बादल फटने से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं आम हो गई हैं।
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मौसम विभाग की बादल फटने की परिभाषा
विश्व मौसम संगठन (डब्ल्युएमओ) के अनुसार बादल एक हाइड्रोमेटोर है जिसमें तरल पानी या बर्फ या दोनों के सूक्ष्म कण होते हैं, जो वायुमंडल में तैरते हैं और आमतौर पर जमीन को नहीं छूते हैं। वैज्ञानिक जर्नल ‘‘क्लाइमेट रिसर्च लैब’’ में प्रकाशित राॅक्सी मैथ्यू कोल के शोध के अनुसार एक मामूली आकार के बादल (1 घन किलोमीटर) में 500,000 लीटर से ज्यादा पानी हो सकता है। बादल फटना सामान्य बारिस से अलग होता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग एक सीमित क्षेत्र में 100 मिमी प्रति घंटे से अधिक वर्षा को बादल फटना कहता है।
मौसम विज्ञानियों के अनुसार बादल फटने की घटनाएं अक्सर क्यूम्यलोनिम्बस बादलों से जुड़ी होती हैं जो गरज के साथ बारिश करते हैं और कभी-कभी मानसूनी हवा के झोंकों और अन्य मौसमी घटनाओं के कारण भी होते हैं। क्यूम्यलोनिम्बस बादल पूरे क्षोभमंडल में 12 से 21 किलोमीटर की ऊंचाई तक बढ़ सकते हैं और भारी मात्रा में पानी को रोक कर नीचे गिरा सकते हैं।
भारत में बादल फटने की घटनाएं अक्सर मॉनसून के मौसम में होती हैं, जब दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाएं बहुत अधिक मात्रा में नमी लाती हैं, इसलिए, बादल फटना ज्यादातर हिमालय, पश्चिमी घाट और भारत के पूर्वोत्तर पहाड़ी राज्यों के ऊबड़-खाबड़ इलाकों में होता है। नाजुक खड़ी ढलानों पर भारी बारिश के कारण भूस्खलन, मलबा बहने से अचानक बाढ़ आती है, जिससे बड़े पैमाने पर विनाश होता है।
जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों के कारण हिमालय क्षेत्र में इन घटनाओं की आवृति बढ़ती जा रही है और इससे जुड़ी आपदाएं हर साल हजारों लोगों को प्रभावित करती हैं और जान-माल, आजीविका, बुनियादी ढांचे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं। असामान्य वर्षा से गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र जैसी हिमालयी नदियों में बाढ़ आ जाती है जिससे मैदानी भारत का एक बहुत बड़ा भाग भी प्रभावित होता है।
सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव
बादल फटने की आपदाओं में सावधानी को सबसे बड़ा बचाव का उपाय माना जा सकता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) का मानना है कि बादल फटने की आशंका वाले उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह से डिजाइन की गयी जल निकासी प्रणालियों, रिटेनिंग दीवारों और तटबंधों के निर्माण करने के साथ ही इन संरचनाओं को अतिरिक्त पानी को प्रभावी ढंग से चैनलाइज करने और अचानक बाढ़ को रोकने के लिए डिजाइन किया जाना चाहिए जिससे मानव बस्तियों और सड़कों, पुलों और इमारतों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा हो सके।
बादल फटने के प्रभाव को कम करने के लिए भूमि-उपयोग नियोजन रणनीतियों का कार्यान्वयन भी जरूरी है। विशेषज्ञ बादल फटने की आशंका वाले संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर मानचित्रण करने और इन क्षेत्रों में निर्माण को प्रतिबंधित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं। जोनिंग विनियमों और बिल्डिंग कोड का सख्ती से पालन करने से मानव बस्तियों के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। वनों का संरक्षण बादल फटने के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मौसम वेधशालाओं की कमी
हिमालय के कई क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं की ओर अक्सर मौसम संबंधी वेधशालाओं की अनुपस्थिति के कारण किसी का ध्यान नहीं जाता है। कई बार ये घटनाएं भारी विनाश के बाद ही सामने आ पाती हैं। अधिक नुकसान नजर न आने पर इन्हें केवल नदियों के साथ होने वाला जलप्लावन मान लिया जाता है। इन घटनाओं के दौरान ढलान में दरारें और किनारे का कटाव आम है, जिसके परिणामस्वरूप तलछट जमा हो जाती है और कभी-कभी नदी का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, जिससे वे बड़ी झील में बदल जाती हैं और बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है।
बादल फटने से उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने और भूस्खलन की घटनाएं आम हो गई हैं। सन् 1977 में इस तरह के हादसे में तवाघाट में 25 सैनिकों सहित 44 लोग मारे गये थे। उसके बाद 1996 में बेरीनाग में 18 लोग मारे गए। सन् 1998 के अगस्त में ही मालपा में 60 प्रोतिमा बेदी आदि मानसरोवर यात्रियों सहित 219 और उखीमठ क्षेत्र में 101 लोग मारे गए थे।
धरचुला के खेत गांव में 12 जुलाई 2002 को हुए भूस्खलन में 5 लोग मारे गए थे। हड़की में सन् 2000 में 19, घनसाली और बूढ़ाकेदार में 10 अगस्त सन् 2002 में 28 लोग और 99 पशु, बरहम में 2007 में 18 तथा हेमकुण्ड में 2008 में 11 लोग मारे गये थे।बूढ़ाकेदार मेंकी त्रासदी में ग्रामीणों के 22 घराट बहने से लोग लम्बे समय तक रोटी के लिए तरस गए।
14 सितम्बर 2012 की मध्य रात्रि तहसील-ऊखीमठ के विभिन्न ग्रामों ग्राम किमाणा, जुआतोक, चुन्नी, मंगोली, संसारी, ब्राहमणखोला तोक, प्रेमनगर तोक में एवं16 सितम्बर 2012 को तहसील-जखोली में डूंगर-सेमला, किरोडामल्ला, तिवाडा तिमली में बादल फटने की घटना से 51 व्यक्तियों की मृत्यु हो गई थी एवं शेष 14 व्यक्ति घायल हो गये थे।
इससे पहले 1979 में कोन्था गांव में 50 लोग मारे गये थे। सन् 1868 में बिरही नदी के अवरुद्ध होने के बाद इस झील के टूटने से 73 लोग मारे गए थे उसके बाद इसी तरह गौणाताल का निर्माण हुआ और जब वह टूटा तो फिर अलकनन्दा में बाड़ आ गई। बिरही झील बनने के बाद बादल फटने से त्वरित बाढ़ और भूस्खलन की लगभग 30 घटनाओं में सेकड़ों लोग मारे जा चुके हैं।
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