हमारा देश कृषि प्रधान हैI देश में सत्तर के दशक में हरित क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ- जिसका जनक एम.एस स्वामीनाथन को मन जाता है, इसका मुख्य उदेश्य सिंचित व् असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाले संकर तथा जलवायु आधरित बौने बीजों के उपयोग से फसल उत्पादन में वृद्धि करना था I
इसके आश्चर्यजनक परिणामों को कृषि विशेषज्ञों व् राजनीतिज्ञों ने हरित क्रांति का नाम दिया I समय के साथ परिष्कृत वैज्ञानिक तकनीक व् उपकरणों में नित नए सुधारों के साथ हमारा देश विश्व में चार बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक है लेकिन अमेरिका , चीन और ब्राजील के किसान कहीं ज्यादा खुशहाल हैंI
रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग,उन्नत बीज, सिंचाई सुविधा,वन्य पौध सरंक्षण, बहुफसली कार्यक्रम, वैज्ञानिक तकनीक, परिष्कृत यंत्र, कृषि सेवा केंद्र, कृषि उद्योग निगम, मृदा परीक्षण, भूमि सरंक्षण सहित कृषि शिक्षा व् अनुसन्धान से ही उत्पादन व् उत्पादकता में वृद्धि देखने को मिली और आज हमारा देश अन्नाज व् कृषि फसलों को निर्यात करने की स्थिति में पंहुचा-परन्तु आज भी अनेक कृषि उत्पादों का आयात करना पड़ रहा है।
अभी भी प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन अन्य विकशित देशों की तुलना में कम है। आज भी देश के हरित क्रांति कार्यक्रम में कई कमियां परिलक्षित होती हैं जैसे संस्थागत भू-धारण की व्यवस्था, श्रम विस्थापन व् रोजगार की तलाश में नगरों व् महानगरों की तरफ ग्रामीण बेरोजगारों का पलायन। हमारे देश का किसान हमारी खाद्य आत्मनिर्भरता की रीढ़ है अतः हमें इस रीढ़ को अधिक मजबूत बनाने की आवशयकता है।
बहुत से राज्यों की आर्थिकी वन व जल संसाधनों से सुदृढ़ हो रही है-ये संसाधन प्रकृति के पॉवर हाउस हैं। वर्ष 2006 से वन अधिकार कानून, सभी वन तथा राजस्व कानूनों पर प्रभावी है तथा निवासियों को वन भूमि पर कुछ तरह के कानूनी अधिकार देता है, साथ ही वन प्रबंधन में उनकी सहभागिता भी सुनिश्चित करनी चाहिए, क्योंकि मनुष्य को उनके अधिकारों के साथ-साथ कुछ नैतिक कर्तव्य भी उलेखित हैं।