीन का फर्क बारीक है। गलीचा फर्श के एक हिस्से को ढकता है और मोटा होता है, वहीं कालीन पूरे फर्श को ढकता है। फारस के नायाब कारीगर अपनी कला का माफिक दाम मिलने की वजह से आगरा में आकर बस गए। यहीं से आगरा में कालीन तैयार करने की समृद्ध परंपरा की शुरुआत हुई। ब्रिटिश काल में आगरा के कालीनों का नाम पूरे यूरोप में लिया जाने लगा। इसे आगरा रग (कालीन) नाम दिया गया। यानी आगरा में तैयार कालीन। अंग्रेजों ने आगरा सेंट्रल जेल में बंदियों को कालीन बनाने का प्रशिक्षण दिया। यहां के कालीन इतने प्रसिद्ध हुए कि उसे क्वीन विक्टोरिया को भेंट किया गया। ये कालीन के कारीगरों का कमाल ही है कि आज भी यह समृद्ध परंपरा जीवित है।