वन्य जीवन का महाविनाश
देखा जाए तो वन्य जीवन अपने आप में एक संसार होता है। वैसे भी आज के पालतू जीव कभी वन्यजीव ही रहे होंगे। चूंकि वनों में जीवधारियों को पर्याप्त भोजन के साथ सुरक्षित आश्रय भी मिल जाता है, इसलिये वन अनेक प्रकार के जीवधारियों प्राकृतिक आवास होते हैं। तमाम वनस्पतियां और वन्यजीव एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।
वनस्पतियां मिट्टी से भोजन लेती हैं और मांसाहारी जीव शाकाहरी जीवों का भक्षण करते हैं। ये सभी मुख्य परिणाम खाद्य श्रृंखला में पौधों और जानवरों की अन्योन्याश्रयता के कारण होते हैं। यहां तो सवाल एक दो जीवों या पादपों के लुप्त होने का नहीं बल्कि जंगलों के जीवन विहीन होने का है।
वनाग्नि बड़े वृक्षों को छोड़ कर उसके आगे आने वाली हर वनस्पति और हर एक जीव का अस्तित्व राख में बदल कर चलती जाती है। बाघ और हिरन जैसे स्तनधारी वन्यजीव तो जान बचा कर सुरक्षित क्षेत्र की ओर भाग सकते हैं, मगर उन निरीह सरीसृपों और कीट-पतंगों का क्या हाल होगा जो कि दावानल की गति से भाग ही नहीं सकते। जीवों के पास तो भागने का विकल्प है मगर उन नाजुक वनस्पतियों के महाविनाश की कल्पना की जा सकती है जो कि अपने स्थान पर हिल तो सकती हैं मगर भाग नहीं सकती।
वनस्पतियों के जलने से वन्यजीवों समक्ष भोजन का संकट उत्पन्न हो जाता है। हैरानी का विषय तो यह है कि उत्तराखण्ड के वन विभाग के अनुसार इस भयंकर आग में बड़े जीव तो क्या कोई चींटी तक नहीं मरी।
मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा जंगल की आग हमारे वातावरण को भी दूषित करती है। इस आग के धुएं में दर्जनों अलग-अलग तरह के कण होते हैं, जैसे कि कालिख और रसायन। जिनमें कार्बन मोनोऑक्साइड शामिल है, लेकिन वायु गुणवत्ता के विशेषज्ञों के लिए मुख्य चिंताओं में से एक धुएं में पाए जाने वाले सूक्ष्म कण पीएम 2.5 हैं। पीएम 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम की माप के अंतर्गत आते हैं। पीएम 2.5 इंसान के बाल की चौड़ाई के औसतन एक चौथाई भाग के बराबर होते हैं।
जंगलों की आग ने पहाड़ की हवा को दूषित कर दिया है। वनाग्नि की घटनाओं के बाद यहां ब्लैक कार्बन की मात्रा में आश्चर्यजनक ढंग से 12-13 गुना वृद्धि हुई है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार सामान्य दिनों में अलकनंदा घाटी में ब्लैक कार्बन की मात्रा 1,000 से 2,000 नैनोग्राम प्रति घन मीटर रहता है। यह आंकड़ा अब 13,250 पहुंच गया है।
जैव विविधता का भी विनाश
हिमालय हॉट स्पॉट का कुल क्षेत्रफल 7,41,706 वर्ग किमी है तथा इसमें संरक्षित क्षेत्र 1,12,578 वर्ग किमी है। हिमालय का आइयूसीएन की कैटेगरी 1-6 के तहत संरक्षित क्षेत्र 77,739 वर्ग किमी तथा हॉटस्पॉट वनस्पति क्षेत्र 185427 वर्ग किमी है। यहां औसत मानव जनसंख्या घनत्व 123 प्रति वर्ग किमी है। इस संवेदनशील क्षेत्र में 3160 इंडेमिक पादप प्रजातियां हैं और अस्तित्व के खतरे वाले जीव 4 तथा अस्तित्व के खतरे वाले पक्षी 8 हैं।
इस क्षेत्र में अस्तित्व के खतरे वाले स्तनपाई जीवों की 4 प्रजातियां हैं। ये सारी प्रजातियों को वनाग्नि नष्ट कर जाती हैं। उत्तराखण्ड हिमालय में पादपों की विभिन्न वर्गों और कुलों की लगभग 4 हजार प्रजातियां हैं जिनमें से 161 दुर्लभ प्रजातियां हैं। अस्तित्व के खतरे से जूझ रही ऐसी दुर्लभ प्रजातियों के लिये जंगल की आग महाविनाशकारी साबित हो रही है।
वनाग्नि की आंच ग्लेशियरों तक पहुंच रही
वनाग्नि से तापमान बढ़ रहा है। मौसम विभाग के अनुसार 27 अप्रैल को देहरादून, मसूरी, पन्तनगर, रुड़की और मुक्तेश्वर का अधिकतम तापमान सामान्य से 2 से लेकर 4 डिग्री तक अधिक दर्ज किया गया। जबकि 28 अप्रैल को मुक्तेश्वर और मसूरी जैसे ठण्डे स्थानों पर न्यूनतम् तापमान सामान्य से 4 डिग्री अधिक दर्ज हुआ। वनाग्नि की आंच उत्तराखण्ड हिमालय के लगभग 14 ग्लेशियरों तक पहुंच रही है।
गढ़वाल विवि के पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. आर.के. मैखुरी के अनुसार वर्तमान में स्थिति बेहद चिंताजनक है। ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों को नुकसान तो पहुंचाएंगे ही, स्थानीय स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम सामने आएंगे। इससे जैव विविधता नष्ट हो रही है। ग्लेशियर जब पिघलेंगे, तो इस पर जमा ब्लैक कार्बन पानी के साथ बहेगा। इससे पानी प्रदूषित हो जाएगा।
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