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आग की लपटों से महाविनाश: वनाग्नि से झुलस रहा है वाटर टावर हिमालय

सार

वनस्पतियों के जलने से वन्यजीवों समक्ष भोजन का संकट उत्पन्न हो जाता है। हैरानी का विषय तो यह है कि उत्तराखण्ड के वन विभाग के अनुसार इस भयंकर आग में बड़े जीव तो क्या कोई चींटी तक नहीं मरी।
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वन्यक्षेत्र की आग - फोटो : Pixabay
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विस्तार
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विश्व के गिने-चुने सर्वाधिक जैव विविधता सम्पन्न हॉट स्पॉट में से एक हिमालय इन दिनों अग्निकाण्डों से धधक रहा है। जम्मू-कश्मीर से लेकर मणिपुर-नागालैण्ड तक वनाग्नि की घटनाओं के कारण जंगलों के साथ ही जंगल के प्राणी और दुर्लभ तथा नाजुक वनस्पतियां जल भुन रही हैं। जंगल की आग से हिमालय का पारितंत्र प्रभावित हो रहा है।

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धुएं से वातावरण में ब्लैक कार्बन का असर ग्लेशियरों तक पहुंच रहा है। हजारों हैक्टेयर वन क्षेत्र में वन्य जीवन का सफाया हो गया लेकिन वन विभाग वन्यजीवों के मरने की संख्या शून्य दिखा रहा है। हिमालयी राज्यों में वनाग्नि का सर्वाधिक कहर उत्तराखण्ड पर बरस रहा है, जहां तापमान सामान्य से 2 से लेकर 4 डिग्री तक बढ़ गया है। 

कश्मीर से लेकर मणिपुर तक वनाग्नि की लपटों में

भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग उपग्रहों के माध्यम से जुटाई गई वनाग्नि के बड़े काण्डों की सूचना विभिन्न राज्यों के वन विभागों को देता है, ताकि वे समय पर कार्यवाही कर सके।

विभाग के वनाग्नि संबंधी डैशबोर्ड पर 28 अप्रैल को देशभर में कुल 278 घटनाएं दर्ज की गई हैं जिनमें 124 वनाग्नि की बड़ी घटनाएं के हिमालयी राज्यों की हैं। इनमें से भी सर्वाधिक 75 घटनाएं अकेले उत्तराखण्ड की हैं। अन्य हिमालयी राज्यों में हिमाचल प्रदेश में 18, जम्मू-कशमीर 12, मणिपुर 14, नागालैण्ड की 1 और असम की 3 घटनाएं दिखाई गई है।  सबसे भयावह स्थिति मध्य हिमालय स्थित उत्तराखण्ड की है। जहां 27 अप्रैल को वन विभाग ने 196 घटनाएं दर्ज कीं जो कि 316.77 हैक्टेअर वन क्षेत्र के जलने की थीं।

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अब कल्पना की जा सकती है कि बर्फ का सागर और एशिया की जलवायु के नियंत्रक हिमालय की क्या दशा होगी?

लपटों में हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड

उत्तराखण्ड वन विभाग के डैशबोर्ड में दिए गए विवरण के अनुसार राज्य में इस फायर सीजन में अब तक 1558 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज हुईं जिनमें 2581.67 हैक्टेयर वन क्षेत्र जला है। इसमें वन्यजीवों के लिए संरक्षित क्षेत्र भी है। विभाग ने अब तक कुल 18,404 वृक्षों के जलने की बात तो स्वीकार की है जबकि मरने वाले वन्य जीवों की संख्या शून्य दर्शा रखी है जो कि अविश्वसनीय होने के साथ ही वन्यजीवों के जीवन और पर्यावरण के प्रति घोर लापरवाही का उदाहरण है।

यही नहीं लापरवाही का आलम यह कि फायर सीजन शुरू होते ही वन विभाग के मुखिया विनोद कुमार अवकाश पर चले गए और वन मंत्री देहरादून की बजाय मुम्बई से फायर फाइटिंग कराते रहे।

वनाग्नि से पर्यावरण का विनाश

हमारे देश में वनों के क्षरण का एक प्रमुख कारण वनाग्नि या जंगल की आग भी है। आग से बहुमूल्य वन संसाधन और कार्बन नष्ट हो रहा है जिसका प्रभाव वन क्षेत्रों से वस्तुओं और सेवाओं के प्रवाह पर भी पड़ता है। जंगलों में आग लगने की वजह से गर्मी पैदा होती है और जीव-जंतुओं के निवास स्थान बर्बाद हो जाते हैं। मिट्टी की गुणवत्ता खत्म हो जाती है और उनके जैविक मिश्रण में बदलाव आ जाता है।

पौधे पोषण के लिए विघटित मिट्टी सामग्री खाते हैं और पौधे खाने वाले जीव जीवित रहने के लिए सड़ी हुई मिट्टी की सामग्री खाते हैं। जीविका और अस्तित्व के लिए, मांसभक्षी खाद्य श्रृंखला में निचली प्रजातियों का उपभोग करते हैं। जब जीवित जीव मर जाते हैं तो वे सड़ कर मिट्टी का हिस्सा बन जाते हैं, जिसे वनस्पतियों द्वारा पुनः खाया जा सकता है। इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है।

भोजन के अलावा जनन के लिए पौधे और जंतु एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं। जैसे पराग को फूलों के बीच मधुमक्खियों द्वारा ले जाया जाता है। पशु-पक्षी बीजों को बिखेरने का काम भी करते हैं।

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जैव विविधता का विनाश - फोटो : Pixabay
वन्य जीवन का महाविनाश

देखा जाए तो वन्य जीवन अपने आप में एक संसार होता है। वैसे भी आज के पालतू जीव कभी वन्यजीव ही रहे होंगे। चूंकि वनों में जीवधारियों को पर्याप्त भोजन के साथ सुरक्षित आश्रय भी मिल जाता है, इसलिये वन अनेक प्रकार के जीवधारियों प्राकृतिक आवास होते हैं। तमाम वनस्पतियां और वन्यजीव एक दूसरे पर निर्भर होते हैं।

वनस्पतियां मिट्टी से भोजन लेती हैं और मांसाहारी जीव शाकाहरी जीवों का भक्षण करते हैं। ये सभी मुख्य परिणाम खाद्य श्रृंखला में पौधों और जानवरों की अन्योन्याश्रयता के कारण होते हैं। यहां तो सवाल एक दो जीवों या पादपों के लुप्त होने का नहीं बल्कि जंगलों के जीवन विहीन होने का है।

वनाग्नि बड़े वृक्षों को छोड़ कर उसके आगे आने वाली हर वनस्पति और हर एक जीव का अस्तित्व राख में बदल कर चलती जाती है। बाघ और हिरन जैसे स्तनधारी वन्यजीव तो जान बचा कर सुरक्षित क्षेत्र की ओर भाग सकते हैं, मगर उन निरीह सरीसृपों और कीट-पतंगों का क्या हाल होगा जो कि दावानल की गति से भाग ही नहीं सकते। जीवों के पास तो भागने का विकल्प है मगर उन नाजुक वनस्पतियों के महाविनाश की कल्पना की जा सकती है जो कि अपने स्थान पर हिल तो सकती हैं मगर भाग नहीं सकती।
वनस्पतियों के जलने से वन्यजीवों समक्ष भोजन का संकट उत्पन्न हो जाता है। हैरानी का विषय तो यह है कि उत्तराखण्ड के वन विभाग के अनुसार इस भयंकर आग में बड़े जीव तो क्या कोई चींटी तक नहीं मरी।

मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा जंगल की आग हमारे वातावरण को भी दूषित करती है। इस आग के धुएं में दर्जनों अलग-अलग तरह के कण होते हैं, जैसे कि कालिख और रसायन। जिनमें कार्बन मोनोऑक्साइड शामिल है, लेकिन वायु गुणवत्ता के विशेषज्ञों के लिए मुख्य चिंताओं में से एक धुएं में पाए जाने वाले सूक्ष्म कण पीएम 2.5 हैं। पीएम 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम की माप के अंतर्गत आते हैं। पीएम 2.5 इंसान के बाल की चौड़ाई के औसतन एक चौथाई भाग के बराबर होते हैं।

जंगलों की आग ने पहाड़ की हवा को दूषित कर दिया है। वनाग्नि की घटनाओं के बाद यहां ब्लैक कार्बन की मात्रा में आश्चर्यजनक ढंग से 12-13 गुना वृद्धि हुई है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग द्वारा कराए गए एक अध्ययन के अनुसार सामान्य दिनों में अलकनंदा घाटी में ब्लैक कार्बन की मात्रा 1,000 से 2,000 नैनोग्राम प्रति घन मीटर रहता है। यह आंकड़ा अब 13,250 पहुंच गया है।

जैव विविधता का भी विनाश

हिमालय हॉट स्पॉट का कुल क्षेत्रफल 7,41,706 वर्ग किमी है तथा इसमें संरक्षित क्षेत्र 1,12,578 वर्ग किमी है। हिमालय का आइयूसीएन की कैटेगरी 1-6 के तहत संरक्षित क्षेत्र 77,739 वर्ग किमी तथा हॉटस्पॉट वनस्पति क्षेत्र 185427 वर्ग किमी है। यहां औसत मानव जनसंख्या घनत्व 123 प्रति वर्ग किमी है। इस संवेदनशील क्षेत्र में 3160 इंडेमिक पादप प्रजातियां हैं और अस्तित्व के खतरे वाले जीव 4 तथा अस्तित्व के खतरे वाले पक्षी 8 हैं।

इस क्षेत्र में अस्तित्व के खतरे वाले स्तनपाई जीवों की 4 प्रजातियां हैं। ये सारी प्रजातियों को वनाग्नि नष्ट कर जाती हैं। उत्तराखण्ड हिमालय में पादपों की विभिन्न वर्गों और कुलों की लगभग 4 हजार प्रजातियां हैं जिनमें से 161 दुर्लभ प्रजातियां हैं। अस्तित्व के खतरे से जूझ रही ऐसी दुर्लभ प्रजातियों के लिये जंगल की आग महाविनाशकारी साबित हो रही है।

वनाग्नि की आंच ग्लेशियरों तक पहुंच रही

वनाग्नि से तापमान बढ़ रहा है। मौसम विभाग के अनुसार 27 अप्रैल को देहरादून, मसूरी, पन्तनगर, रुड़की और मुक्तेश्वर का अधिकतम तापमान सामान्य से 2 से लेकर 4 डिग्री तक अधिक दर्ज किया गया।  जबकि 28 अप्रैल को मुक्तेश्वर और मसूरी जैसे ठण्डे स्थानों पर न्यूनतम् तापमान सामान्य से 4 डिग्री अधिक दर्ज हुआ। वनाग्नि की आंच उत्तराखण्ड हिमालय के लगभग 14 ग्लेशियरों तक पहुंच रही है।

गढ़वाल विवि के पर्यावरण विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. आर.के. मैखुरी के अनुसार वर्तमान में स्थिति बेहद चिंताजनक है। ब्लैक कार्बन ग्लेशियरों को नुकसान तो पहुंचाएंगे ही, स्थानीय स्तर पर भी इसके दुष्परिणाम सामने आएंगे। इससे जैव विविधता नष्ट हो रही है। ग्लेशियर जब पिघलेंगे, तो इस पर जमा ब्लैक कार्बन पानी के साथ बहेगा। इससे पानी प्रदूषित हो जाएगा।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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