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प्राकृतिक संसाधनोंं के साथ वन और किसान नीति का समावेश जरूरी

सार

  • अभी भी प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन अन्य विकशित देशों की तुलना में कम है
  • आज भी देश के हरित क्रांति कार्यक्रम में कई कमियां परिलक्षित होती हैं।
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भारत एक कृषि प्रधान देश है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay
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विस्तार
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हमारा देश कृषि प्रधान हैI देश में सत्तर के दशक में हरित क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ- जिसका जनक एम.एस स्वामीनाथन को मन जाता है, इसका मुख्य उदेश्य सिंचित व् असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाले संकर तथा जलवायु आधरित बौने बीजों के उपयोग से फसल उत्पादन में वृद्धि करना था I

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इसके आश्चर्यजनक परिणामों को कृषि विशेषज्ञों व् राजनीतिज्ञों ने हरित क्रांति का नाम दिया I समय के साथ परिष्कृत वैज्ञानिक तकनीक व् उपकरणों में नित नए सुधारों के साथ हमारा देश विश्व में चार बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक है लेकिन अमेरिका , चीन और ब्राजील के किसान कहीं ज्यादा खुशहाल हैंI
   
रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग,उन्नत बीज, सिंचाई सुविधा,वन्य पौध सरंक्षण, बहुफसली कार्यक्रम, वैज्ञानिक तकनीक, परिष्कृत यंत्र, कृषि सेवा केंद्र, कृषि उद्योग निगम, मृदा परीक्षण, भूमि सरंक्षण सहित कृषि शिक्षा व् अनुसन्धान से ही उत्पादन व् उत्पादकता में वृद्धि देखने को मिली और आज हमारा देश अन्नाज व् कृषि फसलों को निर्यात करने की स्थिति में पंहुचा-परन्तु आज भी अनेक कृषि उत्पादों का आयात करना पड़ रहा है।
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अभी भी प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन अन्य विकशित देशों की तुलना में कम है। आज भी देश के हरित क्रांति कार्यक्रम में कई कमियां परिलक्षित होती हैं जैसे संस्थागत भू-धारण की व्यवस्था, श्रम विस्थापन व् रोजगार की तलाश में नगरों व् महानगरों की तरफ ग्रामीण बेरोजगारों का पलायन। हमारे देश का किसान हमारी खाद्य आत्मनिर्भरता की रीढ़ है अतः हमें इस रीढ़ को अधिक मजबूत बनाने की आवशयकता है।

बहुत से राज्यों की आर्थिकी वन व जल संसाधनों से सुदृढ़ हो रही है-ये संसाधन प्रकृति के पॉवर हाउस हैं। वर्ष 2006 से वन अधिकार कानून, सभी वन तथा राजस्व कानूनों पर प्रभावी है तथा निवासियों को वन भूमि पर कुछ तरह के कानूनी अधिकार देता है, साथ ही वन प्रबंधन में उनकी सहभागिता भी सुनिश्चित करनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य को उनके अधिकारों के साथ-साथ कुछ नैतिक कर्तव्य भी उलेखित हैं। 

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कई राज्य सरकारें मानसून के दौरान पौधारोपण अभियान के तहत करोड़ों का बजट खर्च करती है....

भारत की 68 % आबादी गावों में बसती है- ,सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वर्तमान में भारत की 68% आबादी गावों में बसती है और इसी आबादी का कुछ प्रतिशत हिस्सा खेतीबाड़ी करके देश की खाद्य व्यवस्था को सुदृढ़ करता है। सरकार द्वारा सस्ता राशन मुहैया करवाने की योजना के साथ ही बहुत से लघु किसान व् असिंचित भूमि के मालिकों ने खेतीबाड़ी करना बंद भी कर दिया है।

पहाड़ी राज्यों में तो वर्तमान परिदृश्य और भी भयानक होता जा रहा है। माध्यम वर्ग के किसान जो अभी तक खेतीबाड़ी से जुड़े हैं वे भी वन्य पशुओं-जैसे सूअर व् बंदरों का फ़सलों पर आतंक से खौफ़जदा हैं I साथ ही साथ इन्सान के अमानवीय कृत्य-आवारा पशुओं से फ़सल सुरक्षित रख पाने में किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। असिंचित कृषि भूमि के किसान की तो कमर ही टूट गई है।
 
कई राज्य सरकारें मानसून के दौरान पौधारोपण अभियान के तहत करोड़ों का बजट खर्च करती है मगर बिना देखरेख के लाखों पौधे सुख जाते हैं। आवश्यकता है सभी राज्य सरकारें-अपनी सरकारी वन भूमि चिन्हित करके इस बजट से उनका बाड़ा लगाकर सरंक्षण करे और औस्ती किसानों को टी.डी. देते समय एक पेड़ देने पर कम से कम दस पेड़ लगवाना सुनिश्चित करे व् उनकी देखभाल भी।

एक वर्ष तक पौधे सुरक्षित रहने पर ही वन भूमि का पेड़ जरूरतमंद किसानों को दिया जाए। पौधरोपण अभियान व् सरंक्षण में टी.डी. धारकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाई जाए। जलवायु के आधार पर पौधों का चयन व् पौधारोपण हो तथा पौधों के आधार पर बाडायुक्त वन क्षेत्र वन्य जीवों को सरंक्षण प्रदान करे, इससे एक तरफ आवारा पशुओं को भी वन्य संपदा में प्राकृतिक रूप से सरंक्षित किया जा सकता है व् दूूसरे अनुकूल सरंक्षित क्षेत्रों में अन्य वन्य प्राणियों को जैसे चिड़ियाघरों में वन्य प्राणी सरंक्षित किए जाते हैं। बंदरों को कई राज्य सरकारें वर्मिन्न घोषित कर चुकी हैं I 

अब समय आ गया है कि किसानों की बिगड़ती दशा में राज्य सरकारें दूरदर्शितापूर्वक सहयोग का मरहम लगाना शुरू कर दे। नीतियों में किसान हितों का समावेश हो व् किसानों को आर्थिक व् नैतिक स्तर पर सुदृढ़ बनाया जाए।

कानूनों का सख्ती से पालन करवाना सुनिश्चित किया जाए अन्यथा हथिनी की हत्या जगह-जगह गौ हत्या सहित वन्य मूक प्राणियों के जीवन के साथ खिलवाड़ होता रहेगा। दूसरी तरफ किसानोंं की संख्या निरंतर घटती रहेगी। भविष्य में स्थिति विकट न बने समय रहते-यह सब नीतियांं कारगर व् प्रभावी बनानी होंगी व् किसानोंं को नीतियों में उचित अधिमान व् सुरक्षा प्रदान करनी होगी।      


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।



                 
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